40 महीने के शासनकाल में मोदी सरकार ने बारम्बार यही साबित किया है कि इसे राज करने नहीं आता। इसे नीतियाँ बनाने का शऊर नहीं है। नीतियों को लागू करने की अक्ल नहीं है। अर्थशास्त्र की समझ रखने वाले किसी भी होशियार व्यक्ति से इनका कोई वास्ता नहीं है। कल्पना कीजिए कि यदि मोदी सरकार को मामूली सी भी समझ होती, यदि चुनावों में लगातार मिल रही कामयाबी से उसमें अहंकार चरम पर नहीं पहुँचा होता तो क्या हो नोटबन्दी को लेकर मुँह की खाने के बाद खोटे जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) को लागू करने के लिए उतावले होते? मोदी राज की ये बेवकूफ़ी देश के लिए ऐसी साबित हुई जैसे ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा!’

मोदी सरकार ने जीएसटी को एक जुलाई से लागू किया। इससे पहले सरकार को अच्छी तरह से पता चल चुका था कि 8 नवम्बर 2016 को लिया गया नोटबन्दी का फ़ैसला बचकाना साबित हो चुका है। नोटबन्दी का फलित देश को बताने से पहले सरकार जान चुकी थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस सनक की देश को न सिर्फ़ भारी कीमत चुकानी पड़ी है, बल्कि अर्थव्यवस्था का और सत्यानाश ही हुआ। जीएसटी ने तो इसे सवा-सत्यानाश बनाने का काम किया। मोदी सरकार ने जीएसटी रूपी औषधि की ऐसी-ऐसी भ्रष्ट ख़ुराक़ तैयार की कि अर्थव्यवस्था रूपी मरीज़ आज आईसीयू (सघन चिकित्सा केन्द्र) में ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहा है!

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Jaipur’s markets are experiencing low sales just days ahead of Diwali. Credit: Shruti Jain

जीएसटी, अपने आप में एक बहुत बढ़िया कर-प्रणाली है। बशर्ते, इसकी दर कम हो, एकसमान हो और इसे सभी चीज़ों पर तथा सभी जगह समान रूप से (यूनिवर्सली) लागू किया जाता। लेकिन मोदी सरकार ने तो सब्ज़ी काटने वाले चाकू को जनता और ख़ासकर ग़रीबों को क़त्ल करने का हथियार बना दिया। अर्थशास्त्रियों ने जीएसटी को उपयोगी बताया है क्योंकि ये बिक्रीकर को विकृत प्रभाव (cascading effect) की रोकथाम करता है। दरअसल, जीएसटी जैसे सभी अप्रत्यक्ष करों का सबसे बुरा और असमान असर ग़रीबों पर पड़ता है। लेकिन यदि जीएसटी को पूरे देश में और सभी वस्तुओं तथा सेवाओं पर एक समान तरीके से यानी यूनिवर्सल स्तर पर लागू किया जाता और इसकी दरें कम से कम रखी जातीं तो इससे समाज में पसरी आर्थिक असमानता को घटाने में मदद मिलती।

टैक्स इक्कठा करने वाले अधिकारियों को भी बढ़िया जीएसटी से सहूलियत होती क्योंकि इससे करों के वर्गीकरण और उससे पैदा होने वाले विवाद कम हो सकते हैं। जैसे ये कैसे तय किया जाए कि किटकैट बिस्कुट है या चॉकलेट! इसी तरह का एक और दिलचस्प उदाहरण है कि एक मिठाई में कई तरह के मेवे (Dry Fruits) इस्तेमाल हुए। कुछ पर टैक्स 6 फ़ीसदी है तो कुछ पर 12 फ़ीसदी। जबकि मिठाई के डिब्बे की पैकेज़िंग मैटेरियल पर 28 फ़ीसदी जीएसटी है। लेकिन दुकानदार जब अपने ग्राहक से टैक्स वसूलता है तो वो सबसे ऊँची यानी 28 फ़ीसदी की दर का इस्तेमाल करता है। हालाँकि, मिठाई की लागत (इनपुट कॉस्ट) में पैकेज़िंग का हिस्सा बेहद मामूली है। तो क्या इसे ही गुड और सिम्पल कहेंगे? ऐसे सवालों का जवाब सिर्फ़ इकलौता और कम जीएसजी दर ही हो सकती है।

