प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी को ‘हर वक़्त सिर्फ़ अपनी ब्रॉन्डिंग करने’ की बीमारी है। देश-हित से ज़्यादा उनकी चिन्ता हमेशा नये तरीकों से और अलग-अलग किस्म का झूठ बोलकर जनता को उल्लू बनाते रहने की ही रहती है। बीते साढ़े तीन सालों में उन्होंने इस काम को ऐसी कुशलता से किया है, जैसा आज़ाद हिन्दुस्तान के 70 सालों में पहले कभी कोई और राजनेता नहीं कर पाया! मोदी का ताज़ा झूठ ये है कि बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए जापान से बेहद उदार शर्तों पर मिला क़र्ज़ ‘एक प्रकार से मुफ़्त है!’ सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। बुलेट ट्रेन, भारत के लिए किसी गर्व की चीज़ नहीं होगी, बल्कि आने वाले पीढ़ियाँ इसे अभिश्राप और राष्ट्रीय सज़ा के रूप में झेलेंगी।

narendra modi, bullet train, shinzo abe  सरासर झूठा है मोदी का बयान कि ‘एक प्रकार से मुफ़्त है’ बुलेट ट्रेन का क़र्ज़…! Webp

Despite what our prime minister says, the train isn’t virtually free of cost. Credit: Reuters

बेशक़, बुलेट ट्रेन के लिए जापान से मिला तकनीकी सहयोग शानदार है। लेकिन मोदी सरकार ये महाझूठ भी फैला रही है कि भारत को जापान से बुलेट ट्रेन की तकनीक़ भी मुहैया करवायी जाएगी। हक़ीक़त में, ऐसा कतई नहीं है! बुलेट ट्रेन की ऐसी विशेषताओं की वजह से ही पूर्ववर्ती सरकारों ने हमेशा इससे दूरी बनाये रखी। महज 0.1 फ़ीसदी के ब्याज़ पर मिला 97,636 करोड़ रुपये का क़र्ज़ भी बेहद रियायती है। इसलिए भी कि इस क़र्ज़ की अदायगी, परियोजना पूरी होने के 16वें से लेकर 50वें साल तक की जाएगी। लेकिन भारतवासियों को ये भी समझना होगा कि किसी कुपोषित ग़रीब परिवार के घर के सामने यदि दुनिया की सबसे महँगी कार खड़ी हो जाए तो क्या वो परिवार ख़ुशहाल हो जाएगा? एक लाइन में, बस यही है बुलेट ट्रेन का अर्थशास्त्र…!

अहमदाबाद के भारतीय प्रबन्धन संस्थान (IIM-A) का अनुमान है कि निर्माण के बाद बुलेट ट्रेन को रोज़ाना मुम्बई-अहमदाबाद के बीच सौ फेरे लगाने होंगे। रोज़ाना क़रीब एक लाख मुसाफ़िरों को ढोने पर ही बुलेट ट्रेन इतना किराया वसूल पाएगी कि वो अपने ख़र्चों को निकाल सके और उदार क़र्ज़ की किस्तें भर सके। अभी दोनों महानगरों के बीच रेल, विमान और सड़क से आवागमन करने वाले सभी मुसाफ़िर भी यदि बुलेट ट्रेन चालू होने के बाद उससे ही सफ़र करने लगेंगे तो भी इतने मुसाफ़िर नहीं जुटेंगे कि बुलेट ट्रेन का क़र्ज़ निर्धारित वर्षों में उतारा जा सके।

मज़े की बात तो ये है कि जब बुलेट ट्रेन चलाने वाली कम्पनी क़र्ज़ की किस्त नहीं भर पाएगी तो उसके बोझ को भारत सरकार को झेलना होगा। सरकार उस रक़म को उसी ख़ज़ाने से निकालकर देगी, जो आम जनता से वसूले जाने वाले टैक्स से बनता है। बुलेट ट्रेन के क़र्ज़ की किस्तें भले ही 16वें साल से भरी जाएँगी, लेकिन इसके संचालन से यदि इतनी कमाई नहीं हुई जितना इसका ख़र्च है तो भी उसे चलाने के लिए सरकार को ही सब्सिडी देनी पड़ेगी। इस सब्सिडी का बोझ आम जनता पर नहीं तो फिर किस पर पड़ेगा? ऐसा होना तय है और ये भी तय कि बुलेट ट्रेन में सफ़र करने वाले अमीरों की मौज़-मस्ती का बोझ आख़िरकार ग़रीबों को ही उठाना पड़ेगा।

