वंशानुगत उत्तराधिकार के सिवाय भारत के राष्ट्रपति और ब्रिटेन की महारानी की हैसियत और दायित्व तक़रीबन एक जैसे हैं। महारानी का निर्वाचन नहीं होता, जबकि भारत के राष्ट्रपति, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और अनोखी निर्वाचन प्रक्रिया से चुने जाते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव को हमारे संविधान निर्माताओं ने हरेक निर्वाचन प्रणाली की अच्छाईयों के समावेश से बनाया है। इसीलिए इसे Mother of all Election Practices भी कह सकते हैं। भारत का राष्ट्रपति, व्यापक राजनीतिक मंथन से निकलने वाला एक अराजनीतिक पद है, जो देश का प्रथम नागरिक, सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं का मुखिया और संरक्षक भी है। वो सर्वशक्तिमान राजा या प्रशासक के स्थान पर विराजमान ऐसा सर्वोच्च जनसेवक है, जिसकी सत्ता का संचालन संविधान के मुताबिक़ संसद और मंत्रिमंडल के ज़रिये होता है।

राष्ट्रपति की विशिष्ट हैसियत की वजह से हरेक भारतवासी उन्हें परोक्ष चुनाव से चुनता है। ताकि ये तय न हो सके कि किसने उनके पक्ष में वोट किया और किसने नहीं! इसीलिए प्रत्यक्ष चुनाव से निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने उन मतदाताओं की ओर से भी राष्ट्रपति के लिए मतदान करते हैं, जिनका वोट ख़ुद उन्हें भी न मिला हो! हमारा हरेक जनप्रतिनिधि भी राष्ट्रपति चुनाव का मतदाता नहीं हो सकता। ये विशेषाधिकार भी सिर्फ़ निर्वाचित विधायकों और सांसदों को हासिल है। इन्हें निर्वाचक मंडल यानी Electoral College कहा जाता है। स्थानीय निकायों जैसे ज़िला परिषद, पंचायत समिति या नगरपालिकाओं के सदस्य, परोक्ष चुनाव से निर्वाचित विधान परिषद सदस्य (MLC) और कोई भी मनोनीत जनप्रतिनिधि राष्ट्रपति चुनाव का मतदाता नहीं हो सकता।

क्यों बना इतना जटिल तरीक़ा?

किसी भी दशा में, हमारा राष्ट्रपति ख़ुद को सर्वशक्तिमान राजा न समझ बैठे इसलिए ये व्यवस्था की गयी कि वो देश का प्रधान तो होगा, सेना का सर्वोच्च कमांडर तो होगा लेकिन देश को चलाने वाली सरकार और उससे जुड़ी असंख्य संस्थाओं का प्रत्यक्ष नेतृत्व नहीं करेगा। ऐसी व्यवस्था से हमारा राष्ट्रपति कभी निरंकुश नहीं हो सकता। उसे प्रधानमंत्री की सलाह से ही चलना होगा। सेनाएँ उसे अपना प्रधान सेनापति तो मानेंगी, लेकिन सेनाओं की जवाबदेह सिर्फ़ सरकार के प्रति होगी। मसलन, प्रधानमंत्री, सरकार के मुखिया हैं, लेकिन उन्हें भी मंत्रिपरिषद के प्रति जवाबदेह होना ही होगा। मंत्रिपरिषद, सर्वशक्तिमान है, लेकिन उसे भी संसद के प्रति जवाबदेह और लोकसभा का विश्वासपात्र बनकर ही रहना होगा।

जंज़ीर का तरह एक-दूसरे से बँधी हुई ऐसी व्यवस्था ही हमारे संविधान की सबसे बड़ी ताक़त और विशेषता है। संविधान में किसी भी व्यक्ति या संस्था को निरंकुश बनने से रोकने का पुख़्ता इन्तज़ाम किया गया है। कर्तव्यों और दायित्वों का ऐसा विभाजन ही क्षेत्राधिकार यानी Separation of Power कहलाता है। ये हरेक संवैधानिक पद के लिए न सिर्फ़ अलग-अलग लक्ष्मण रेखाएँ खींचता है, बल्कि इसे लाँघने की किसी भी कोशिश को नियंत्रित भी करता है। इसी वजह से भारतीय लोकतंत्र में निरंकुश तानाशाही की गुंज़ाइश नहीं है। संविधान की इन्हीं ख़ूबियों की वजह से भारत में कभी ‘मार्शल लॉ’ की नौबत नहीं आ सकती! किसी भी दशा में हमारे राष्ट्रपति अपनी सरकार को भंग करके उनकी क़मान अपनी मुट्ठी में नहीं ले सकते!

