केन्द्रीय पर्यटन राज्यमंत्री अल्फोंस कन्नाथनम ने अपने बेहद संक्षिप्त कार्यकाल में ही साबित कर दिया कि मूर्खों के हाथ में सत्ता पहुँच जाने से उनकी अकल नहीं फिर सकती! ये शब्द बेहद सख़्त लग सकते हैं, लेकिन जिस शख़्स को मंत्री बने अभी 15 दिन भी नहीं हुए, जो ज़िन्दगी में कभी जन प्रतिनिधि नहीं रहा, जिसने उपलब्धि एक घटिया नौकरशाह की रही हो, वो अचानक जनता को अपमान सूचक शब्द कैसे बोल सकता है। अल्फोंस कहते हैं, ‘पेट्रोल भरवाने वाले भूखे नहीं मर रहे।’ अरे मूर्ख, क्या रोज़ाना नये रिकॉर्ड बना रही महँगाई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए भूखे मरने की कोई शर्त देश में लागू हो गयी है? इसी मूर्ख ने मंत्री बनते ही पहले कहा कि केरल में बीफ़ का खाना जारी रहेगा। फिर कह दिया कि भारत आने वाले विदेशी अपने देश से बीफ़ खाकर आयें। इस मूर्ख को इतना भी नहीं पता कि जिन विषयों पर निर्लज्जता और संवेदनहीनता पूर्वक बयान दे रहा है, वो पर्यटन राज्यमंत्री होने के नाते उसके क्षेत्राधिकार में ही नहीं है!

बीफ़ के बारे में या तो राज्य सरकार बोले या केन्द्रीय खाद्य मंत्री या इनका प्रवक्ता। आप कौन हैं भाई! यही हाल, पेट्रोलियम पदार्थों का है। क्या आप पेट्रोलियम मंत्री हैं, वित्त मंत्री हैं, तेल कम्पनियों के प्रवक्ता हैं? दरअसल, आप सिर्फ़ मूर्ख हैं। मूर्ख ही बिलावजह फटी में टाँग अड़ाते हैं। सच तो ये है कि आप सठिया गये हैं, आपका मानसिक सन्तुलन हिल चुका है। ज़िन्दगी भर आपने ग़रीब जनता की ख़ून-पसीने की कमाई पर ऐश किया। रिटायरमेंट के बाद मोटी पेंशन पाते हैं। आपके बाल-बच्चे अपने-अपने रास्ते लग गये। आप क्या जानें कि पेट्रोल कौन भरवाता है? कैसे लोग मोटरसाइकिल और कारों पर चलते हैं? इतने समझदार तो आप हो ही नहीं सकते कि जान सकें कि कैसे पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों का असर हर चीज़ की महँगाई पर पड़ता है?

सबको पता है कि लोकतंत्र में सरकारी ख़जाना जनता से लिये गये टैक्स से ही बनता है। जनता के पैसों को जनता के लिए ही ख़र्च किया जाता है। लेकिन क्या जनता तब अपनी आवाज़ नहीं उठाएगी, जब आप बेतहाशा टैक्स लगाएँगे? आख़िर टैक्स लगाने का भी कोई सिद्धान्त होता है या नहीं? किस चीज़ पर कितना टैक्स लगना चाहिए, इसका कोई विधान होता है या नहीं? अरे अल्फोंस बाबू क्या आपको पता है कि महँगाई से हाहाकार कर रही जनता पर कच्चे तेल का भाव से अंगारे नहीं बरस रहे हैं, बल्कि मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों ने उसका जीना मुहाल कर रखा है? अप्रैल 2015 से मार्च 2017 के बीच पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 150% और डीज़ल पर 374% बढ़ चुका है। किसने बढ़ाया इसे? पेट्रोलियम का दाम को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करते वक़्त किसने कहा था कि क़ीमतें बाज़ार में ही तय होगी और सरकार इसमें कोई दख़ल नहीं देगी? जब-तब उत्पाद शुल्क को बढ़ा देना क्या दख़ल नहीं है?

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माना कि सरकार टैक्स के पैसों से जन कल्याण के काम करती है तो भी किस चीज़ पर कितना टैक्स होना चाहिए, ये देखना किसका काम है? याद रखिए, यदि सरकार ख़ूब सोच-समझकर पेट्रोलियम का दाम उछाल रही है, तो जनता भी कोई कम नहीं सोच रही है। जनता को पता है कि आपको कैसे घर तक छोड़कर आना है। उसने पहले भी अच्छे-अच्छों को घर तक पहुँचाया है। फिर आप किस खेत की मूली हैं! इत्मिनान रखिए, मंत्री जी, वक़्त तो आपका भी तय हो चुका है!

