प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति यदि पते की बातें नहीं भी करे तो भी सुर्ख़ियाँ तो बटोरता ही रहता है। ऐसी सुर्ख़ियाँ बटोरने में नरेन्द्र मोदी अपने सभी पूर्ववर्तियों को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। इसीलिए अपनी नीतियों की विफलताओं को भी मोदी ऐसे पेश करते हैं मानो शहीद का तमग़ा भी उन्हें ही मिलना चाहिए। तभी तो अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के एक समारोह में प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि उन्हें मालूम है कि उनके [अदूरदर्शी] आर्थिक फ़ैसलों का सियासी ख़ामियाज़ा उन्हें चुकाना पड़ सकता है। लेकिन देशहित में वो ‘सीने पर गोलियाँ खाने को’ तैयार हैं। क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार और काला धन के सफ़ाये के नाम पर नोटबन्दी और खोटा जीएसटी जैसे [नादानी भरे, लेकिन] कड़े फ़ैसले लिए हैं। लिहाज़ा, इसके प्रतिकूल नतीज़ों की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है।

यानी, सारा क़सूर मेरा है। मेरा मंत्रिमंडल, मेरी पार्टी बीजेपी और मेरा वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सभी निर्दोष हैं। यदि देश की जनता मेरे कुकर्मों की कोई सज़ा देना चाहे तो वो सिर्फ़ मुझे ही दे, मेरे क़ुनबे को नहीं! मज़े की बात ये भी है कि ज़िम्मेदारी लेने की आड़ में प्रधानमंत्री जो तेवर दिखा रहे हैं, उसमें भी उनके स्वभाव के अनुरूप कोई ईमानदारी नहीं है! इसका मक़सद भी जनता को बेवकूफ़ बनाना और उसकी आँखों में धूल झोंकना ही है! क्योंकि असली सवाल तो है कि नोटबन्दी की वजह से जिन सौ से ज़्यादा लोगों की अकाल मौत हुई, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से जिन करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी ख़त्म हो गयी, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से जैसे सारा का सारा काला धन रातों-रात सफ़ेद हो गया, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे?

demonetisation  ज़िम्मेदारी लेने के नाम पर भी देश को बेवकूफ़ ही बना रहे हैं नरेन्द्र मोदी…! demonetisation

Demonetisation Impact

नोटबन्दी को लागू करने के लिए जनता के जो ढाई लाख करोड़ रुपये बर्बाद हो गये, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी के बावजूद न तो आतंकवाद की कमर टूटी और न ही नक्सलवाद की तो इसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की आड़ में पेटीएम जैसी कम्पनियाँ डिज़िटल लेन-देन को बढ़ावा देने के नाम पर जैसे मालामाल हो गयीं, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? नोटबन्दी की वजह से खेती-मज़दूरी और व्यापार-कारोबार ये जुड़ी देश की उस 90 फ़ीसदी जनता को हुई तकलीफ़ की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे, जिसे असंगठित क्षेत्र कहा जाता है? नोटबन्दी की वजह से किसी भी धन्ना सेठ का बाल तक बाँका नहीं हुआ, इसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे?

नोटबन्दी के बाद जैसे पर्याप्त तैयारियों के बग़ैर सरकार ने अपना खोटा जीएसटी देश की जनता पर थोप दिया, उसकी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? इन अदूरदर्शी फ़ैसलों की वजह से औंधे मुँह गिरी देश की अर्थव्यवस्था की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? विकास दर में आयी गिरावट के रूप में सामने आये 4 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री कैसे लेंगे? साफ़ है कि ज़िम्मेदारी लेने की सारी चोचलेबाज़ी सिर्फ़ और सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी है! ताकि प्रधानमंत्री देश को ये सन्देश दे सकें कि उन्होंने जितनी भी नादानियाँ की हैं, वो अन्ततः देश का भला करने के लिए ही की हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। क्योंकि ज़िम्मेदारी लेने का मतलब आख़िर होता क्या है?

सरकार अपने सैनिकों के प्रति ये ज़िम्मेदारी निभाती है कि यदि कर्तव्य-निर्वहन के दौरान वो घायल हो जाते हैं तो उनके इलाज़ का, उनके परिवार की देखरेख का सारा ज़िम्मा सरकार का होगा। यहाँ तक कि यदि वो अपंग हो जाएँ, या शहीद हो जाएँ, तो भी देश एक पूर्व निर्धारित नीति के मुताबिक़ उनकी ज़िम्मेदारियों को उठाएगा या क्षतिपूर्ति करेगा। ऐसा ही अन्य सरकारी कर्मचारियों के मामलों में भी होता है। इसी तरह, सरकार रेल यात्रियों की सुरक्षित यात्रा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती। फिर भी हादसों की दशा में पीड़ितों की मदद की जाती है। यहाँ तक कि जहाँ सरकार क़सूरवार नहीं ठहरायी जा सकती, वहाँ अनुग्रह राशि देकर पीड़ितों की मदद करने की परम्परा है। लेकिन ज़रा सोचिए कि नोटबन्दी और जीएसटी ने जिन लोगों की कमर तोड़ दी, क्या उनकी कोई भी ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री ले सकते हैं? हर्ग़िज़ नहीं! इसीलिए, नरेन्द्र मोदी, हवाबाज़ी दिखाते हुए ‘ज़िम्मेदारी लेने’ की जुमलेबाज़ी करके जनता को सिर्फ़ बेवकूफ़ ही बना रहे हैं!