साढ़े तीन साल के महाप्रतापी कार्यकाल और इसकी महा-ऐतिहासिक उपलब्धियों की समीक्षा करके जहाँ एक ओर दिल ख़ुशियों से लबरेज़ है, वहीं अवसाद भी प्रचंड है! सोचता हूँ कि 17 सितम्बर 1950 को जिस देवपुरुष का गुजरात की पावन धरती पर अवतरण हुआ, वो यदि 25 साल के होते ही लोकसभा के सदस्य और देश के प्रधानमंत्री हो गये होते तो आज सवा सौ करोड़ भारतीयों की दशा क्या होती! ये सोचकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएँगे! जैसे ही आप ये कल्पना करेंगे कि जिस नरेन्द्र मोदी को भारतवर्ष ने 2014 में अपना प्रधान सेवक बनाया, वो यदि 1975 में यानी 25 के होते ही देश के चौकीदार बन गये होते तो अब उनके 67 का होने पर क्या आलम होता!

ये कल्पना-लोक भी ग़ज़ब की चीज़ है! 1975 में यदि मोदी देश के मुखिया बन गये होते तो 1980 तक तो भारत महाशक्ति बन चुका होता! ‘विकास’ आज 42 साल का गर्वीला जवान होता! देश से भूख-ग़रीबी, बेकारी-बेरोज़गारी, अपराध-कुपोषण वग़ैरह कब के ग़ायब हो चुके होते! शिक्षा-स्वास्थ्य, सूखा-बाढ़ से जुड़ी चुनौतियों पर कब का काबू पा लिया गया होता! हमारी प्रति व्यक्ति आय आज विश्व में सर्वाधिक होती! अब तक तो हम सोने की चिड़िया क्या हीरे का बाज़ बन चुके होते! ऐसे ही कितने विचार मन में इतनी तेज़ी से उमड़ रहे हैं कि उन्हें यहाँ शब्दों पर उतार पाना भी असम्भव हो रहा है!

यदि 1975 में ही परम प्रतापी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की नैसर्गिक प्रतिभा वाला व्यक्ति भारत माता की भौगोलिक सत्ता के शीर्ष पर होता तो हमें न तो आपातकाल के दिन देखने पड़ते, न मोरारजी-चरणसिंह, न इन्दिरा गाँधी की पुनर्वापसी, न उनकी हत्या, न राजीव काल, न विश्वनाथ-देवेगौड़ा-गुजराल युग, न नरसिम्हाराव, न अटल और न ही मनमोहन! सोचिए राष्ट्रीय कलंक के ऐसे सभी दौर को हटाने मात्र से ही क्या शमाँ आँखों के आगे घूम जाता है! 1975 से लेकर अब तक एकछत्र मोदी राज रहा होता जो आज देश में कोई घोटाले की परिभाषा भी नहीं जानता होता! कालाधन का भी सोचिए भी मत! हर किसान आज देश का सबसे ख़ुशहाल व्यक्ति होता!

42 साल तक बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से दौड़ने वाले ‘विकास’ की झोली में सारे ओलम्पिक पदक अठखेलियाँ कर रहे होते! कोई हमें ग़ुमराह नहीं कर पाता कि 60 साल में काँग्रेस ने किया क्या! वंशवाद का कोढ़ नहीं होता! 1947 से लेकर 1975 तक देश जो गर्त में गया, उसकी सारी धूल न जाने कहाँ होती! अब 67वीं सालगिरह पर भक्त मंडलियाँ गली-गली घूमकर भारतनाट्यम कर रही होती, क्योंकि अन्य किसी शास्त्रीय नृत्य में भारत का नाम नहीं है! सोचिए आज देश में कोई ये बोलने वाला नहीं होता कि 70 सालों तक वो सिर्फ़ देश को लूटते रहे, ‘देश से पहले दल’ को करते रहे!

अब ज़रा ये तय कीजिए कि यदि ऐसा सब कुछ नहीं हो सका, यदि आज भी भारत एक भूखा-नंगा देश ही है तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? किसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए? किसे सूली पर चढ़ाना चाहिए? पहला क़सूरवार तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसका तत्कालीन नेतृत्व है, जिसने नरेन्द्र मोदी की बहुमुखी प्रतिभा को, उनके विलक्षण व्यक्तित्व को सही वक़्त पर नहीं पहचाना! हीरे को नहीं पहचानने का क़सूर तो पारखी या जौहरी का ही कहलाएगा। सोचिए यदि 1975 में ही संघ ने भारतवासियों को बताया होता कि नरेन्द्र मोदी के रूप में साक्षात भगवान विष्णु अवतरित हो चुके हैं, तो क्या एक-एक भारतवासी मोदी के क़दमों में नहीं गिर गया होता! भगवान का विरोधी कौन होता! यदि कोई असुर होता भी, तो प्रभु-लीला के आगे वो कितनी देर टिक पाता!

साफ़ है कि 70 साल के सभी कलंकों का, सभी ‘विफलताओं के स्मारक’ का प्रथम ग़ुनहगार वो संघ है जो नैसर्गिक रूप से परम प्रतापी, परम चिन्तनशील, परम त्रिकालदर्शी, परम वैज्ञानिक, परम दार्शनिक और परम योद्धा वग़ैरह सब है। सर्वज्ञ है। दूसरे दर्ज़े के कसूरवार, हरेक भारतवासी के श्रद्धेय पूर्वज हैं, जिन्होंने कभी संघ में विद्यमान इन अलौकिक गुणों को नहीं पहचाना, 2014 से पहले संघ की अफ़वाहें फ़ैलाने वाले तंत्र पर यक़ीन नहीं किया! जो संघ के पृथ्वी पर अवतरण यानी 1925 से लेकर 2014 तक लगातार इसकी बातों में आने से परहेज़ करते रहे!

वैसे तो हिन्दुत्ववादी संस्कारों में पूर्वजों और बुज़ुर्गों के आचरण और विवेक पर सवाल खड़े करने को अशोभनीय माना जाता है, लेकिन सच को आख़िर दबायें भी तो कैसे और कब तक? सोचिए, यदि हमारे पुरखों की समय रहते आँख खुली होती तो न तो भारत पर 700 साल तक मुसलिम शासकों का शासन होता, न हम 300 साल तक अँग्रेज़ों के ग़ुलाम रहते, यहाँ तक कि आज़ादी के 70 साल बाद भी देश में हुआ क्या, ऐसी बातें हमारे कानों में झन्नाहट पैदा नहीं कर पातीं! सारा मंज़र ही अलग होता, यदि हमारे पुरखों से समय रहते संघ को समझ लिया होता!

बहरहाल, पुरखों के कर्मों को अब तो भोगना पड़ेगा! अब ये कहने से कोई फ़ायदा नहीं कि ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ! अब तो जो हो रहा है, उसी पर इतराइए, बलखाइए! अब भी वक़्त है। बीते अनुभवों से सबक लीजिए। 67 सालगिरह के पावन मौके पर प्रदूषित गंगाजल का आचमन करके तथा थोड़ा सा जल हाथ में लेकर संकल्प लीजिए कि अंज़ाम चाहे जो हो लेकिन देश की बागडोर अनन्त काल तक महामानव नरेन्द्र मोदी के हाथों में ही रहेगी! ‘सर्वमंगल मांगल्ये’ के लिए आपको इतना प्रायश्चित तो करना ही होगा!