दिन-रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुणगान करने में जुटे भक्त मीडिया ने आपको ये ज़रूर बताया होगा कि गुरुवार को एक बार फिर बीजेपी संसदीय दल की बैठक में मोदी ने अपने सांसदों को फ़टकार लगायी। क्योंकि मोदी इनके रवैये से नाराज़ हैं। वो भी इसलिए कि सांसद उनके ‘नरेन्द्र मोदी एप’ को नहीं देखते हैं, उनके ‘गुड मॉर्निंग’ वाले सन्देशों की भी अनदेखी करते हैं। इससे पहले मोदी ख़फ़ा थे कि सांसद, सदन से नदारद रहते हैं। जिसकी वजह से संसद में बन रहे क़ानून में विपक्ष के संशोधन पारित हो जाते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि बीजेपी के ज़्यादातर सांसद और ख़ासकर वरिष्ठ नेता अपने ही प्रधानमंत्री के रोज़-रोज़ के झूठ से तंग आ चुके हैं।

सच्चाई ये भी है कि मोदी की ऐसी नाराज़गी और उसका प्रचार बाक़ायदा एक ढकोसला है। ताकि भक्तों में ये दुष्प्रचार किया जा सके कि ‘मोदी तो दिन-रात एक किये रहते हैं, लेकिन कमबख़्त ये सांसद ही निक्कमे हैं। ये तो ज़मीन से उठे मोदी हैं ही इतने महान कि वो इन निक्कमों को ढो रहे हैं। देखो-देखो, कैसे बेचारे मोदी ने पूरी पार्टी और सरकार का बोझ उठा रखा है। बेचारे, महज़ तीन घंटे सोते हैं। देश की ख़ातिर इन्होंने अपना घर-परिवार, पत्नी, भाईयों आदि सबको त्याग रखा है। मोदी इसलिए भी ईमानदार हैं क्योंकि वो किसके लिए कमाएँ, उनके कौन सा बाल-बच्चे हैं!’

अब ज़रा ग़ौर से सोचिए कि भगवा ख़ानदान को मोदी के ऐसे महिमामंडन की क्या ज़रूरत है? यदि प्रधानमंत्री के रूप में उनका कामकाज़ उम्दा है, यदि सरकार की वजह से आम जनता के जीवन में ख़ुशहाली आयी है तो बात-बात पर मुँह मियाँ मिट्ठू बनने की क्या ज़रूरत है! सच्चाई, क्या जनता को ख़ुद समझ में नहीं आ रही होगी! भीतरख़ाने की जानकारी तो ये है कि बीजेपी के ज़्यादातर सांसद अपने नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से फेंके जा रहे रोज़-रोज़ के झूठों से आहत हैं! वो अपनी सरकार की उपलब्धियों, आये दिन उसके यू-टर्न लेने के तरीक़ों, चापलूसों के चाँदी काटने और ख़ुद को पार्टी का जमूरा बनाये जाने से बेहद आहत हैं! इसीलिए मोदी की फ़टकारों और हिदायतों का सांसदों पर कोई असर नहीं पड़ रहा।

Image result for amit shah parliament  झूठ से बीजेपी की किरकिरी करवा रहे मोदी, अपने सांसदों को धमकाकर झेंप मिटाते हैं! Amit ShaH PTI

याद है ना, कि मोदी ने संसद के मॉनसून सत्र के वक़्त, यानी बीते अगस्त में इसी संसदीय दल को धमकाया था कि ‘जिसको जो करना है करिए, 2019 में मैं देखूँगा!’ तब मोदी ने अपने सांसदों को स्कूल के बच्चों की तरह धमकाया था कि अमित शाह के रूप में बीजेपी अध्यक्ष अब ‘सर्कस का रिंग मास्टर’ बनकर संसद के भीतर आ चुके हैं! वो राज्यसभा में रहेंगे। अब सांसदों के मौज़-मस्ती के दिन गये! आप लोग अपने आपको क्या समझते हैं? आप कुछ भी नहीं हैं! मैं भी कुछ नहीं हूँ! जो है भाजपा, एक पार्टी है।

अपने ही सांसदों के लिए इस्तेमाल हुई ये भाषा-शैली शालीन और गरिमामयी नहीं हो सकती। ऐसी शब्दावली से वैसे ही झूठ और अहंकार का प्रदर्शन होता है, जैसा गुजरात चुनाव में 10 दिसम्बर को बनासकांठा के पालनपुर में हुए मोदी की रैली में नज़र आया था। तब मोदी ने काँग्रेस पर हमला करने के लिए ये बोल दिया कि “पाकिस्तान के हाई कमिश्नर, पाकिस्तान के भूतपूर्व विदेश मंत्री, भारत के भूतपूर्व उप राष्ट्रपति, भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री की मणिशंकर के घर पर बैठक हुई। भाईयों-बहनों, ये एक गम्भीर बात है कि पाकिस्तान एक संवेदनशील मामला है, उस वक्त पाकिस्तान के हाई कमिश्नर के साथ इस प्रकार की गुप्त बैठक करने का कारण क्या है, जब गुजरात में चुनाव चल रहा हो तो इस प्रकार की गुप्त मीटिंग का कारण बताएँ। दूसरी बात, पाकिस्तान के पूर्व आर्मी डायरेक्टर जनरल अरशद रफ़ीक़ यह बात कहे कि गुजरात में अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए साथ देना चाहिए।”

