भारतीय राजनीति अपने स्याह-काल में है। यहाँ गरिमा, प्रतिष्ठा, शिष्टाचार, शील-स्वभाव जैसी मानवीय मूल्यों वाली बातें अब दफ़्नायी जा चुकी हैं। यहाँ एक और प्रधानमंत्री के मुखार-बिन्द से पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेताओं को ताल ठोंककर ग़द्दार, राष्ट्रद्रोही और पाकिस्तान परस्त कहा जाता है तो दूसरी ओर दिल्ली मेट्रो की एक कड़ी, मजेंटा लाइन के उद्घाटन के मौके पर इतना शिष्टाचार भी नहीं दिखाया जाता कि समारोह में कम से कम दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी आमंत्रित कर लिया जाए। इससे भी बड़ी बात ये है कि मोदी-योगी सरकार ने ये सारी करतूतें जानबूझकर, पूरे होश-ओ-हवास में की, वो भी इस सिलसिले में मीडिया और सोशल मीडिया पर हुई सारी छीछालेदर को नज़रअन्दाज़ करके।

2014 में संघियों को सत्ता क्या मिली, उन्होंने 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की सरकार क्या बनायी, उनके पाँव ही ज़मीन पर नहीं रहे। वक़्त बीतने के साथ अहंकार ने हरेक छोटे-बड़े संघी को इस क़दर अपने आग़ोश में ले लिया कि उन्हें अब होश ही नहीं है कि वो क्या उचित कर रहे हैं और क्या अनर्थ! चुनावी कामयाबियों ने उनके अहंकार को आकाश से भी ऊँचा बना दिया है। वो मक्कारी और धूर्तता के रोज़ाना नये कीर्तिमान बना रहे हैं! दिल्ली मेट्रो की मजेंटा लाइन के उद्घाटन के मौके पर सारे समारोह के लिए उत्तर प्रदेश के इलाके को ही चुना गया। ताकि अरविन्द केजरीवाल को आमंत्रित नहीं करना पड़े। जबकि ये बेहद आम बात है कि दिल्ली से जुड़े उत्तर प्रदेश और हरियाणा के शहरों को मिलाकर ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनता है।

आम सहमति का श्रेय विपक्ष को क्यों नहीं?

यदि मोदी-योगी सरीख़े धूर्तों की आँखों में ज़रा भी शर्म होती तो उद्घाटन समारोह में संघियों के साथ अरविन्द केजरीवाल, शीला दीक्षित और अखिलेश यादव जैसे नेताओं को भी होना चाहिए था! क्योंकि मेट्रो लाइन का निर्माण सिर्फ़ संघियों की गाँठ की रक़म से नहीं हुआ है। इसके लिए केजरीवाल, शीला और अखिलेश की सरकारों ने भी संसाधन मुहैया करवाये थे। वैसे भी वो नज़रिया सबसे अलोकतांत्रिक है जिसमें ये मान लिया जाए कि राष्ट्र-निर्माण, विकास वग़ैरह सिर्फ़ सत्ता पक्ष की करता है, विपक्ष नहीं। सत्ता पक्ष को सन्तुलित रखने का दायित्व यदि लोकतंत्र में विपक्ष का भी है तो ये परिपाटी स्थापित होनी चाहिए कि विकास में भागीदारी के लिए उसकी भी वाहवाही हो। हाँ, सरकारें चाहें तो उन नीतियों की उपलब्धियों से विपक्ष को दूर रख सकती हैं, जिन्हें विपक्ष ने नकारा हो, जिसे सिरे से ख़ारिज़ किया हो, जिसमें तरह-तरह से अड़ंगा लगाया हो, लेकिन जो काम सबकी सहमति से होते हैं, उसकी सफ़लता का श्रेय भी सबको क्यों नहीं मिलना चाहिए?

Image result for modi dmrc speech  मोदी-योगी ने साबित किया कि जो शिष्टाचार नहीं जानते वो सियासी अदब क्या जानें! 425

मज़े की बात ये भी है कि वो दिन दूर नहीं जब देश के सर्वश्रेष्ठ उद्घाटनबाज़ नरेन्द्र मोदी इसी मेट्रो लाइन के बाक़ी हिस्से का भी शुभारम्भ कर रहे होंगे और तब उन्हें झकमारकर केजरीवाल से नैन-मटक्का करना ही पड़ेगा, क्योंकि अभी तो बॉटेनिकल गार्डेन से कालकाजी तक 12.64 किलोमीटर वाले हिस्से का ही काम पूरा हुआ है। इसी लाइन का जनकपुरी पश्चिम से लेकर कालकाजी तक का 25.59 किलोमीटर का हिस्सा तो अभी बाक़ी है। बमुश्किल एक साल के अन्दर इस बाक़ी हिस्से के उद्घाटन का मौका भी आ ही जाएगा। वैसे उद्घाटन समारोह का एक और रोचक पहलू ये भी रहा कि मोदी-योगी ने जब केजरीवाल को बुलाया ही नहीं था तो 29 साल से क़ायम अन्ध-विश्वास को तोड़ने के लिए नोएडा में इतने भारी सुरक्षा बन्दोबस्त का क्या तुक़ था?

