1. Related image  ‘मोशा’ राज में बिकाऊ है लोकतंत्र…! संविधान ही नहीं बचेगा तो कहाँ होगा भारत? 14612508 10157707560830165 4628707076373470565 o

यदि 50 करोड़ में एक MP और 10 करोड़ में एक MLA बिकाऊ बना दिया जाए तो सिर्फ़ 34,000 करोड़ में भारतीय लोकतंत्र की बोली लग जाएगी…! कैसे? तो ज़रा इसका हिसाब भी समझ लीजिए। देश में 4120 निर्वाचित विधायक हैं और 543 लोकसभा सदस्य। अब यदि सभी राज्यों और लोकसभा में बहुमत चाहिए तो 2060 विधायकों और 272 सांसदों का उपरोक्त भाव ने कुल मोल होगा – 34200 करोड़ रुपये! इस तरह…

[(4120/2)10]+[(543/2)50]
=20600+13600=34200

यानी, ज़्यादा से ज़्यादा 35 हज़ार करोड़ रुपये! अब ज़रा इस रक़म की तुलना उस 9000 करोड़ रुपये की चपत से करके देखिए जिसे लगाकर मोदी-शाह-जेटली का दोस्त विजय माल्या इंग्लैंड में गुलछर्रे उड़ा रहा है। या, ब्याज समेत इतनी ही रक़म की देनदारी सुब्रत राय में मामले में भी बैठ सकती है। दूसरे शब्दों में, 8 लाख करोड़ रुपये से ऊपर का बैंकों का NPA है। यानी भारतीय लोकतंत्र का सौदा बैंकों के कुल NPA के क़रीब 4.4% में ही हो सकता है। अडानी जैसे मोदी-भक्तों के लिए ये रक़म हाथ के मैल जितनी है। उन्हें इसे मुहैया करवाने में एक पल भी नहीं लगेगा…!

अच्छी तरह से जान लीजिए कि अभी देश पर संघ की सत्ता का युग है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह (मोशा) की हैसियत संघ के मुखौटे से अधिक नहीं है। इनका नया एजेंडा विपक्ष के विधायक और सांसद को ख़रीदकर भारतीय लोकतंत्र और संविधान को पूरी तरह से संघ का ग़ुलाम बनाना ही है! पूरी तेज़ी से यही काम चल रहा है। अफ़ीम चाटकर बैठी जनता के लिए इस मिशन को नाम दिया गया है ‘काँग्रेस मुक्त भारत’, लेकिन इसका असली लक्ष्य है विपक्ष विहीन भारत…! SP, BSP, JDU, Congress के बाद जल्द ही तृणमूल, BJD, TRS और AIADMK के विधायकों और सांसदों को भी ख़रीद लिया जाएगा!

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2019 के आम चुनाव के लिए TINA (There is no alternative) Factor की अफ़वाह को ब्रह्म-सत्य बनाकर वैसे ही पेश किया जा रहा है, जैसे 1995 में सारी दुनिया में गणेश जी को एक साथ दूध पिलाया गया था! जो लोग इस तरह के झाँसे में नहीं आएँगे, उन्हें चुनाव से पहले और बाद में वैसे ही ख़रीद लिया जाएगा, जैसा हमने अभी-अभी अरुणाचल, गोवा, बिहार और उत्तर प्रदेश में देखा है!

इसीलिए अपने इर्द-गिर्द बैठे उन लोगों की बातों पर ग़ौर कीजिए जो आपको इस बात पर ख़ुश होने के लिए कह रहे हैं कि ‘देखा, काँग्रेस कैसे उजड़ रही है? यहाँ तक कि जो पार्टियाँ काँग्रेस का साथ दे रही हैं, उनके विधायक भी उन्हें छोड़कर भाग रहे हैं! अरे, डूबते जहाज़ पर कौन रहना चाहेगा? काँग्रेस और उसके दोस्तों से उनके लोग ही नहीं सम्भल रहे, क्योंकि उनका अपने-अपने पार्टी नेतृत्व पर भरोसा ही नहीं रहा! वग़ैरह-वग़ैरह…।’

