Image result for modi jaitley  जनता का तेल निकालकर नसीबवाले ने बनाया देश को बदनसीब modi rajnath arun 759

2014 के लोकसभा चुनाव के वक़्त जारी हुए बीजेपी के घोषणापत्र में क्या कहीं लिखा है कि ‘अच्छे दिन’ के दस्तक देते ही पेट्रोल-डीज़ल पर ऐसा टैक्स लगा दिया जाएगा कि देश की सवा सौ करोड़ जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करने लगेगी? या फिर लोकसभा के बाद हुए दर्जनों विधानसभाओं के चुनाव से पहले जारी हुए किसी भी घोषणापत्र में ऐसा कोई वादा था कि भगवा-विजय के बाद जनता पर कमर तोड़ टैक्स का बोझ डाल दिया जाएगा, क्योंकि संघ-बीजेपी को ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ बनाना है। और, ये तब तक नामुमकिन है जब तक कि पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें आसमान नहीं छूने लगेंगी? क्या बीजेपी ने कभी ये वादा किया था कि ‘अच्छे दिन’ सिर्फ़ उसके आएँगे और उसके ‘अच्छे दिन’ में जनता का ज़्यादा ख़ून चूसा जाएगा, क्योंकि ‘70 साल’ में काँग्रेस ने आम जनता पर कम टैक्स का बोझ डालकर देश का बेड़ा गर्क कर दिया है?

इन प्रश्नों के उत्तर जनता को ख़ुद ढूँढ़ने होंगे, क्योंकि हमारे वाचाल प्रधान सेवक जी वैसे तो दिन-रात बोलते रहते हैं, जो नहीं बोलना चाहिए, उसे भी बोलने से परहेज़ नहीं करते। लेकिन जिन संवेदनशील मुद्दों पर उन्हें राष्ट्र से संवाद करना चाहिए, देश का कौतूहल शान्त करना चाहिए, उन विषयों पर उनकी बोलती बन्द रहती है। उनकी ‘मन की बात’ भी महज ढकोसला होता है। उन्हें फ़ालतू के ट्वीट करने का चस्का है। लेकिन काम की बातें करने में ‘नानी याद आती’ है! मोदी राज के ऐसे रवैये को देखकर यदि आप ख़फ़ा नहीं हैं, यदि आपका ख़ून नहीं खौलता तो यक़ीनन आप उस अफ़ीम के नशे में हैं जो भगवा ख़ानदान आपको लगातार चटा रहा है!

मोदी सरकार ने सत्ता पाने के चार महीने के भीतर तेल कम्पनियों को आज़ाद कर दिया कि वो अपनी लागत और मुनाफ़े वग़ैरह के हिसाब से पेट्रोल-डीज़ल के दाम तय करें। यानी, कच्चे तेल के अन्तर्राष्ट्रीय दाम के हिसाब से पेट्रोल-डीज़ल का दाम तय करते रहिए और मौज़ कीजिए। सरकार न तो तेल कम्पनियों को इनके दाम पर सब्सिडी देगी और न ही दाम को क़ाबू में रखने का दबाव डालेगी। लेकिन वास्तव में ये तो थे ‘ख़ाने के दाँत’। ‘दिखाने का दाँत’ ये रहा कि बीजेपी की सरकारों ने पेट्रोल-डीज़ल को कामधेनु गाय बना दिया। तब से अब तक सरकार के सारे वित्तीय कुप्रबन्धन का बोझ पेट्रोल-डीज़ल के मत्थे मढ़ दिया गया!

