यदि आपको पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग बेहद अख़रती है तो ये ख़बर आपके लिए ही है! आपको अच्छी तरह से मालूम है कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम को लेकर मोदी सरकार कैसे 2014 के बाद से लगातार आपकी जेब-तराश रही है। इनके दाम रोज़ाना नये कीर्तिमान बना रहे हैं। जनता तमाशबीन बनी हर सितम झेल रही है। मीडिया ने भी इस ज़ुल्म-ओ-सितम से नज़रें फेर रखी हैं। इसीलिए विपक्षी विरोध की भी अनदेखी हो रही है। जनता को ऊल-जलूल के मुद्दों में भटकाने के लिए कभी पद्मावत को तो कभी कासगंज को तो कभी किसी भी मंत्री के अँट-शँट बयान को हवा दी जाती है! त्राहिमाम कर रही जनता का दर्द कभी-कभार सोशल मीडिया पर सुर्ख़ियाँ बटोर लेता है तो वित्त मंत्री अरूण जेटली का शिगूफ़ा सामने आ जाता है कि ‘जीएसटी काउन्सिल यदि राज़ी हो जाए तो पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में ले आया जाए!’

लेकिन ये मुराद ‘न नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी’ जैसा ही है! ‘अच्छे दिन’, ‘सबको 15-15 लाख’, ‘हर साल दो करोड़ रोज़गार’, ‘किसानों की आमदनी को डेढ़ गुना और फिर दोगुना’ करने वाले जुमलों का हश्र किससे छिपा है! इसी तरह पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने की बातें मोदी सरकार का एक और पैंतरा है। सच्चाई तो ये है कि पेट्रोलियम उत्पादों को कभी जीएसटी के दायरे में नहीं लाया जाएगा। क्योंकि चाहे मोदी सरकार हो या बीजेपी शासित राज्य सरकारें, सभी के लिए पेट्रोल-डीज़ल किसी कामधेनु से कम नहीं है! पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी के दायरे में लाते ही हमारा अर्थतंत्र भरभराकर ढह जाएगा! लिहाज़ा, जनता इस भ्रम में कतई ना रहे कि देर-सबेर पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी लागू करके सरकारें उसे राहत ज़रूर देंगी।

दरअसल, किसी भी वस्तु या सेवा पर जीएसटी की दर तय करते समय रेवेन्यू न्यूट्रल रेट यानी आरएनआर का ध्यान रखना अनिवार्य है। आरएनआर का मतलब टैक्स की वो दर है जिस पर केन्द्र और राज्य सरकार को राजस्व का नुकसान नहीं हो। अब पेट्रोल-डीज़ल के मामले में परेशानी ये है कि इन पर केन्द्र और राज्यों के टैक्स की मौजूदा दरों के मुताबिक, आरएनआर की रक़म बेहद अधिक हो जाती है। मसलन, दिल्ली में जब एक लीटर पेट्रोल का दाम 72.49 रुपये था तो पेट्रोल पम्प डीलर के लिए इसकी कीमत 34 रुपये थी। इस पर उसका कमीशन 3.60 रुपये था। लेकिन इस दाम में केन्द्र सरकार का उत्पाद शुल्क 19.48 रुपये था। जबकि दिल्ली सरकार को बतौर वैट 15.51 रुपये मिले।

साफ़ है कि हरेक लीटर पेट्रोल के दाम में 34.89 रुपये टैक्स है। साफ़ है कि पेट्रोल के दाम में सौ फ़ीसदी से ज्यादा टैक्स है। आरएनआर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जीएसटी के तहत भी इतना ही टैक्स वसूलना ज़रूरी होगा, जो जीएसटी की मौजूदा अधिकतम दर और उपकरों (सेस) से सम्भव नहीं हो सकता। यही वो वजह है कि जीएसटी के टैक्स ढाँचे से पेट्रोलियम उत्पाद को बाहर रखने की नीति अपनायी गयी। यहीं ये सवाल भी खड़ा होता है कि क्या कभी ऐसा नहीं होगा कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जा सके? जबाब है कि सैद्धान्तिक रूप से ये तभी मुमकिन है जबकि केन्द्र और राज्यों की जीएसटी से होने वाली कमाई इतनी अधिक हो जाए कि आरएनआर की भरपायी हो सके!

फ़िलहाल, तो आलम ये है कि जुलाई 2017 से लेकर दिसम्बर 2017 तक जीएसटी से होने वाली कमाई लगातार कम ही होती रही। जनवरी 2018 में टैक्स संग्रह में मामूली सा सुधार ज़रूर आया है, लेकिन सरकार ने जो लक्ष्य तय किये हैं, वो अब भी ख़ासे दूर ही हैं! लिहाज़ा, इसका विकल्प सिर्फ़ ये हो सकता है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए जीएसटी काउन्सिल अपने तमाम टैक्स की दर को बढ़ाने के लिए तैयार हो। लेकिन ये विकल्प व्यावहारिक नहीं हो सकता। व्यावहारिक सिर्फ़ यही है कि पेट्रोलियम उत्पादों पर सरकारें अभी की तरह तगड़ा टैक्स ऐंठती रहें और जनता हाय-हाय करती रहे।

कुलमिलाकर, जनता को व्यावहारिक तौर पर राहत देने का एक ही तरीका है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने-अपने उत्पाद शुल्क और वैट की दरों को कम करें। अफ़सोस की बात ये है कि चाहे केन्द्र की मोदी सरकार हो या ज़्यादातर राज्यों पर क़ाबिज़ बीजेपी की सरकारे, कोई भी अपने-अपने टैक्स की तय को घटाने के लिए आगे नहीं आती। केन्द्र का उत्पाद कर तो पूरे देश में एक सा रहता है, लेकिन वैट की दरें पेट्रोल पर 6 से लेकर 40 फ़ीसदी और डीज़ल पर 6 से लेकर 29 फ़ीसदी तक है। गुजरात चुनाव के वक़्त मोदी सरकार ने उत्पाद शुल्क को 2 रुपये प्रति लीटर कम किया था। लेकिन जब राज्यों के वैट घटाने की बात हुई तो आधा दर्जन राज्य भी आगे नहीं आये।