जीएसटी को सरकारें पसन्द करती हैं क्योंकि इस उम्दा प्रमाणी में अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद करने की क्षमता (an in-built self-policing mechanism) होती है। ये टैक्स की चोरी को अपने आप रोकती है। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब जीएसटी की दर कम हो। ऐसा होता तो टैक्स की चोरी करने वाले हतोत्साहित होते। इस सबका असर ये होता है कि जीएसटी से सरकार को मिलने वाला राजस्व बढ़ता जाता है। लेकिन मोदी सरकार के जीएसटी में उस उपकर (सेस) को बहुत महत्व दिया गया है, जिसे टैक्स सिद्धान्तों में छलावापूर्ण और निन्दनीय बताया गया है। इसी तरह, सरचार्ज़ को केन्द्र सरकार के ऐसे ख़ुराफ़ाती हथकंडे के रूप में देखा जा सकता है जिससे इक्कठा होने वाली रक़म को वो पूरी तरह से अपने पास रख सकती है। सरचार्ज़ की रक़म को केन्द्र को राज्यों के साथ बाँटना नहीं पड़ता है। यानी, ये राज्यों के हितों पर हमला है।

अब यदि वस्तुओं की ख़रीद-बिक्री के वक़्त होने वाली टैक्स को चोरी में कमी आ जाये तो आयकर या कॉरपोरेट टैक्स जैसे प्रत्यक्ष करों का संग्रह भी ख़ासा बढ़ जाता है। लेकिन केन्द्र सरकार की नीयत में खोट था। इसके जीएसटी में वो सर्विस टैक्स ख़त्म हो गया, जिसे मनमोहन सिंह सरकार ने 12 फ़ीसदी पर रखा था और जिसे मोदी-जेटली ने जीएसटी लागू करने से पहले 15 फ़ीसदी पर पहुँचा दिया था। लेकिन जुलाई के बाद इसकी दर 18 फ़ीसदी कर दी गयी। यानी, जिन सेवाओं पर मनमोहन सरकार 12 फ़ीसदी टैक्स लेती थी, उन पर अभी जनता को 18 फ़ीसदी भरना पड़ा रहा है। इस तरह के हथकंडों ने अन्ततः आम जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ा दिया। इसने महँगाई के लिए आग में घी का काम किया। मोदी सरकार को ये समझ ही नहीं है कि करदाताओं को जीएसटी तभी पसन्द आ सकता है, जबकि उन्हें लगे कि इसने अन्ततः टैक्स को घटाया है, उसे भरने के झंझट को घटाया है और आख़िरकार टैक्स सिर्फ़ अन्तिम उपभोक्ता से ही लिया गया है।

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लेकिन भारत की बदकिस्मती देखिए कि हमारा जीएसटी किसी भी बुनियादी सिद्धान्त पर ख़रा नहीं उतरता। ये यूनिवर्सल नहीं है। पेट्रोलियम, एल्कोहल, बिजली, रियल एस्टेट जैसी चीज़ें जीएसटी से बाहर हैं। जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी क़रीब 40 फ़ीसदी है। यानी, जीएसटी यदि एक अच्छी औषधि है तो भी मरीज़ (अर्थव्यवस्था) के शरीर के 40 फ़ीसदी हिस्से पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। अब सोचिए कि यदि हमारे शरीर का 40 फ़ीसदी हिस्सा पुरानी कर प्रणाली से ही चलता रहेगा, तो फिर जीएसटी का लाभ क्या ख़ाक़ नज़र आएगा!