अरे, ये सरकारी संसाधनों की बर्बादी नहीं तो और क्या थी कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा करने वाले सर्वश्रेष्ठ एसपीजी (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) और योगी की सुरक्षा करने वाले एनएसजी (नैशनल सिक्योरिटी गार्ड) के कमांडो के अलावा 25 एसएसपी, 15 एसपी, 45 डीएसपी, 1900 सिपाही, सैंकड़ों की तादाद में केन्द्रीय सुरक्षा बल, पीएसी (प्रादेशिक सशस्त्र बल) और आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) के जवान तैनात किये गये! लगे हाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के नोएडा दौर से जुड़े अन्ध-विश्वास की बात भी हो जाए। वीर बहादुर सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के उन मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं जो या तो पद पर रहते नोएडा नहीं आये या फिर आने के बाद उन्हें अपनी कुर्सी गँवानी पड़ी। चूँकि, 29 साल में हरेक मुख्यमंत्री के साथ ऐसा हुआ, इसलिए नोएडा दौरे से अन्ध-विश्वास जुड़ गया!

प्रधानमंत्री के भाषण की लफ़्फ़ाज़ियाँ

नोएडा में मोदी ने अपने घिसी-पिटी उपलब्धियों से फिर अपना स्तुति-गान किया। बोले, मैंने रोज़ाना की दर से एक पुराने क़ानून को ख़त्म किया है। पुराने क़ानूनों का सफ़ाया बेशक स्वागतयोग्य है! लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा ‘मुँह मियाँ मिट्ठू बनना’ ओछेपन के सिवाय और कुछ नहीं! अब मोदी को ये कौन बताये कि शरीर-विज्ञान में जैसे मृत ऊतक (Dead Tissues) होते हैं, वैसे ही नियम-विधान की दुनिया में भी पुराने और मृतप्राय क़ानून भी जमा होते रहते हैं। इनके सफ़ाये में भजन करने लायक कुछ भी नहीं है, ना ही कोई वीरोचित पराक्रम! तो फिर बात-बात पर 56 इंची आत्म-स्तुति-गान क्यों?

लफ़्फ़ाज़ प्रधानमंत्री हर चीज़ से अपना क़रीबी नाता दिखाने के फ़िराक़ में कभी बोलते हैं, यूपी मेरा घर है, मैं अपने घर आया हूँ, मैं यूपी का बेटा हूँ, यूपी ने मुझे गोद लिया है! जनता भूली थोड़ी है कि अभी-अभी आपने गुजरात और हिमाचल के किन-किन इलाकों में ऐसे ही झाँसों को बेचा है! इसीलिए हे धूर्तज्ञ, ये सब मक्कारी है! आपका बस इतना बोलना ही पर्याप्त है कि अब यूपी मेरी कर्मभूमि है, क्योंकि मैं यही से चुना गया हूँ! अब आपको ये कौन बताये कि सिर्फ़ कर्मभूमि का ही बदलना सम्भव है। घर, बेटा वग़ैरह बदले नहीं जाते! अरे, सबको पता है कि कल तक मणिनगर आपका हमबिस्तर था! आज वाराणसी है! कल का किसे पता?

Image result for modi dmrc speech  मोदी-योगी ने साबित किया कि जो शिष्टाचार नहीं जानते वो सियासी अदब क्या जानें! maxresdefault

अपना स्तुति-गान करने के लिए मोदी को एक बार फिर से एलईडी बल्ब की यादों ने भी सताया। उन्होंने सियासी धूर्तों की तरह विधवा-विलाप किया कि पहले जो एलईडी बल्ब 400 रुपये का था अब 50 रुपये का हो गया है! अब अपने आत्म-मुग्ध प्रधानसेवक को कौन ये समझाए कि एलईडी बल्ब के सस्ता होते जाने में उन्होंने कोई चमत्कार नहीं किया है! वक़्त के साथ हरेक इलेक्ट्रॉनिक सामान सस्ता होता जाता है। यही एलईडी के मामले में भी हुआ है! अलबत्ता, मोदी सरकार ये नहीं बताएगी कि एलईडी को बढ़ावा देने के लिए उसने इस पर कितना जीएसटी लगाया है?