इसके अलावा, अल्फोंस जी, आपका ये क्या शब्दावली है कि ‘यूपीए के कार्यकाल में जो भी पैसा सरकार को मिला, मंत्रियों ने खा लिया, चुरा लिया। सत्ताधारी पार्टी के लोग पचा गये।’ वाह! क्या बात है, पिछली सरकारों के मंत्री सब खा-पचा गये! तो क्या आपको जनता ने शौचालय के बाहर बैठकर भजन करने के लिए चुना था? साढ़े तीन साल बीत गये, पुराने भ्रष्ट मंत्रियों में से कितनों को आपने जेल की हवा खिलायी? मूर्ख न हों तो, यानि ज़रा सी भी अकल हो तो इस मामूली से सवाल का जवाब ही देश को दे दीजिए। मुफ़्त में किसी को भी या हरेक को चोर-बेईमान बता देना तो भगवा ख़ानदान के डीएनए में ही है। लेकिन इत्मिनान रखिए, जनता आपका भी वैसे ही पाई-पाई का हिसाब करेगी, जैसे वो बीते 70 साल से करती आयी है।

अल्फोंस जहाँ मूर्ख साबित हुए हैं, वहीं पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने भी अपने मन्दबुद्धि का प्रमाण दिया है। बात हो रही है, पेट्रोल-डीज़ल-गैस के आसमान छूते भाव की और प्रधान हैं कि ज्ञान दे रहे हैं कि GST लागू नहीं है, इसलिए देश में क़ीमतें एक सी नहीं हैं। अरे भाई, जब से GST की बात उठी थी, तभी से पेट्रोलियम को इससे बाहर रखने की बात होती रही। अन्ततः हुआ भी यही। आगे जब कभी ये GST के दायरे में आएगा, तब आएगा। अभी मुद्दा ये नहीं है कि क़ीमतें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्यों हैं? बल्कि मुद्दा ये है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर केन्द्र और राज्य सरकार सभी ने मिलकर बेतहाशा टैक्स ठोंक रखा है। टैक्स को कम कीजिए। दाम को ऐसा बनाइए जैसा आस-पड़ोस के देशों में है। जनता को इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन-कितना टैक्स ऐंठ रहा है? वो तो सिर्फ़ इतना समझती है कि किसी वस्तु की उत्पादन लागत क्या है और उस पर किस अनुपात से टैक्स लगाना मुनासिब होगा? कुलमिलाकर, उसे किस वाज़िब क़ीमत पर सामान मिलना चाहिए।

ये बात धर्मेन्द्र प्रधान से पूछने लायक है कि यदि 26 मई 2014 को भारत ने 6,330.65 रुपये प्रति बैरल पर कच्चा तेल ख़रीदा था और 11 सितम्बर 2017 को इसका दाम गिरकर 3,368.39 रुपये प्रति बैरल हो गया, तो जनता को इस 60 प्रतिशत गिरावट का फ़ायदा क्यों नहीं दिया गया? क्या जब आप सत्ता में आये थे तब आपने कहा था कि पेट्रोल-डीज़ल-गैस के ज़रिये आप जनता का ख़ून चूसेंगे? तब तो आपने जनता की ज़िन्दगी को ख़ुशगवार बनाने का वादा किया था। तो क्या हमारा ख़ून चूसकर आप हमें ख़ुशियाँ दे रहे हैं?

जनता का ख़ून चूसकर कौन हो रहा है मालामाल?

तेल की ऊँची क़ीमतें से आम जनता जितना कराह रही है उतना ही केन्द्र और राज्य सरकारों के अलावा ऑइल मार्केटिंग कम्पनियाँ मालामाल हो रही हैं। इनकी आमदनी बेहिसाब बढ़ रही है। इनके अलावा, अमीरों की सेवा करने वाला विमानन क्षेत्र भी भरपूर मज़े लूट रहा है। क्योंकि विमानन का ईंधन (एयर टरबाइल फ्यूल) कच्चे तेल की अन्तर्राष्ट्रीय क़ीमतों से सबसे कम प्रभावित रहता है। भारत में ये अन्य देशों के मुक़ाबले मामूली सा महँगा तो हो सकता है, लेकिन इसका दाम अनाब-शनाब नहीं हो पाता। एटीएफ ही विमानन की लागत का 90 फ़ीसदी तक होता है। इस वजह से भी बीते तीन साल से हवाई यात्रियों में 20 फ़ीसदी सालाना का इज़ाफ़ा दिखायी दिया है। इसके चलते भी रेलों में सेकंड एसी के मुसाफ़िरों की तादाद घटी है। अभी एयरलाइन्स कम्पनियों का धन्धा इस क़दर तेज़ी पर है कि उसे पायलट, विमान, लैंडिंग स्लॉट्स और रनवे तक की कमी झेलनी पड़ रही है। ये मोदी राज का ऐसा चेहरा है, जो हमें सूट-बूट की सरकार वाले तंज की याद दिलाता है!

