क़रीब सौ साल पहले जिस महाराष्ट्र की धरती पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना अंकुरित हुई, आज वहाँ हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने की ख़ूनी जंग छिड़ गयी है! आमतौर पर जिस ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना में मुसलमानों को हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन की तरह पेश किया जाता है, वो महाराष्ट्र में नहीं है। अभी तो वहाँ सवर्ण हिन्दुओं और ख़ासकर चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन्मादियों और उन महार दलितों से ठन गयी है जिन्होंने 200 साल पहले अपने उत्पीड़न का बदला लिया था! पेशवा काल के उस दौर में महार जाति के दलितों को कई अमानवीय नियमों का सामना करना पड़ता था। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर गले में हाँडी लटकाकर चलना पड़ता था। ताकि यदि उन्हें थूकना हो तो वो अपने गले में लटकती हाँडी में ही थूकें। इसके अलावा, महार दलितों को सड़क पर चलते वक्त अपने पीछे एक झाडू बाँधकर भी चलना होता था ताकि वो जिस रास्ते से गुजरें वो साफ़ भी होता रहे।

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बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर ने अपनी क़िताब ‘एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में ऐसी निर्मम प्रथाओं का ब्यौरा दिया है। आम्बेडकर ख़ुद भी अछूत महार जाति से ही थे। महार लोग ब्राह्मण पेशवाओं के अत्याचार से परेशान थे। आम्बेडकर की ही ‘राइटिंग एंड स्पीचेज’ के 12वें खंड के मुताबिक़, जब हिन्दुस्तान में अँग्रेज़ अपने सत्ता विस्तार की हसरत के तहत मराठाओं से भिड़ने वाले थे, तब उन्हें महारों की वीरता और उनके प्रति हो रही क्रूरता का पता चला। अँग्रेज़ों ने महारों की दुःखती रग पर हाथ रखा। उन्हें तमाम मानवीय अधिकारों को हासिल करने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल होने का न्योता दिया। ब्राह्मण पेशवाओं की क्रूरता को ख़त्म करने के लिए महारों ने अँग्रेज़ों का साथ दिया।

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Bhima Koregaon memorial

फलस्वरूप, 1 जनवरी 1818 को पुणे में भीमा नदी के किनारे कोरेगाँव में पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों का युद्ध अँग्रेज़ों के 500 सैनिकों की टुकड़ी से हुआ। अँग्रेज़ों की उस सेना में ज़्यादातर सैनिक महार थे। युद्ध में महारों की अतुल्य वीरता ने पेशवा के सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये और वो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। अँग्रेज़ों की विजय हुई। युद्ध में 22 महार सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। तब अँग्रेज़ों ने महारों के प्रति आभार जताते हुए पुणे के परने गाँव में जय-स्तम्भ बनवा दिया। तभी से उस संग्राम को दलित विरोधी व्यवस्था के सफ़ाये के निर्णायक दौर के रूप में देखा जाता है। इसीलिए 200 साल से हज़ारों की तादाद में दलित समाज उस संग्राम की बरसी पर अपने पुरखों को श्रद्धांजलि देने के लिए जय-स्तम्भ पर जुटता है। और, 1 जनवरी को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है।

भीमा-कोरेगाँव युद्ध की कहानी बहुत दिलचस्प और शिक्षाप्रद है। इसके ज़रिये क़द-काठी में मज़बूत महारों ने सदियों से क़ायम पेशवाओं के मनुवादी अत्याचार को ख़त्म करने के लिए कमर कसी तो अँग्रेज़ों ने साबित कर दिया कि सवर्ण हिन्दुओं का सामाजिक वर्चस्व कितना खोखला है! इसके बावजूद, ब्राह्मण पेशवाओं का आधुनिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ये कहकर समारोह का विरोध करता रहा कि युद्ध में दलितों ने अँग्रेज़ों का साथ देकर शौर्य नहीं दिखाया बल्कि देश के साथ गद्दारी की। यहाँ ये ग़ौर करना बेहद ज़रूरी है कि उस दौर में भारत जैसी कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। तब एक राजा के सैनिक दूसरे राजा के सैनिकों से राज्य विस्तार के लिए युद्ध करते थे। तब मातृभूमि की रक्षा जैसा कोई सिद्धान्त नहीं था। राजा सिर्फ़ राजा हुआ करता था। देसी या विदेशी नहीं।

लिहाज़ा, तब गद्दारी की वैसी परिभाषा थी ही नहीं, जैसी आज़ाद भारत में विकसित हुई। अलबत्ता, तब सिर्फ़ और सिर्फ़ शौर्य होता था। इसमें दलितों को मनुवादी ब्राह्मणों से ज़ोरदार शिकस्त मिली। क्योंकि तब तक मानवता के सामने मनुवादी जातिवाद, अन्यायकारी साबित हो चुका था। युद्ध में महार अपना आत्म-सम्मान पाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए उतरे थे, जबकि पेशवा के सैनिक अपनी स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ रहे थे। पेशवा की विशाल सेना इसलिए भी हारी, क्योंकि वो कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि यथास्थिति को क़ायम रखने के लिए लड़ रही थी। यही वजह से युद्ध में विजय पाने वाले महारों ने जय-स्तम्भ पर शौर्य दिवस मनाने की परम्परा शुरू की। 1937 में आम्बेडकर भी जय-स्तम्भ पर गये थे।

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इस बार विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये। संघियों को राज्य सरकार का परोक्ष समर्थन हासिल था। इससे हालात और बिगड़ गये। हिंसा और आगजनी, गाँवों से शहरों और फिर पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। इसके बाद, समाज के हर पक्ष ने अपनी-अपनी सियासी रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया। और, देखते ही देखते भीमा-कोरेगाँव के दलितों की आवाज़ राष्ट्रव्यापी बन गयी। संसद में इसे लेकर ख़ूब शोर-शराबा हुआ।