पार्टी में रहकर भी मुक्त हैं राष्ट्रपति के वोटर

राष्ट्रपति चुनाव का हरेक मतदाता राजनीतिक कार्यकर्ता है। फिर चाहे वो किसी पार्टी का हो या निर्दलीय। इन मतदाताओं को उनकी पार्टियों और नेताओं की ख़्वाहिशों से मुक्त रखा गया है। उनसे अन्तर्आत्मा की आवाज़ के मुताबिक़, वोट देने की अपेक्षा रखी गयी है। इसीलिए किसी सांसद या विधायक को उसकी पार्टी भी व्हिप (बाध्यकारी आदेश) जारी करके किसी ख़ास उम्मीदवार को ही वोट देने के लिए नहीं कह सकती। राष्ट्रपति चुनाव का मतदान गोपनीय होता है।

सबसे कठिन है उम्मीदवार बनना

राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनने के लिए उसके 50 मतदाताओं का प्रस्तावक और 50 का ही अनुमोदक होना ज़रूरी हैं। इस शर्त की वजह से प्रत्यक्ष चुनाव की तरह कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति चुनाव का उम्मीदवार नहीं बन सकता। छोटी पार्टियाँ भी इस शर्त को आसानी से पूरा नहीं कर सकतीं और यदि पूरा कर भी लें तो अपने दम पर अपने उम्मीदवार को जितवा नहीं सकतीं। इससे राष्ट्रपति पद की गरिमा में इज़ाफ़ा होता है। राष्ट्रपति बनने वाला ख़ुद को किसी ख़ास पार्टी या नेता का कठपुतली बनने से बचा पाता है।

सांसदों की हैसियत एक, विधायकों की अलग-अलग

राष्ट्रपति चुनाव के मतदाताओं में जहाँ देश के सांसदों की हैसियत एक जैसी है, वहीं विधायकों की ताक़त यानी उनका मत-मूल्य उनके राज्य की आबादी के हिसाब से तय होती है। इसके लिए पहले अलग-अलग राज्य के विधायकों के वोट का मूल्य तय किया जाता है और फिर देश भर के विधायकों के मत-मूल्य के बराबर सांसदों का मत-मूल्य निर्धारित किया जाता है। इसे ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था’ यानी Proportional Representation System कहते हैं। राष्ट्रपति चुनाव के लिए राज्यों के मत-मूल्य का निर्धारण उसकी 1971 की आबादी (आधार वर्ष) मुताबिक़ होता है।

आधार वर्ष 1971 का नकारात्मक पक्ष

संविधान के मुताबिक़, राष्ट्रपति चुनाव के लिए मत-मूल्यों को आख़िरी जनगणना के आँकड़ों के अनुसार तय होना चाहिए। 1952 के चुनाव 1951 की आबादी के मुताबिक़ हुए थे। 1961 की जनगणना के आँकड़े समय पर नहीं मिले तो 1962 के चुनाव भी 1951 की जनसंख्या के आधार पर ही हुए। अगले चुनाव उपयुक्त ढंग से होते रहे। लेकिन 2002 में वाजपेयी सरकार ने संविधान में संशोधन किया कि 2026 तक सभी राष्ट्रपति चुनाव, 1971 की जनगणना के अनुसार ही होंगे। ताकि, ऐसे दक्षिण भारतीय राज्यों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व कम नहीं हो जो जनसंख्या नियंत्रण के लिहाज़ से बेहतर थे। तब तक लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन 1971 की आबादी के आधार पर ही हो रहा था। हालाँकि, 2008 के बाद से विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव, 2001 की जनगणना और नये परिसीमन के अनुसार हुए। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के लिए आधार वर्ष, 1971 की आबादी  को ही बनाये रखा गया।