दरअसल, मोदी राज के आते ही अर्थव्यवस्था का सत्यानाश होने लगा, क्योंकि इन नीयतख़ोरों को राज करने का तो कोई शऊर कभी रहा ही नहीं! अर्थव्यवस्था रूपी नाँव की पतवार इन अनाड़ियों या यूँ कहें कि मूर्खों के हाथ में थी, जिन्हें गहरे समुन्दर की चुनौतियों का न तो कोई आभास था और न ही अनुभव! अप्रत्याशित रूप से इन्हें सत्ता ऐसे मिल गयी जैसे अन्धे के हाथ बटेर लग जाए! प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं में मदमस्त हो गये और वित्त मंत्री अपने खेलों में! उनके सामने जब वित्त मंत्रालय की चुनौती आती तो रक्षा मंत्रालय भाग खड़े होते। देखते ही देखते वित्तीय हालात बहुत ख़राब होते चले गये। आज आलम ये है कि जीडीपी की विकास दर की साँस को चलाये रखने के लिए सरकार ढाँचागत योजनाओं पर भारी ख़र्च कर रही है। ख़ुद वित्तमंत्री ने कहा है कि सिर्फ़ आधारभूत योजनाओं पर हो रहे ख़र्च और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) ने लाज़ बचा रखी है!

दिन-रात सुर्ख़ियों में रहने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने जेटली पर ख़ूब हमले किये। लेकिन जेटली ने मर्ज़ का इलाज़ करने के बजाय स्वामी को ही ठिकाने लगाने का रास्ता पकड़ लिया। मोदी-शाह-संघ, सभी पर जेटली जैसे शातिर की तगड़ी पकड़ थी। लिहाज़ा, स्वामी को मुँह की खानी पड़ी! इसकी खिसियाहट में स्वामी ने अपनी बन्दूक का रूख़ रघुराम राजन की ओर घुमा दिया। जेटली ने राजन का सिर मुड़वाकर अपना दामन बचा लिया। इस बीच, बजट आते रहे। बयानबाज़ी होती रही। आर्थिक आँकड़े आते रहे और अर्थव्यवस्था की मिट्टीपलीद की दास्ताँ सुनाते रहे। जब-जब ऐसा हुआ तब-तब मोदी सरकार ने खीज़ मिटाने के लिए अपनी हर नाकामी का ठीकरा काँग्रेस पर फोड़ने तथा बेहतर टैक्स वसूली के आँकड़ों से देश की आँखों में धूल झोंकने का काम किया!

जनता को ये नहीं बताया गया कि टैक्स की कुल रक़म में इज़ाफ़ा अर्थव्यवस्था के बेहतर होने की वजह से नहीं, बल्कि टैक्स की दरों को ‘दिन दूना रात चौगुना’ बढ़ाने की वजह से है। टैक्स बढ़ाने के लिए पेट्रोल-डीज़ल से बढ़िया कोई और आवश्यक वस्तु तो हो ही नहीं सकती थी। जनता पर ये ज़ुल्म इतना ज़बरदस्त रहा कि 19 अक्टूबर 2014 को जब पेट्रोल-डीज़ल के भाव को छुट्टा छोड़ा गया तब दिल्ली में पेट्रोल के दाम में केन्द्र और राज्यों के टैक्स का कुल हिस्सा जहाँ 31 फ़ीसदी था, वो अब 52 फ़ीसदी पर जा पहुँचा है। इसी तरह, इसी अवधि में डीज़ल के मूल्य में टैक्स का हिस्सा 18 से बढ़कर 45 फ़ीसदी पर जा पहुँचा!

आततायी (सताने वाला) मोदी सरकार के कलेज़े को इतने से भी ठंडक नहीं मिली। जब-जब कच्चे तेल के दाम नीचे गिरे तब-तब मोदी-जेटली ने इस पर उत्पाद कर (एक्साइज ड्यूटी) बढ़ा दिया। पेट्रोल-डीज़ल पर केन्द्र सरकार जहाँ ‘दाम के हिसाब से टैक्स’ (एड वैलोरम) लगाती है, वहीं राज्य सरकारें फ़ीसदी यानी अनुपात के हिसाब से वैट लगाती हैं। इसे यूँ समझिए कि केन्द्र सरकार को पेट्रोल के हरेक लीटर पर 21.48 रुपये उत्पाद कर चाहिए। भले ही कच्चे तेल के भाव में उतार-चढ़ाव आता रहे। लेकिन इससे केन्द्र का उत्पाद शुल्क अपरिवर्तित रहेगा। जबकि राज्यों का वैट अपनी अलग-अलग दर से उस विक्रय-मूल्य पर लागू होगा जो तेल कम्पनियाँ तय करती हैं।