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Una inciden

भीमा-कोरेगाँव के ताज़ा प्रसंग को भारत में हिन्दुत्ववादियों और मानवतावादियों के बीच वर्ग-संघर्ष की बड़ी शुरुआत के रूप में देखना ज़रूरी है। वैसे तो दलित उत्पीड़न की वारदातें आज़ादी के बाद भी हमेशा होती रही हैं, लेकिन मोदी राज में इसने नया कलेवर हासिल किया है। पहले रोहित वेमुला की हत्या और फिर गुजरात के उना में जिस तरह से मनुवादी संघियों ने दलितों को निशाना बनाया, जिस तरह से आरक्षण को ख़त्म करने की बातें हुई, उससे यदि हालात गृह-युद्ध की ओर बढ़ जाएँ तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। दरअसल, 2014 के बाद से चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पताका न सिर्फ़ दिल्ली पर लहराने लगी, बल्कि देखते-देखते, महज पौने चार साल में ही, देश के 19 राज्यों में भगवा-सल्तनत क़ायम हो गयी। इसीलिए ऐसे समय में जब देश पूरी तेज़ी से भगवामय हो रहा हो, तब दलितों को अपनी उस जीत का उत्सव मनाने की रियायत कैसे दी जा सकती है, जिसमें ब्राह्मणों की पेशवाई वाला सत्ता की कहीं बड़ी सेना की हार हुई थी!

मौजूदा दौर में मनुवादी संघियों ने पहले जिस शिद्दत से मतान्ध हिन्दुओं के दिमाग़ में मुसलमानों को लेकर ज़हर भरा, वैसा ही काम अब दलितों को लेकर किया जा रहा है। यदि हिन्दुत्ववादियों का दलित और मुसलिम-विरोध जल्द ही औंधे मुँह नहीं गिरा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान का मौजूदा राजनीतिक मानचित्र फिर से इतिहास बन जाएगा! देश के टुकड़े हो जाएँगे! मुसलमानों को लेकर मूर्ख हिन्दुओं के दिल-ओ-दिमाग़ में जैसा झूठ बिठाया गया है, यदि ये मान भी लें कि वो सच है तो संघियों के इरादे के मुताबिक़, आगे क्या होना चाहिए? मत भूलिए कि संघियों की परिभाषाओं के मुताबिक़, मुसलमानों में जितने भी ऐब हैं, विकार हैं, ख़राबी हैं और गन्दगियाँ हैं वो क्या वो सभी हिन्दुओं में भी नहीं हैं?

हिन्दू, किन-किन अन्य धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले कम भ्रष्ट, कम घूसख़ोर, कम बलात्कारी, कम हत्यारे, कम मक्कार, कम चोर या कम असभ्य हैं? 70 साल से तो हिन्दू ही पूरी प्रमुखता से हिन्दुस्तान को चला रहे हैं! सब कुछ तो हिन्दुओं की ही मुट्ठी में है। सम्पूर्ण सरकारी व्यवस्था में मुसलमान तो नाम मात्र के ही हैं। लेकिन क्या हिन्दू ईमानदारी से ये कह पाएँगे कि वो राष्ट्र को सर्वोपरि रखकर चलते हैं? क्या हिन्दू कोई दुराचार, कदाचार या अनैतिक करतूतें नहीं करते हैं? धर्म की असली शिक्षाओं को क्या हिन्दुओं ने अपने जीवन में उतार रखा है? यदि नहीं, तो क्या औरों में खोट ढूँढने से पहले हिन्दुओं को अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहिए?

बहरहाल, संघी चिन्तन के मुताबिक़, यदि थोड़ी देर के लिए ये मान भी लें कि मुसलमान ही हमारी सारी समस्याओं की वजह हैं और यदि भारत, मुसलमानों से मुक्त हो जाए तो क्या तब जो भारत बचेगा उसमें चारों ओर अमन, भाईचारा, शान्ति और सद्भाव स्थापित हो जाएगा? क्या मुसलिम-रहित ‘हिन्दू राष्ट्र’ में अपराध, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, दुराचार, ग़रीबी, ऊँच-नीच, छूआछूत, जातिवाद वग़ैरह ख़त्म हो जाएगा? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ में भाई-भाई के बीच झगड़े नहीं होंगे? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की राजनीति में हिन्दू को हिन्दू से नहीं लड़वाया जाएगा? क्या तब हिन्दू ही एक-दूसरे के क़ातिल नहीं होंगे? बिल्कुल होंगे! अवश्य होंगे। क्योंकि वर्ग-संघर्ष को हमेशा इंसान का ख़ून पीने की ख़्वाहिश रही है। पहले, अगड़ों को पिछड़ों से लड़वाया जाएगा। फिर दलितों को सर्वणों से।

संघियों का सपना मनुस्मृति को ही संविधान बनाने का था। इसमें आरक्षण को ख़त्म करके विकृत हिन्दुत्व वाले छुआछूत, जातिगत शोषण, दमन-उत्पीड़न वाली वर्ण-व्यवस्था वग़ैरह की वापसी की जाएगी। ताकि चितपावन ब्राह्मणों की वही राजशाही लौटायी जा सके जो 1818 के भीमा-कोरेगाँव युद्ध से पहले मौजूद थी! जिस दिन मनुस्मृति की वापसी हो जाएगी, उस दिन संघियों को उनका परम लक्ष्य हासिल हो जाएगा। शायद, तब तक वक़्त का पहिया पूरा घूम चुका होगा!