चाणक्य ने मनुष्य को चार श्रेणी में बाँटा। बुद्धिमान, औसत दिमाग़ वाला, मन्द बुद्धि और मूर्ख। जो दूसरे के अनुभवों से सीखे वो बुद्धिमान, जो औरों की ग़लतियों से सबक ले वो औसत बुद्धि वाला, जो ख़ुद ग़लतियाँ करके नसीहत ले वो मन्दबुद्धि तथा जो अपनी ग़लतियों से भी नहीं सीखे वो मूर्ख! भारत में संघियों से बड़ा मूर्ख कभी कोई और नहीं हुआ! अपने जन्म से लेकर आज तक संघियों ने कभी अपनी ग़लतियों से कुछ नहीं सीखा। वो कुतर्क में माहिर लोगों की जमात है। अपनी कमज़ोरी को छिपाने के लिए ये भाँति-भाँति के झूठ गढ़ने और अफ़वाहें फैलाने में माहिर रहे हैं। यही इनका जन्मजात गुण और विशेषता है। जागते हुए ख़्वाब देखना भी इस जमात की अहम विशेषता है। इनका ऐसा ही एक ख़्वाब है ‘भारत का विश्व गुरु बनाना’ तो दूसरा सपना है ‘हिन्दुत्ववादी हिन्दू राष्ट्र’। जिस दिन जागते हुए देखे जाने वाले ख़्वाब सच होने लगेंगे, उस दिन इनका मंसूबा भी पूरा हो जाएगा!

Related image

फ़िलहाल, मूर्खों की इसी जमात का तीन-चौथाई भारत पर राज है। नरेन्द्र मोदी इसके शीर्ष नेता हैं। ये झूठ बोलने के ही नहीं, उसे गढ़ने के भी पुरोधा हैं। कहते थे, पिछली सरकार में निर्णय लेने का साहस नहीं था। इसीलिए फ़ैसले लिये जाने में नाहक देरी और कोताही होती थी। भ्रष्टाचार बढ़ता था। हमें पूर्ण बहुमत वाली सत्ता दीजिए। फिर देखिए, हम कैसे-कैसे फ़ैसलों को दनादन लेकर दिखाएँगे। दिखाये भी। लेकिन इनके 99.99% फ़ैसलों और उसके लेने की प्रक्रिया से सिर्फ़ इतना ही साबित हुआ है कि वाक़ई ये अव्वल दर्ज़े के मूर्खों की सरकार है। जैसे ही इनकी मूर्खता की पोल खुलती है, वैसे ही ये अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए सुबह से शाम तक झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्रहनन का सहारा लेने लगते हैं। दरअसल, इन्हें राज करने का सऊर ही नहीं है!

सर्ज़िकल हमला, नोटबन्दी, पेट्रोलियम पदार्थों के आसमान छूते दाम और हड़बड़ी में लागू की गयी त्रुटिपूर्ण GST जैसे बड़े फ़ैसलों से साफ़ है कि ये कड़े फ़ैसले लेने में असामान्य तेज़ी दिखाते हैं। इनकी सोच बचकाना रहती है। जैसे जल्दी का काम शैतान का! आगे-पीछे सोचने की न तो इन्हें अक़्ल है और न ही समझदार लोग इन्हें कभी फूटी आँख भी सोहाते हैं! यदि इन्हें दनादन फ़ैसले लेने को लेकर ग़लतफ़हमी नहीं होती तो मुम्बई में एलफिस्टन रेल-पुल हादसा नहीं होता। 23 घर नहीं उजड़ते! क्योंकि मूर्खों का ये बुनियादी गुण है कि उन्हें बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते लोग तो दिख जाते हैं, लेकिन ख़तरों से आगाह कर रहे दोस्तों का मशविरा नज़र नहीं आता है!