लेकिन अफ़सोस कि सच ऐसा नहीं है। बल्कि इससे लाख गुना ज़्यादा वीभत्स, विकृत और भयावह है! जो लोग आज हमारे नेताओं और पूरे के पूरे विधायक या संसदीय दल की ख़रीद-फ़रोख़्त कर रहे हैं, वही कल को हमारी माँ-बहन को ख़रीदना चाहेंगे? मुँह माँगे दाम के आगे भी अगर हम नहीं झुके तो वो हमारी कनपटी पर भी CBI, ED, Income Tax जैसी किसी भी पिस्तौल को रखकर, हमें भी वैसा ही करने के लिए मज़बूर करेंगे, जैसा वो चाहेंगे!

यदि आपको ये बातें कपोल-कल्पना लगे तो जान लीजिए कि इन लोगों को नियम-क़ायदों, क़ानून-संविधान, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग-संसद किसी की परवाह नहीं है! गोरक्षकों के रूप में दिख रहे इनके उन्मादी चेहरे क्या ये नहीं बताते कि इन्हें किसी भी चीज़ का डर या लिहाज़ नहीं है। इनके सारे मुद्दों और चिन्तन में सिर्फ़ ‘ज़बरन’ तत्व की भरमार है।

अनुच्छेद 370 को ख़त्म करो, क्योंकि हम कह रहे हैं! अनुच्छेद 35A को ख़त्म करो, क्योंकि हम कह रहे हैं! तीन तलाक़ को ख़त्म करो, क्योंकि हम कह रहे हैं! समान नागरिक संहिता को लागू करो, क्योंकि हम कह रहे हैं! इतिहास में वो परिवर्तन करो जो हम कह रहे हैं। लिखो कि टीपू, देशद्रोही था! लिखो कि अकबर ने महाराणा के क़दमों में गिरकर रहम की भीख़ माँगी थी, क्योंकि हम कह रहे हैं! सारे विपक्षी नेताओं को भ्रष्ट समझो, क्योंकि हम कह रहे हैं! उन पर छापों का सर्ज़िकल हमला करो, क्योंकि हम कह रहे हैं! राम मन्दिर फ़ौरन बनाओ, क्योंकि हम कह रहे हैं! स्वीकार करो कि बंगाल में महिलाओं के साथ 15 दिनों में बलात्कार हो जाता है, क्योंकि हम कह रहे हैं! मानो कि बंगाल में क़ानून-व्यवस्था का राज ख़त्म हो गया है, क्योंकि हम कह रहे हैं! यक़ीन करो कि कश्मीर में शान्ति और ख़ुशहाली बढ़ रही है, क्योंकि हम कह रहे हैं! यक़ीन करो कि दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका बज रहा है, क्योंकि हम कह रहे हैं! ख़बरदार, जो किसी ने नोटबन्दी, GST, बेरोज़गारी, धार्मिक उन्माद में इज़ाफ़े की आलोचना की तो उसकी ज़ुबान खींच ली जाएगी। क्योंकि विष्णु अवतार के रूप में अवतरित हुए मोशा राज में ये सब कुछ ईश-निन्दा और देशद्रोह के समान है, क्योंकि हम कह रहे हैं!

ऐसी असंख्य बातें हैं। ये तभी मुमकिन है, जब आपको पता हो कि सब कुछ बिकाऊ है! आपको तो सिर्फ़ गाँठ में रुपये रखकर बाज़ार में निकल जाना है और जिस सामान पर जी आ जाए, उसकी बोली लगा देना है! क्योंकि आपने सैकड़ों धन्ना सेठों को अपनी अंटी में दबा रखा है! वो भी आपको सर्वशक्तिमान मानकर आपके ग़ुलाम हो चुके हैं। धन्ना सेठों को भी पता है कि अगर उन्होंने आपकी ग़ुलामी से ना-नुकुर किया तो आप उन्हें नेस्तनाबूद कर देंगे! धन्ना सेठों में भी जो दबंग और दूरदर्शी हैं उन्होंने मोशा राज की क़ीमत लगाकर इसे अपना लठैत बनाकर पाल लिया है।