बिगड़ा आनुपातिक सन्तुलन

राष्ट्रपति चुनाव का आनुपातिक सन्तुलन अब भी 46 साल पुरानी यानी 1971 की आबादी पर आधारित है। 1971 में देश की आबादी 54.81 करोड़ थी। 2011 में ये 121.01 करोड़ हो गयी। 2017 में ये 130 करोड़ से ज़्यादा है। साफ़ है कि 2002 के संविधान संशोधन की वजह से अबकी बार भी 130 करोड़ लोगों के राष्ट्रपति का चुनाव 55 करोड़ की आबादी वाले दौर के मत-मूल्य के मुताबिक ही होने वाला है। इतना ही नहीं, 2026 तक ऐसी विसंगति बनी ही रहेगी।

मत-मूल्य का निर्धारण और निर्वाचक मंडल

1971 की आबादी के मुताबिक़, राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल का कुल वोट-मूल्य 10 लाख 98 हजार 903 है। ये संख्या चुनाव के वक़्त सांसदों और विधायकों की खाली पड़ी सीटों के मत-मूल्य के हिसाब से घट जाती है। निर्वाचक मंडल में सिद्धान्ततः विधायकों और सांसदों को सामूहिक तौर पर बराबर-बराबर ताक़त दी गयी है। फिर भी गणना के नियमों की वजह से देश के विधायकों का मत-मूल्य, सांसदों के मत मूल्य से 87 अंक अधिक है। इसकी गणना के तहत सबसे पहले अलग-अलग राज्यों के विधायकों का मत-मूल्य तय किया जाता है। इसके लिए उस राज्य की आबादी को वहाँ के सीधे चुनाव से निर्वाचित विधायकों की संख्या से बाँटा जाता है। इस भागफल को भी 1000 से विभक्त किया जाता है। फिर जो अंक प्राप्त होता है, उसे पूर्णांक में बदलकर इसे विधायकों की संख्या से गुणा करके उस राज्य का कुल मत-मूल्य का निर्धारण होता है।

उदाहरणार्थ, 1971 में पंजाब की आबादी 1 करोड़ 35 लाख 51 हज़ार 69 थी। इसे पंजाब विधानसभा की सदस्य संख्या 117 से विभाजित किया जाता है। यानी, (i) 13551069÷117=115821. (ii) 115821÷1000=115.821. (iii) पूर्णांक=116. इस तरह पंजाब के एक विधायक का मत-मूल्य 116 और पंजाब विधानसभा का कुल मत-मूल्य 116×117=13,572 हुआ। यही प्रक्रिया हरेक राज्य के लिए अपनायी जाती है। इस गणना में आबादी का असर ऐसा है कि उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट-मूल्य जहाँ 208 है, वहीं झारखंड के लिए ये 176 है, तो सबसे कम जनसंख्या वाले राज्य सिक्किम के विधायक का वोट-मूल्य सिर्फ़ 7 है।

इस तरह, देश भर के 4120 विधायकों का कुल मत-मूल्य 5 लाख 49 हज़ार 495 बैठता है। अब इस संख्या को देश भर के सांसदों की संख्या से विभाजित करके सांसदों का मत-मूल्य तय किया जाता है। लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 233 सदस्यों समेत देश में कुल 776 निर्वाचित सांसद हैं। इस संख्या से विधायकों के सकल मत-मूल्य वाली संख्या को विभाजित करके सांसद का मत-मूल्य तय होता है। मसलन, (i) 549495÷776=708.112. (ii) पूर्णांक=708. यानी, सांसदों का कुल मत-मूल्य होगा 776×708=549408. सांसदों और विधायकों के कुल मत-मूल्य को जोड़ने से राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल का कुल मत-मूल्य 10 लाख 98 हज़ार 903 (549495+549408) प्राप्त होता है।