Image result for mumbai stampede शिवसेना के सांसद अरविन्द सावंत

ये मूर्खता नहीं तो और क्या थी कि आपके ही सहयोगी दल शिवसेना के सांसद अरविन्द सावंत आपको बाक़ायदा लिखित तौर पर उस पुल के बेहद जर्जर होने को लेकर आगाह किया था, जिससे रोज़ाना क़रीब एक लाख मुसाफ़िर गुज़रते हैं! आपकी अर्थव्यवस्था रोज़ाना नये-नये कीर्तिमान बना रही है और आपकी रेलमंत्री मन्दी से मरा जा रहा है। या तो वो झूठा है या आप दोनों! सांसद मरम्मत के लिए 12 लाख रुपये माँग रहा था। उसने सांसद में इसी पुल की समस्या को उठाया था। लेकिन आपकी नीयत गन्दी थी। आपको ये कैसे बर्दाश्त होता कि केन्द्र और महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद पुल की मरम्मत का श्रेय शिवसेना का मिल जाए! लिहाज़ा, दनदन फ़ैसले लेने का झूठ बोलने वाली सरकार ने कछुआ चाल पकड़ ली!

अरे, सरकार की फ़र्ज़ी वैश्विक मन्दी (ग्लोबल स्लो डाउन) और रुपयों की तंगी उस वक़्त कैसे उड़न छू हो जाती है, जब आप हर हफ़्ते कैबिनेट की बैठकों में लाखों-करोड़ों की योजनाओं का नारियल फोड़ते रहते हैं! मज़े की बात ये है कि देश को ये बताने वाला मीडिया नदारद है कि आपके ज़्यादातर ऐलान ढपोरशंखी हैं। फ़ाइलों में झूमते काग़ज़ी शेर हैं। इससे भी ज़्यादा दिलचस्प तथ्य ये है कि आपके मौजूदा और पुराने, दोनों रेलमंत्री बम्बईया हैं। ये पुल इतना महत्वपूर्ण है कि ऐसा हो नहीं सकता कि ख़ुद सुरेश प्रभु और पीयूष गोयल कभी न कभी इस पुल से पैदल न गुज़रे हों। ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ का असर सिर्फ़ मूर्खों पर नहीं होता। वर्ना, इन्होंने ख़ुद यदि लाखों लोगों को हो रही तकलीफ़ का अनुभव किया होता तो आज इतनी गिनती बुद्धिमानों में होती! लेकिन बेचारे अपने डीएनए से लाचार हैं!

40 महीने के मोदी राज में हमेशा यही बात साबित हुई है कि विपक्ष में रहने लायक लोगों को यदि सत्ता मिल जाती है, तो उन्हें बौद्धिक बदहज़मी जकड़ लेती है। इनका हाल उस कुत्ते जैसा है जिसे देसी घी हज़म नहीं होता और इसके सेवन से उसे रोयें झड़ने लगते हैं। 2014 में जनता ने इन्हें सत्ता तो दे दी, लेकिन ये मूर्ख राज करने की बुद्धि कहाँ से लाएँगे! इनके तो दिमाग़ में दिन-रात सियासी फ़ायदा लेने का ही कीड़ा दौड़ता रहता है। इसीलिए जिन मूर्खों के पास पुल की मरम्मत के लिए 12 लाख रुपये नहीं जुटे, उन्होंने ही कुछ ही महीने बाद नये पुल के निर्माण के लिए 13 करोड़ रुपये की योजना बना डाली। तो क्या कुछ ही महीने में वैश्विक मन्दी रफ़ूचक्कर हो गयी? जी नहीं! असली मंशा तो ये थी कि नया पुल बनेगा तो टेंडर होगा, चढ़ावा चढ़ेगा, शिलान्यास होगा, शुभारम्भ का फ़ीता काटेगा, जलसा और भाषण होगा।

ढोल पीटा जाएगा कि अँग्रेज़ों के ज़माने के पुल की 70 साल तक अनदेखी होती रही। लेकिन देखिए, हमने कैसे चुटकियों में पुल बनाकर इसे चालू भी कर दिया! यदि पिछली सरकारें पॉलिसी पैरालिसिस (फ़ैसले लेने में ढिलाई) से पीड़ित नहीं होती तो हम 40 महीने में उतना काम करके कैसे दिखा देते जितना 70 साल में भी नहीं हुआ! लेकिन आपकी सारी बातें खोखली हैं। जुमला हैं। ढोंग हैं। फ़रेब हैं। शिवसेना को सियासी फ़ायदा न मिल जाए, इसलिए आपने उसके कहने पर लाखों लोगों की सुरक्षा से जुड़े पुल की ख़ातिर 12 लाख रुपये नहीं दिये। लेकिन हादसा होने के बाद जनता के ख़ून-पसीने की कमाई से आपको हरेक मृतक के परिजनों को दस-दस लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा करनी पड़ी। 5 लाख रेलवे और 5 लाख महाराष्ट्र सरकार। जिन अक़्ल के अन्धों ने 12 लाख रुपये नहीं दिये, वही 2.3 करोड़ रुपये राहत के नाम पर देंगे। यदि वक़्त रहते बुद्धिमानी दिखायी होती, तो 23 घर उजड़ने से बच जाते!