आने वाली पीढ़ियाँ आज लिये गये अदूरदर्शी फ़ैसले को ख़ून के आँसू बहाकर झेलने के लिए अभिशप्त होगी। वो इसलिए कराह रही होंगी कि 2017 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सनक थी कि वो देश में बुलेट ट्रेन लाकर ही रहेंगे! जी हाँ, इतिहास में बुलेट ट्रेन को मोदी की सनक के रूप में ही देखा जाएगा। कल्पना कीजिए कि जिस ख़र्च से बुलेट ट्रेन को लाया जाएगा, उससे देश में बाँध बनाये जाते तो क्या विकास नहीं होता, लोगों को रोज़गार नहीं मिलता, किसानों के सूखे खेतों को पानी नहीं मिलता, बाढ़ से होने वाली तबाही में कमी नहीं आती, पनबिजली का उत्पादन नहीं होता, आर्थिक समृद्धि नहीं आती?

बुलेट ट्रेन पर ख़र्च होने वाली सवा लाख करोड़ रुपये की रक़म को यदि 63000 किलोमीटर लम्बे मौजूदा रेल नेटवर्क की बेहतरी पर लगाया जाता, तो क्या हम रेलवे का कायाकल्प करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ते? ये किससे छिपा है कि अभी भारतीय रेल में जनता को जान हथेली पर लेकर सफ़र करना पड़ता है? हम इस सच्चाई को कैसे नज़रअन्दाज़ कर सकते हैं कि अभी रोज़ाना अनारक्षित श्रेणी में चलने वाले 95% रेल यात्रियों के लिए बुलेट_ट्रेन जैसा कोई सपना हो ही नहीं सकता? इसीलिए बुलेट ट्रेन नरेन्द्र मोदी की ‘मन की बात’ के सिवाय और कुछ नहीं है!

हमारे स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों, पुलिस, स्थानीय निकायों की दुर्दशा किससे छिपी है? ज़रा सोचिए कि जुमलेबाज़ी से भरे मोदी राज में इनमें से किसकी-किसकी सूरत बदल चुकी है? नहीं बदली तो क्यों? दरअसल, तस्वीरें बदलने के लिए सरकारों के पास पर्याप्त पैसा नहीं है, क्योंकि हम ग़रीब मुल्क़ हैं। साधन कम हैं, इसीलिए भ्रष्टाचार भी ज़्यादा है। प्रति व्यक्ति आमदनी और टैक्स के लिहाज़ से हम दुनिया में सबसे नीचे आने वाले देशों में से हैं। हम बोलें चाहे जो, लेकिन सच यही कि अपनी चुनौतियों से निपटने के लिए हमारे पास निवेश की अपेक्षित शक्ति नहीं है। इसीलिए कोई भी सरकार हो, हमें विदेशी निवेश के लिए कटोरा लेकर घूमना पड़ता है।

निवेशक, देसी हो या विदेशी, उसे मुनाफ़ा तो चाहिए ही। जापान के निवेशकों के लिए 0.1 फ़ीसदी का ब्याज़ भी पर्याप्त होगा, क्योंकि वो लम्बे अरसे से ऋणात्मक ब्याज दरें झेल रहे हैं। बुलेट ट्रेन बनाने वाली जापानी कम्पनी ने भारत में वैसे ही अहम प्रोजेक्ट पाया है, जैसे हमारी कुछ कम्पनियाँ विदेश में प्रोजेक्ट पाती हैं। जापान लम्बे अरसे से दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक रहा है। बुलेट ट्रेन की वजह से जापानी कम्पनी को धन्धा मिल गया है। जिससे उनकी अर्थव्यवस्था को फ़ायदा होगा।