अतिशय वाचाल प्रधानमंत्री मोदी उन बातों के बारे में चूँ तक नहीं करते जो देश को बेहद गम्भीरता से झकझोर रहे होते हैं। जैसे, भगवा राज में बात-बात पर नफ़रत और उत्तेजना फ़ैलाने वाले तत्वों ने क्रिसमस के मनाये जाने का भी विरोध करना शुरू कर दिया है। इससे पहले, बीजेपी के ही वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने ये कहकर सनसनी फैला दी थी कि नोटबन्दी के विनाश को कमतर करके दिखाने के लिए सरकार ने विकास दर के आँकड़ों में हेरफ़ेर करवाया था और मूडीज़ तथा फ़िंच जैसी रेटिंग एजेंसियाँ पैसे खाकर फ़र्ज़ीवाड़ा करती हैं।

ये मामूली मुद्दे नहीं हैं, क्योंकि जैसे शैशवावस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था एक क्रम है वैसे ही क्रिसमस, ईद, मोहर्रम, गुरु परब का विरोध करते हुए हिन्दूवादियों को उस दिन को देश के आगे लाकर खड़ा करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा जब महाराष्ट्र में दुर्गापूजा का तो बंगाल में गणेशोत्सव का, दिल्ली में अयप्पा जयन्ती का तो पंजाब में ओणम का विरोध ज़रूर किया जाएगा! यक़ीन जानिए, उस दिन भारत ख़त्म हो जाएगा। लेकिन यही तो संघियों की सनक है!

चलते-चलते:

संघ परिवार वैसे तो हमेशा से अशिष्टों की जमात रहा है। लेकिन जहाँ तक राजनीतिक शिष्टाचार या सियासी अदब का सवाल है, उसमें अटल बिहारी वाजपेयी का कोई सानी नहीं हो सकता। वाजपेयी ने बांग्लादेश बनने के बाद इन्दिरा गाँधी को दुर्गा कहा था! वाजपेयी जब 1977 में विदेशी मंत्री बने तो अपने कमरे में पहुँचकर उन्हें लगा कि वहाँ से जवाहर लाल नेहरू की तस्वीर नदारद थी। पूछने पर उन्हें बताया कि तस्वीर को इसलिए हटवा दिया गया क्योंकि शायद वो इसे नापसन्द करते। तब वाजपेयी ने नेहरू की तस्वीर को वापस लगवाया। इसी तरह, प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकसभा में वाजपेयी ने कहा कि ये कहना पुरखों का अपमान होगा कि उनसे पहले देश में कुछ नहीं हुआ। देश ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जो हमारे बुज़ुर्गों की अथक मेहनत से ही हो पाया। लेकिन वाजपेयी जी को अपनी पार्टी का युग पुरुष और यहाँ तक कि ‘भारत मार्ग विधाता’ बताने वाले नरेन्द्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि 70 सालों तक देश को सिर्फ़ लूटा गया है! नेहरू-गाँधी परिवार ने देश को लूटा है!

राजनीतिक शिष्टाचार से विहीन कोई धूर्त और निर्लज्ज ही ऐसे बयान देकर अपनी रोटियाँ सेंकने पर यक़ीन रख सकता है! चूँकि नरेन्द्र मोदी को ऐसी भाषा पसन्द है इसलिए उन्हें ख़ुश करने पर आमादा भक्त-मीडिया हरेक शिलान्यास, उद्घाटन या सरकारी पैकेज़ के ऐलान को ‘प्रधानमंत्री का तोहफ़ा’ बोलता है! लेकिन इसी मीडिया के तब बोल नहीं फूटते जब नरेन्द्र मोदी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चुनाव सभा में देशद्रोही और पाकिस्तान परस्त बताते फ़िरते हैं। मीडिया, क्यों ऐसे शिष्टाचार और मर्यादा-विहीन बयानों को शर्मनाक तक नहीं कह पाता? मीडिया के सुर क्यों नहीं फूटते कि यदि मनमोहन सिंह, देशद्रोही हरक़तों में लिप्त थे तो उन्हें सज़ा नहीं दे पाने वाले प्रधानमंत्री निकम्मे हैं। लेकिन ख़ौफ़ के मौजूदा दौर में इतना बोलने की हिम्मत कहाँ से आएगी!