तेल कम्पनियों और सरकार की पौ-बारह

भारत, दुनिया में कच्चे तेल (क्रूड) का सबसे बड़ा आयातक है। हम रोज़ाना 45 लाख बैरल (159 लीटर) क्रूड का आयात करते हैं। इस पर रोज़ाना 17 अरब रुपये से ज़्यादा विदेशी मुद्रा ख़र्च होती है। तीन साल पहले ये बोझ दोगुना था। भारत अपनी आवश्यकता से अधिक क्रूड का आयात करता है। क्योंकि हमारी तेल कम्पनियों की परिशोधन (रिफ़ानिंग) की क्षमता घरेलू माँग से ज़्यादा है। क्रूड का बड़ा आयातक होने के बावजूद भारत पेट्रोल और डीज़ल का बढ़ा निर्यातक भी है। हालाँकि, निर्यात में एक तिहाई हिस्सा निजी क्षेत्र का है। लेकिन देश में कुल निर्यात में इस क्षेत्र का पाँचवा हिस्सा है। एक समय तो ये आईटी सेक्टर के बराबर था।

मई 2014 के बाद से क्रूड का दाम क़रीब 60 फ़ीसदी गिर चुका है। लेकिन बार-बार उत्पाद कर (एक्साइज़) और वैट (मूल्य संवर्धित कर) को बढ़ाकर सरकारों ने न सिर्फ़ जनता को मिलने वाली राहत को ढकार लिया, बल्कि टैक्स को ख़ून चूसने वाली ऊँचाई पर पहुँचा दिया। अप्रैल 2015 से मार्च 2017 के बीच सरकार को पेट्रोलियम पर वसूले गये टैक्स से 1.6 खरब रुपये की अतिरिक्त कमाई हुई। आनुपातिक दृष्टि से देखें तो इस दौरान पेट्रोल पर उत्पाद कर 150 फ़ीसदी बढ़ गया। जबकि डीज़ल के मामले में तो ये 374 फ़ीसदी से अधिक रहा। मार्च 2014 में समाप्त वित्त वर्ष में पेट्रोलियम सब्सिडी 1.4 खरब रुपये थी। ये इस साल मार्च में महज 19 हज़ार करोड़ रुपये रह गयी। इस बचत का इस्तेमाल ढाँचागत योजनाओं, सरकारी बैंकों का घाटा पाटने और मनरेगा जैसी योजनाओं में किया गया। तेल की कमाई से ही सरकार अपने वित्तीय घाटे को काबू में रख पायी। वैसे तेल की क़ीमतों में अलावा इसमें रुपये के मुकाबले विदेशी मुद्रा के विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) के कमोबेश नियंत्रित रहने की भी अहम भूमिका रही है।

लेकिन पूरे प्रसंग का दूसरा पहलू ये भी है कि बैंकों के 8 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुँचे NPA (डूबा हुआ क़र्ज़) और नोटबन्दी के आत्मघाती फ़ैसले ने देश की अर्थव्यवस्था की क़मर तोड़ दी। देखते ही देखते देश मन्दी और भयंकर बेरोज़गारी के दलदल में जा पहुँचा। अगर सरकार ने तेल की क़ीमतों की बदौलत आम जनता का ख़ून नहीं चूसा होता तो उसकी माली हालत और चरमरा जाती। उसके पास जन कल्याण की योजनाओं को चलाने के लिए भी पैसा नहीं होता। सरकारी निवेश कमज़ोर पड़ता तो अर्थव्यवस्था की विकास दर 5.7 फ़ीसदी से भी कहीं नीचे जा पहुँची होती। कुलमिलाकर, आर्थिक मोर्चे पर मिली चौतरफ़ा नाकामी की भरपायी के लिए तेल की क़ीमतों को क़हर बनाकर इस्तेमाल करने से तो मोदी सरकार की रही-सही साख़ का डूबना भी तय है। सरकार में बैठे निर्लज्ज और संवेदनहीन मंत्रियों के होश तब ठिकाने आएँगे, तब जनता की बेरहम लाठी उन पर बरसेगी!