जीएसटी की कामयाबी के लिए उसकी दर का कम से कम होना बेहद ज़रूरी है। लेकिन मोदी सरकार ने इसकी सबसे ऊँची दर 28 फ़ीसदी रखी है। मज़े तो बात तो ये है कि तरह-तरह के उपकरों को मिलाकर जीएसटी को 70 फ़ीसदी तक पहुँचा दिया गया है। काँग्रेस के नेताओं ने जीएसटी की दर को एक समान 18 फ़ीसदी को रखने का दबाव बनाया था, क्योंकि उन्होंने जीएसटी रूपी कर-प्रणाली की बारीकियों को गहराई से समझा था। वो बात अलग है कि बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए इसका विरोध किया था। सत्ता में आने के बाद उसे काँग्रेस के नेताओं के मशविरे पर ग़ौर करने से नफ़रत बनी रही। अपने ख़ोटे जीएसटी को बीजेपी बार-बार सरल (सिम्पल) टैक्स बताती रहती है। अब ज़रा सोचिए कि 9 टैक्स दरों (स्लैब) वाला जीएसटी सरल कैसे हो सकता है? इसी वजह से मौजूदा जीएसटी में विवादों और मुक़दमेबाज़ी की आशंकाएँ बहुत अधिक हैं।

‘एक देश एक टैक्स’ वाली जीएसटी की मूल कल्पना तो धरी की धरी ही रह गयी क्योंकि इसका संचालन केन्द्र और राज्य सरकारें अलग-अलग करती हैं। इसके लिए हरेक राज्य में अलग-अलग इलेक्ट्रनिक रज़िस्ट्रेशन करवाना ज़रूरी है। करदाताओं को हरेक राज्य में हर महीने तीन रिटर्न दाख़िल करना पड़ता है। कुलमिलाकर, ये सारी प्रक्रिया, इसे सरल के बदले जटिल ही बनाती है। लेकिन इसके बावजूद जीएसटी की शुरुआत करते वक़्त आधी रात को ये शिगूफ़ा छोड़ा जाता है कि इससे जीडीपी में 2 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा होगा। जबकि हुआ इसका ठीक उल्टा है। जीएसटी लागू होने के बाद जीडीपी 2 फ़ीसदी गिर गयी। व्यापार-रोज़गार इतना मुश्किल हो गया कि 8 लाख करोड़ रुपये के ख़राब कर्ज़ (एनपीए) का बोझ झेल रहे हमारे बैंक और चरमरा गये, क्योंकि बैंकों से कर्ज़ लेने वाले ग़ायब हो गये। कर्ज़दार ग़ायब होने से बैंकों को ग़रीब जनता को उसकी बचत पर दिये जाने वाले ब्याज़ की दर को घटाना पड़ा।

कर-प्रबन्धन के जानकारों का मानना है कि भ्रष्ट नौकरशाह जानबूझकर सरल टैक्स को जटिल बनाते हैं। जैसे ही वो तरह-तरह की छूट की कल्पना करते हैं, वैसे ही वो उन स्वार्थी तत्वों को हवा देते हैं जो उनकी मिलीभगत से टैक्स की चोरी करे। इसके लिए टैक्स-प्रेक्टिशनर्स की सेवाएँ ले। जो उसके बदले रिटर्न भरे। ऐसी प्रणाली ही भ्रष्टाचार के दलदल को पैदा करती है। वर्ना, यदि सभी चीज़ों पर 10 फ़ीसदी जैसा एक समान टैक्स लागू हो जाए तो सरकारों को मौजूदा के मुक़ाबले कहीं अधिक राजस्व की प्राप्ति हो। लेकिन दुर्भाग्यवश, मोदी राज का जीएसटी इनमें से किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के इरादे से नहीं लाया गया। इसीलिए, सरकार भले ही कहे कि जीएसटी सरल है, जनता को पता है कि इसमें से सरल ही ग़ायब है! इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में सफ़ाई देते हैं कि जीएसटी के लिए केन्द्र सरकार की जबावदेही महज 30 हिस्से की है। उनका इशारा है कि इसे जिस जीएसटी काउन्सिल ने लागू किया है कि उसमें केन्द्र सिर्फ़ एक वोट वाला सदस्य है। बाक़ी हरेक राज्य का एक-एक वोट है। अब इनसे कौन पूछे कि भाई, देश के 17 राज्यों में बीजेपी या एनडीए की ही सरकार तो है। इन राज्यों में देश की 75 फ़ीसदी आबादी रहती है। दिन-रात झूठ परोसने में जुटे प्रधानमंत्री को ऐसा सच कैसे दिख सकता है? लेकिन मोदी जी, याद रखिए, ये पब्लिक है, ये सब जानती है!