दूसरे शब्दों में, सारी लागत और मुनाफ़े पर उत्पाद शुल्क जोड़ा जाता है। जबकि इस योग (नेट मूल्य) पर वैट लगता है। मसलन, दिल्ली में पेट्रोल पर वैट की दर 27 फ़ीसदी और डीज़ल पर 16.75 फ़ीसदी है। लेकिन तमाम राज्यों में पेट्रोल पर वैट 32-34 फ़ीसदी तक भी है। वैट की दरों की वजह से अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल-डीज़ल का दाम भी अलग-अलग रहते हैं। लेकिन अब वैट की अलग-अलग दरों को लेकर वित्तमंत्री अरूण जेटली और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी जनता के साथ घिनौना मज़ाक कर रहे हैं। जेटली काँग्रेस और विपक्ष शासित राज्यों को ललकार रहे हैं कि वो वैट कम करके जनता तो राहत दें।

अरे महामानव, तुम अपनी बात करो। तुम बताओ कि तुमने कैसे पेट्रोल-डीज़ल को कामधेनु बना डाला? क्या तुमने इसी का वादा किया था? आप बख़ूबी जानते हैं कि आज कितने राज्यों में बीजेपी या एनडीए की सरकारें हैं? आज देश की 70 फ़ीसदी आबादी भगवा तले पल रही है। वहाँ पेट्रोल-डीज़ल पर वैट की दरें क्या हैं? छोड़िए, पूरे देश को, सभी भगवा राज्यों में वैट की दर एक समान क्यों नहीं है? आप विपक्षी पार्टियों से प्रतिस्पर्धा क्यों कर रहे हैं? उनकी तो आपके आगे कोई औक़ात बची ही नहीं! फिर उनका नाम लेकर आप किसे उल्लू बनाना चाहते हैं?

जेटली की तरह ही धर्मेन्द्र प्रधान भी धूर्तता ही दिखा रहे हैं। कहते हैं कि वित्त मंत्रालय पेट्रोलियम को जीएसटी के दायरे में लाये तो दाम पूरे देश में एक हो जाएँगे! अरे ढोंगी, तुम्हारा काम नहीं है पूरे देश में एक मूल्य लागू करना। तुम तो ये बताओ कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम पर मची लूट से जनता को राहत देने के लिए तुम क्या कर रहे हो? बाक़ी, देश को पता है कि पेट्रोलियम अभी जीएसटी से बाहर है। केन्द्र और राज्य, सभी ने पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी से बाहर रखा ही इसलिए था कि वो अपनी-अपनी मनमानी दरों पर जनता से टैक्स की लूट-खसोट कर सकें।

पेट्रोल-डीज़ल के दाम में लगी आग को लेकर जनता तो ख़ून के आँसू रो रही है। लेकिन वित्तमंत्री जनता के ज़ख़्मों पर नमक रगड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। वो विपक्ष पर प्रति-प्रहार करते हुए पूछते है कि क्या विपक्ष शासित राज्यों में टैक्स यानी वैट कम है? क्या पेट्रोल-डीज़ल पर वसूले जाने वाले टैक्स का 42 फ़ीसदी हिस्सा राज्यों को नहीं मिलता है? क्या काँग्रेस शासित राज्य इस हिस्से को नहीं लेते हैं? इसका मतलब तो ये हुआ कि वित्तमंत्री काँग्रेस शासित राज्यों को निहाल करने के लिए पेट्रोल-डीज़ल पर लूट मचाये हुए हैं! क्या 2014 में जनता ने इन्हें विपक्ष शासित राज्यों को निहाल करने के लिए सत्ता सौंपी थी?