ज़रूरी है विशुद्ध बहुमत

राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार को कुल मतों के आधे से ज़्यादा मत हासिल करना ज़रूरी है। ये आधा, कुल डाले गये मत-मूल्य का नहीं बल्कि सक्रिय निर्वाचक मंडल के कुल मत-मूल्य का होना चाहिए। इसका मतलब ये हुआ कि यदि चुनाव के वक़्त देश में सांसद और विधायक कोई पद खाली नहीं है तो जीतने वाले उम्मीदवार को कम से कम 5 लाख 49 हजार 452 मत-मूल्य हासिल करना ज़रूरी है। लेकिन यदि 10 हज़ार मत-मूल्य के सांसदों और विधायकों के पद खाली हैं तो विजेता के लिए बहुमत का अंक 5 हज़ार घट जाएगा। ऐसे जादुई अंक पर इस बात का कोई असर नहीं होगा कि मतदान का प्रतिशत कितना रहा है! इससे ये सुनिश्चित होता है कि राष्ट्रपति को विशुद्ध बहुमत हासिल हो।

वोट-मूल्य का बँटवारा नहीं हो सकता

राष्ट्रपति चुनाव का कोई भी मतदाता अपने वोट-मूल्य के किसी भी हिस्से को अलग-अलग उम्मीदवारों में नहीं बाँट सकता। इसका मतलब ये है कि एक सांसद को अपने पसंदीदा उम्मीदवार को सारे 708 मत देना होगा। लेकिन यदि उसे मुकाबले में खड़े अन्य उम्मीदवार भी पसन्द हैं तो वो वोट की वरीयता यानी Priority को अपनी पसन्द के मुताबिक तय कर सकता है। इस प्रक्रिया को एकल हस्तान्तरित वोट या Single Transferable Vote कहते हैं। इसमें यदि पहली पसन्द वाले वोटों से विजेता का फ़ैसला नहीं हो पाता है, तो उम्मीदवार के खाते में वोटर की दूसरी पसन्द को नये सिंगल वोट की तरह ट्रांसफर किया जाता है। बहुकोणीय मुक़ाबलों में वरीयता वोट की अहमियत बहुत ज़्यादा होती है।

चुनाव आयोग की भूमिका

राष्ट्रपति के चुनाव में निर्वाचन आयोग का भूमिका भी बदल जाती है। पूरी चुनाव प्रक्रिया का आयोजन उसकी देख-रेख में ही होता है, लेकिन वो चुनाव का निर्वाचन अधिकारी यानी Returning Officer नहीं हो सकता। इस दायित्व को लोकसभा और राज्यसभा के महासचिव बारी-बारी से निभाते हैं। इस बार ये ज़िम्मा लोकसभा पर है तो अगली बार राज्यसभा के महासचिव यही ज़िम्मेदारी निभाएँगे। चुनाव पूरा होने के बाद यही निर्वाचन अधिकारी, विजयी उम्मीदवार के नाम की घोषणा करता है और उसे निर्वाचित होने का प्रमाणपत्र देता है। ऐसी व्यवस्था इसलिए बनायी गयी कि तकनीकी तौर पर राष्ट्रपति ही भारत के चुनाव आयोग का मुखिया होता है। लिहाज़ा, कभी ऐसा न हो कि कोई राष्ट्रपति अपने ही पुनर्निर्वाचन की निष्पक्षता को किसी भी तरह से प्रभावित कर सके।