Image result for mumbai stampede

वैसे 23 लोगों के शहीद होने के बाद अब रेलवे के पास कहाँ से इतने रुपये आ जाएँगे कि पीयूष गोयल ने ऐलान कर दिया कि मुम्बई में भीड़-भाड़ वाले हरेक स्टेशन पर एस्केलेटर्स लगेंगे। अरे मूर्खों, ये साहस आपने पहले क्यों नहीं दिखाया! सिर्फ़ मूर्ख ही हादसों के होने के इन्तज़ार करते हैं! इन्हीं मूर्खों के बारे में याद है ना कि कैसे 2014 के चुनाव से पहले और बाद में भी कई बार भारतीय रेल की तुलना चीन की रेलवे से की जाती रही! तुलना करने में कोई ख़राबी नहीं। लेकिन मूर्खों को कौन समझाए कि भाई, भारत की चीन से तुलना वैसी ही है, जैसे घोड़े की तुलना कार से! यही भगवा ख़ानदान तो कहता रहा है कि भारत को दूसरों (पश्चिम) की नक़ल नहीं करनी चाहिए। हमारी योजनाएँ और नीतियाँ, हमारे स्वभाव और संस्कार के मुताबिक होनी चाहिए।

अरे, 40 महीने से तो आप भी इस देश के ख़ुदा बने बैठे हैं, आपने किस-किस क्षेत्र में चीन को टक्कर देकर दिखाया है? आप सिर्फ़ जुमलों और हवाबाज़ी के सिकन्दर हैं! आपने ताबड़तोड़ रेल परियोजनाओं का ऐलान किया। बुलेट ट्रेन दौड़ाने के लिए आप ऐसे मचलते हैं जैसे बक़ौल सूरदास, ‘मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं’। लेकिन आपके राज में रेलवे का और सत्यानाश हो गया। आपने जितना किराया बढ़ाया है, वैसा तो आज़ादी के बाद से कोई भी सरकार नहीं बढ़ा पायी। फिर भी आपकी रेलवे ठन-ठन गोपाल ही बनी रही, क्योंकि आप मूर्ख हैं! आपको राज करने नहीं आता! आपके राज में ऑक्सीजन बम बन जाता है, बग़ैर पटरी ट्रेन दौड़ती पायी जाती है और आपको हवा तक नहीं लगती!

क्योंकि आप तो पॉलिसी पैरालिसिस (फ़ैसले लेने में ढिलाई) से पीड़ित नहीं हैं! आपने तो 40 महीने में इतना काम करके दिखा दिया है जितना 70 साल में भी नहीं हुआ! इसीलिए आपकी रेलवे दलील देती है कि तेज़ बारिश की वजह से पुल पर जाम लग गया और हादसा हो गया। आपके पास रेलवे के उद्धार के लिए फंड नहीं है, लेकिन आप 3600 करोड़ रुपये की लागत से छत्रपति शिवाजी की मूर्ति लगवाने की लिए लालायित हैं! यही है, आपकी प्राथमिकता! इसके बारे में ही तो संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि ’70 साल में अब पहली बार महसूस हो रही है आज़ादी!’ भई वाह, ये मूर्खों के मुखिया यूँ ही नहीं हैं। इन्होंने तो बग़ैर बोले ही बता दिया कि बीते 40 महीने भी ग़ुलामी की यातनाओं से भरे हुए ही थे! बहरहाल, अब मुम्बई के जो 23 परिवार उजड़ गये हैं, उन्हें आप निर्माणाधीन शिवाजी स्मारक पर ही भीख माँगने के लिए बैठा दीजिएगा, क्योंकि आपके राज में तो फ़ाइलें, सुपरसोनिक (आवाज़ की गति से तेज़) रफ़्तार से दौड़ती हैं!