मज़े की बात ये भी है कि जिस जीएसटी काउन्सिल ने पेट्रोल-डीज़ल को बाहर रखा, उसमें भी असली दबदबा तो बीजेपी का ही है। विपक्ष के प्रतिनिधि तो सिर्फ़ पंजाब, हिमाचल, कर्नाटक, केरल, ओड़ीशा, बंगाल, मिज़ोरम, मेघालय और त्रिपुरा से ही हैं। बाक़ी, राज्यों के वित्तमंत्री तो भगवा या उसके साथी ही हैं। तो क्या भगवा छतरी के नीचे रह रही जनता को राहत तभी मिल सकती है, जब ‘नकारा और महाभ्रष्ट’ विपक्षी पार्टियाँ अपने राज्य के लोगों को राहत दें! यानी, भगवा सत्ता वाले राज्य भी कथित ‘जनविरोधी काँग्रेसी’ सरकारों से ही प्रेरणा लेकर चलेंगी! अरे भाई, अमित शाह के चेले-चपाटों, तुममें अपने दिमाग़ से चलने, अपनी प्रजा को राहत पहुँचाने का जज़्बा क्यों नहीं है? क्यों ऐसा है कि तुम्हें मक्कारी के सिवाय कभी कोई बात नहीं सूझती!

बहरहाल, ये पब्लिक है, ये सब जानती है। जनता भूली नहीं है कि कैसे चुनाव जीतते ही प्रधानमंत्री ने ख़ुद को नसीबवाला बताया था। वो भी इसलिए कि उनके सत्ता में आते ही कच्चे तेल के दाम बेहद नीचे आ गये थे। लेकिन उसी नसीबवाले ने आगे चलकर देश को ऐसी बदनसीबी के दलदल में ढकेल दिया, जहाँ सिसकारियों के सिवाय और कुछ नहीं बचा। लोकतंत्र में कई बार जनता की आँख देर से खुलती है, लेकिन जब खुलती है तो फिर इसकी आँख में और धूल झोंकना असम्भव होता है। अब साफ़ दिख रहा है कि तेल के खेल में भस्म हो जाएगी मोदी सरकार!

जनता अब विपक्ष के समझाये बग़ैर ही समझ रही है कि मोदी राज ने अपनी वित्तीय नाक़ामियों पर पर्दा डालने और बीजेपी के नेताओं तथा अपने चहेते धन्ना सेठों के काले-धन को सफ़ेद करने के लिए नोटबन्दी का शिग़ूफ़ा छोड़ा था। कोई नहीं जानता कि नोटबन्दी से देश को क्या फ़ायदा मिला? ईमानदारी से नोटबन्दी के बारे में बताने वाले लोगों के मुँह में कपड़ा ठूँस दिया गया है। दरअसल, नोटबन्दी, अपने आप में, देश का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है! इसने रोज़गार और कारोबार को ऐसी लंगी लगायी है कि जनता ख़ून के आँसू रो रही है। अब तक नोटबन्दी से क़रीब दस लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है!

फ़िलहाल, तो जीएसटी भी मोदी सरकार के लिए ताबूत में आख़िरी कील का ही काम कर रही है। वो भी सिर्फ़ इसलिए कि मोदी-जेटली-शाह जैसे अनाड़ियों ने इसे अपनाते वक़्त अपनी नीयत को और गन्दा कर दिया। इनका मक़सद जनता का भला करना नहीं, बल्कि उससे ज़्यादा से ज़्यादा टैक्स लेकर उसका जीना दूभर करने का ही रहा! ज़मीनी आँकड़ा ये है कि जीएसटी ने आम आदमी पर टैक्स का बोझ 30 फ़ीसदी तक बढ़ा दिया है। नोटबन्दी से लुटी-पिटी अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी ने आग में घी का काम किया है। सच पूछिए तो अब हालात मोदी सरकार के हाथ से निकल चुके हैं। 2019 के चुनाव तक इसका क़ाबू में आना असम्भव है। यानी, ‘अच्छे दिन’ के नाम पर देश को मिले दुःख भरे दिनों के बादल आसानी से छँटते हुए नहीं दिख रहे!