राष्ट्रपति चुनाव की मतदान प्रक्रिया

राष्ट्रपति चुनाव में सांसदों और विधायकों को चुनाव आयोग की पूर्वानुमति से अपना मतदान केन्द्र बदलने का अधिकार है। इसके तहत सांसद, विधानसभाओं में और विधायक, संसद में बनाये जाने वाले मतदान केन्द्र में वोट डाल सकते हैं। सांसदों का मतपत्र हरे रंग के काग़ज़ का होता है, जबकि विधायकों के मतपत्र हल्के लाल या गुलाबी रंग के काग़ज़ पर छापे जाते हैं। हरेक मतदाता को चुनाव आयोग की ओर से सुलभ करवायी जाने वाली एक ख़ास क़िस्म की बैंगनी स्याही वाली पेन से ही मतदान करना होता है। अन्य पेन से किया गया मत अवैध हो जाता है। मतदान गुप्त होता है। लिहाज़ा, ‘क्रॉस वोटिंग’ यानी पार्टी की घोषित लाइन को नकारकर मतदान करने वाले इसका प्रचार ख़ुद करते हैं। मतदाता सांसद और विधायक को अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए मतपत्र में अपनी वरीयता को व्यक्त करने का विकल्प मिलता है। यानी, यदि दो से अधिक उम्मीदवार हों तो मतदाता ये बता सकता है कि उसकी पहली पसन्द, दूसरी पसन्द, तीसरी पसन्द आदि पर कौन-कौन से उम्मीदवार हैं! इसे Preferential Voting कहते हैं। मतगणना के वक़्त इस वरीयता का महत्व बहुत अधिक होता है।

मतगणना का तरीक़ा

मतदान के बाद हरेक राज्य की विधानसभाओं से मतपेटियाँ दिल्ली लायी जाती हैं। संसद भवन में मतगणना होती है। इसमें सबसे पहले प्रथम वरीयता वाले मतों का मूल्य जोड़ा जाता है। इसकी संख्या यदि बहुमत के जादुई अंक को प्राप्त कर लेती है तो नतीज़ा घोषित कर दिया जाता है। लेकिन यदि ये जादुई अंक से कम रही तो फिर दूसरी वरीयता वाले उम्मीदवार को मिले मत-मूल्यों का जोड़ा जाता है। लेकिन इससे पहले सबसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवार को गिनती की रेस से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन उसे मिले दूसरी वरीयता वाले मतों को उस उम्मीदवार को दे दिया जाता है, जिसे मतदाता ने ज़ाहिर किया था। मतगणना के हर चक्र में सबसे कम वोट पाने वाले को बाहर करके उसे मिले दूसरी वरीयता वाले वोट को सम्बन्धित उम्मीदवार को ट्रांसफर किया जाता है। ऐसा तब तक किया जाता है, जब तक कि कोई उम्मीदवार जीत के लिए ज़रूरी 50 फ़ीसदी वोट वाले जादुई अंक को न प्राप्त कर ले। वोट ट्रांसफर की ऐसा व्यवस्था की वजह से ही इसे एकल हस्तांतरित वोट या Single Transferable Vote कहते हैं।

इस तरीक़े की वजह से बहुकोणीय मुक़ाबलों में वो उम्मीदवार भी चुनाव जीत सकता है, जिसे प्रथम वरीयता के वोट तो कम मिले लेकिन दूसरी वरीयता के वोट अधिक मिले। सिंगल वोट ट्रांसफर वाली इस प्रणाली में कोई बड़ा राजनीतिक दल या समूह भी अपने दम पर जीत को पक्का नहीं कर सकता। छोटे-छोटे समूहों के वोट भी निर्णायक साबित हो सकते हैं। यानी ज़रूरी नहीं कि संसद में जिस पार्टी का दबदबा हो, उसी का उम्मीदवार जीते। राष्ट्रपति के चुनाव में विधायकों के वोट की भी बहुत अहमियत होती है।

कुलमिलाकर, राष्ट्रपति का चुनाव, देश की आबादी के बहुमत का फ़ैसला होता है। जबकि प्रत्यक्ष चुनावों में डाले गये कुल मतों में सबसे अधिक वोट पाने वाला विजेता बनता है। सीधे चुनाव की सबसे बड़ी ख़राबी ये है उसे वो उम्मीदवार भी जीत सकता है जिसने पाँच लाख मतों वाले निर्वाचन क्षेत्र में 5 हज़ार वोट ही पाये हों। क्योंकि मुमकिन है कि चुनाव में वोट ही कुल 10 हज़ार पड़े हों और 5 हज़ार ही सबसे ज़्यादा वोट साबित हो जाए। ऐसा दशा में ये कहा जाता है कि 5 हज़ार वोट पाने वाले को 5 लाख लोगों का प्रतिनिधि मानने का सिद्धान्त खोटा है। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव की जटिल प्रक्रिया ऐसी तमाम आलोचनाओं को ख़त्म कर देती है।