इसीलिए, लोकतंत्र में विधायकों-सांसदों और यहाँ तक कि पार्टियों की ख़रीद-फ़रोख़्त या दलबदल को अति-अनिष्टकारी मानिये! क्या सांसदों-विधायकों की औक़ात इस देश में अपनी-अपनी पार्टी के ऐसे कर्मचारियों की तरह हो सकती है जो आज एक कम्पनी से इस्तीफ़ा दे और कल दूसरी कम्पनी का मुलाज़िम बन जाए?

क्या नेताओं को ऐसा होना चाहिए कि अगर आज टाटा का कर्मचारी है तो कल से रिलायंस का हो जाए और परसों बिरला चाहें तो ज़्यादा रुपये देकर उसे अपने पास बुला लें, अपना कारिन्दा बना लें! राजनीति में ऐसा काम कोई भी करे, किसी के लिए भी किया जाए, ये है तो हर तरह से महाविनाशकारी ही! यहाँ एक Jio यदि मुफ़्तख़ोरी करवाकर सारे टेलीकॉम बाज़ार को तहस-नहस कर सकता है तो सोचिए कि नेताओं की मंडी में उनकी नीलामी का क्या-क्या हश्र हो सकता है? अभी यही काम धड़ल्ले से हो रहा है!

गुजरात के घटनाक्रम को मामूली समझना भयंकर भूल होगी! बिहार में जनता ने जिस NDA को नकार दिया था, उसे नये चुनाव के बग़ैर नीतीश कुमार कैसे जनादेशधारी बना सकते हैं? ये घोर अन्धेर है। याद रखिए, मुद्दा ये नहीं है कि लालू, बढ़िया हैं घटिया? भ्रष्ट हैं या नहीं? मुद्दा ये है कि चुनाव पूर्व बने जिस गठबन्धन को जनादेश मिला था, यदि वो चलने लायक नहीं बचा तो आपको फिर से जनादेश लेना चाहिए।

नीतीश को बिहार ने जिस खेमे का मुख्यमंत्री चुना था, उसमें NDA नहीं था। 2015 के चुनाव में NDA और महागठबन्धन के बीच सीधी टक्कर हुई थी। इसमें हारने वाला NDA किसी भी जोड़-तोड़ से सत्तासीन कैसे हो सकता है? ये तो बाक़ायदा जनादेश का अपमान है, संविधान की हत्या है! क्या जनता पर चुनाव का बोझ नहीं थोपने की आड़ में जनादेश और संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ायी जा सकती हैं? संविधान के संरक्षक सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। उसे किसी याचिका की ज़रूरत ही क्यों होनी चाहिए!

क्या राजनीति में बड़े से बड़े नेता के बयान की कोई गरिमा, कोई प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए? कल आपने जो कहा था क्या आज आप उसका बिल्कुल उल्टा करने लगेंगे? और, क्या जनता को चुपचाप पाँच साल तक सिर्फ़ और सिर्फ़ तमाशा ही देखना पड़ेगा? ये अतिवाद की दशा है, जो देर-सबेर हमें अराजकता और गृह युद्ध के दलदल में ढकेलकर ही मानेगी। नैतिकता और लोकलाज़ विहीन राजनीति का अपनी सीमाओं को तोड़कर बाहर निकल जाना, देश के लिए किसी परमाणु हमले से भी ज़्यादा विनाशकारी और भयावह है! संघ के इशारे पर नरेन्द्र मोदी और अमित शाह (मोशा) जो नंगा-नाच खेल रहे हैं, उसके मायने समझिए! वर्ना, वो दिन दूर नहीं जब आपकी औलादें मौजूदा भारतवर्ष में साँसें नहीं ले रही होंगी! भारत माता की जय के नारे भी उनके मुँह से नहीं निकल पाएँगे! याद रखिए, जब संविधान ही नहीं बचेगा तो भारत कहाँ होगा?