भारतीयों की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसत आमदनी जहाँ 1.5 हज़ार डॉलर है। वहीं जापानियों के लिए ये 33 गुना ज़्यादा यानी 50 हज़ार डॉलर है। लिहाज़ा, जापान के मुक़ाबले यदि भारत में बुलेट ट्रेन का किराया आधा भी होगा, तो भी भारतीयों के लिए ये ख़ासी महँगी सवारी ही साबित होगी। अत्यधिक महँगा होने की वजह से सिर्फ़ मुट्ठी भर लोग ही इसका मज़ा ले पाएँगे। लेकिन इसके वित्तीय कुप्रबन्धन का ख़ामियाज़ा पूरे देश को झेलना पड़ेगा।

एक वक़्त था, जब भारत ने अन्तरिक्ष विज्ञान में भारी निवेश का रास्ता चुना। तब दुनिया भर में हमारी आलोचना हुई कि किसी ग़रीब देश को ऐसे रास्ते को क्यों चुनना चाहिए? लेकिन तब हमारे देश के नेताओं और वैज्ञानिकों ने कहा कि अपने आकार और आबादी को देखते हुए हमें उस रास्ते को अपनाना ही होगा। आज हम देख रहे हैं कि भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने दुनिया में भारत को कैसा सम्मान दिलवाया है! अन्तरिक्ष की हमारी उपलब्धियों से आम जनता को भी बहुत फ़ायदा हुआ है। लेकिन अफ़सोस कि बुलेट ट्रेन के मामले में ऐसा कभी नहीं होगा।

सरासर झूठा है मोदी का बयान कि ‘एक प्रकार से मुफ़्त है’ बुलेट ट्रेन का क़र्ज़…! Narendra Modi Shinzo Abe

Prime Minister Narendra Modi with his Japanese counterpart, Shinzo Abe, at an exhibition in Gandhinagar, Gujarat. Photo courtesy: PMO India

मुमकिन है कि सरकारी सनक की वजह से अगले 100 साल में देश के सुदूर छोर बुलेट ट्रेन से जुड़ जाएँ, लेकिन आम आदमी की आमदनी के स्तर को देखते हुए ये दावे के साथ कहा जा सकता है कि बुलेट ट्रेन, हमेशा सफ़ेद हाथी ही बनी रहेगी। यहाँ ये भी ग़ौर करने की बात है कि दुनिया के किसी भी देश में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट व्यावसायिक रूप में फ़ायदे में नहीं है। उन देशों में भी नहीं, जो भारत से कई गुना ज़्यादा सम्पन्न हैं!

दरअसल, नरेन्द्र मोदी की दिली-ख़्वाहिश रहती है कि वो चुटकियों में बड़े से बड़े फ़ैसले लेने वाले नेता के रूप में पहचाने जाएँ। लेकिन अपनी और अपने सलाहकारों की अज्ञानता की वजह से बीते साढ़े तीन साल में मोदी एक भी ऐसा काम नहीं कर सके, जिससे उनकी मनचाही छवि बन सके। मोदी की ख़्वाहिश भारतीय इतिहास में अमरत्व का स्थान हासिल करने की है, लेकिन उनकी दुर्भावनापूर्ण नीतियाँ उन्हें भारतीय लोकतंत्र के सबसे कुख़्यात नेताओं के रूप में ही स्थापित कर रही है। प्रधानमंत्री बनने से पहले और बाद के तमाम विधानसभा चुनावों में मोदी के असंख्य भाषण ऐसे हैं जो तरह-तरह के झूठ से प्रेरित हैं। तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर मोदी और बीजेपी ने विरोधियों की सरकारों पर तीखे हमले किये, लेकिन सत्ता पाने के बाद उन्हें कुछ भी याद नहीं रहा। इसी प्रवृत्ति ने देखते ही देखते मोदी को देश का ‘सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ झाँसेबाज़’ बना दिया। बहरहाल, मौजूदा मोदी राज के पास चुनाव में जाने से पहले अभी क़रीब 19 महीने बचे हैं। यक़ीनन, उनके पिटारे से अभी काफ़ी झाँसे बाहर आने बाक़ी हैं!