गुजरात चुनाव तो बीजेपी जीत गयी, लेकिन मोदी के ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना, ओछे और झूठे तथ्यों पर आधारित भाषण ने संसद में ऐसा कोहराम मचाया कि आख़िरकार हफ़्ते भर से जारी टकराव को ख़त्म करने के लिए राज्यसभा में नेता सदन अरूण जेटली को बेहद गर्व के साथ सवा सौ करोड़ भारतवासियों को बताना पड़ा कि ‘हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो कहते हैं, उसका वही आशय नहीं होता!’ शब्दकोश में ऐसे व्यक्ति को ही झूठा, फ़रेबी, मक्कार, जालसाज़ और धोखेबाज़ कहा जाता है! इनकी ख़ातिर ही जेटली को सदन में ये लिखित बयान पढ़ना पड़ा कि “माननीय प्रधानमंत्री ने अपने बयान या भाषणों में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी पर कोई सवाल नहीं उठाया और न ही उनके बयान का इरादा इन नेताओं की देश के प्रति वचनबद्धता को लेकर सवाल खड़ा करने का था। ऐसी कोई भी धारणा पूरी तरह से ग़लत है। हम इन नेताओं का और राष्ट्र के प्रति इनकी वचनबद्धता का सम्पूर्ण आदर करते हैं।”

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संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के अगले ही दिन जब नरेन्द्र मोदी अपनी ही पार्टी के सांसदों से मुख़ातिब होते हैं, तो अपनी झेप मिटाने के लिए वो सांसदों को ही खरी-खोटी सुनाने लगते हैं। वो भी कितनी मामूली सी बात पर कि लोग मेरे ‘गुड मॉर्निंग’ का जबाब तक नहीं देते हैं। क़दाचित, वो कहना चाहते थे कि ‘क्या अब मेरा ऐसे अपमान किया जाएगा!’ लेकिन इसमें कोई शक़ नहीं कि मोदी की तरह ही चुने गये करीब़ साढ़े तीन सौ सांसदों से उनका नेता, अदब और तमीज़ से मुख़ातिब नहीं था। मुमकिन है कि प्रधानमंत्री को पता ही नहीं हो कि उनके शब्द किसने ओछे हैं! वर्ना, मोदी भी तो सबसे पहले एक सांसद ही हैं। वो अपने सांसद भाईयों को ये बोलने वाले कौन होते हैं कि निर्वाचित सांसद यहाँ ‘मौज़-मस्ती’ करने आते हैं, या ‘आप लोग अपने आपको क्या समझते हैं?’ या ‘आप कुछ भी नहीं हैं’ या ‘जिसको जो करना है करिए, 2019 में मैं देखूँगा!’

बीजेपी सांसदों में नरेन्द्र मोदी के इस तरह के अन्दाज़ को लेकर ख़ासी नाराज़गी है। हरेक सांसद जानता है कि सिर्फ़ पार्टी का टिकट पाने से कोई चुनाव नहीं जीत जाता। सबको अपनी-अपनी छवि, मेहनत और जनसम्पर्कों पर नाज़ होता है। इसीलिए ऐसी धमकियों को सुनने के बाद सांसद तिलमिलाकर रह जाते हैं। उन्हें लगता है कि ‘ठीक है, आप हमारे नेता हैं, प्रधानमंत्री हैं। लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि आप हमें भेड़-बकरी समझेंगे!’ आप बोलते हैं कि ‘2019 में देखूँगा! अरे, क्या देख लेंगे आप? आने दीजिए 2019, हम भी आपको देख लेंगे!’

मोदी को इस बात की पूरी भनक है कि उनके तौर-तरीक़ों, बयानों-नीतियों तथा दिन-रात अपनी ही ब्रॉन्डिंग के लिए फ़िक्रमन्द रहने वाले ढर्रे को उनके ज़्यादातर सांसद पसन्द नहीं करते। ये नाख़ुश सांसद, बीजेपी के ऐसा नेता हैं जो किसी न किसी वजह से पार्टी नेतृत्व की उपेक्षा झेल रहे हैं। इन्हें लगता है कि पार्टी उनकी प्रतिभा, योग्यता, समर्पण वग़ैरह का कोई लिहाज़ नहीं रखती। उनसे सिर्फ़ ये अपेक्षा होती है कि वो सरकार में बैठे वरिष्ठ नेताओं की तरह दिन-रात सिर्फ़ और सिर्फ़ झूठ की रोटियाँ ही सेंकते रहें। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि टीवी पर हीरो बनने वाले नेताओं का वास्ता आम जनता से नहीं पड़ता। बड़े नेताओं को नहीं मालूम कि जनता को अब कोरी जुमलेबाज़ी से रिझाना मुश्किल हो रहा है। सरकार के दावों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई लगातार और बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। यही आलम रहा तो 2019 में बीजेपी को भारी नुक़सान से कोई नहीं बचा सकता।