सावरकर को लगा कि गाँधी, राष्ट्रभक्त नहीं है। गोडसे को लगा कि वो असली राष्ट्रभक्त है। लिहाज़ा, उसने राष्ट्रभक्ति को स्थापना के लिए गाँधी को गोली से उड़ा दिया। अब इस झंझट में कौन पड़ता कि गाँधी की राष्ट्रभक्ति को अदालत में ललकारा जाए! ठॉय, ठॉय, ठॉय! बात ख़त्म! न रहेगा बाँस, ना बाजेगी बाँसुरी!

यही है, राष्ट्रभक्ति पर फ़ैसला करने का संघियों का तरीका। इसी तरीके से रोहित वेमुला, अख़लाक़, उना के दलितों, पहलू ख़ान, कठुआ की मासूम बच्ची को न्याय दिया जाता है। संघियों की समझ का निरालापन इसीलिए बेमिसाल है। उनका तरीका बेजोड़ है। मूर्खता ही उनके हिन्दुत्व का आधार है। इन सबकी बदौलत ही वो राष्ट्रभक्ति पर दो-टूक फ़ैसला करने वाले न्यायाधीश बने घूमते-फिरते हैं।

संघियों की राष्ट्रभक्ति का मतलब समझना बेहद आसान है। ये समुदाय जिस राष्ट्र की भक्ति करता है, उसमें सिर्फ़ राष्ट्र होता है, जनता नहीं। इनके सपनों वाले राष्ट्र में आदिवासी नहीं हैं, दलित नहीं हैं, पिछड़े नहीं हैं, मुसलमान नहीं हैं, ईसाई नहीं हैं! हैं तो सिर्फ़ सवर्ण। बनिये, ब्राह्मण, क्षत्रिय और कायस्थ! सिर्फ़ यही लोग असली भारतीय और देशभक्त हैं। इन्हीं लोगों को ये घुट्टी पिला दी गयी है कि वो असली, शुद्ध और निखालिस हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू होने पर गर्व होना चाहिए। हिन्दुओं की रक्षा करना उनका पुनीत कर्त्तव्य होना चाहिए।

सबसे ग़ज़ब तो ये है कि घनघोर हिन्दुत्ववादी नरेन्द्र मोदी के राज में ही हिन्दुओं पर सबसे भारी संकट गहराया हुआ है। वो सिर्फ़ इसलिए कि बार-बार चुनाव हारने की वजह से राहुल गाँधी भी हिन्दू होने का दावा करने लगे हैं। मन्दिरों में जाने लगे हैं। जनेऊ की भी बात होती है। वो दलितों, ग़रीबों, किसानों, पिछड़ों, मुसलमानों को ग़ाली नहीं बकते हैं। नफ़रत का विरोध करते हैं। इसीलिए उन्हें तो किसी भी क़ीमत पर प्रधानमंत्री पद का दावेदार तक नहीं होना चाहिए।

बीजेपी में विराजमान मुट्ठीभर मुसलमानों को छोड़कर देश का हरेक मुसलमान गद्दार है, पाकिस्तान परस्त है, आतंकवादी है, जिन्ना-भक्त है, हिन्दुओं का दुश्मन है। यही वजह है कि संघियों को हिन्दुओं के रक्षार्थ और मानवता के धर्मार्थ, मुसलमानों को ग़ालियाँ देनी पड़ती हैं, उन्हें दहशत में रखना पड़ता है। मुसलमान चार-चार शादियाँ करते हैं, उनके 40-40 बच्चे होते हैं, वो अपनी बीवी को तीन तलाक़ दे देते हैं, वो राम मन्दिर के दुश्मन है जबकि कितनी बार उन्हें बताया जा चुका है कि राम का मन्दिर अयोध्या में नहीं तो फिर कहाँ बनेगा? फिर भी उनके होश ठिकाने नहीं हैं, क्योंकि उन्हें काँग्रेस, एसपी, बीएसपी, आरजेडी, तृणमूल और कम्युनिस्टों जैसे सत्ता के लालची लोगों ने वोट-बैंक बना रखा है।

संघियों को ये पता है कि मुसलमानों की आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है जबकि हिन्दुओं की स्थिर है। लिहाज़ा, यदि मोदी सत्ता में नहीं रहेंगे तो 2022 तक भारत को इस्लामिक देश बना दिया जाएगा। उसके बाद तो सारे हिन्दुओं का धर्मान्तरण करके उन्हें लव-जिहाद के बग़ैर ही मार-मारकर मुसलमान बना दिया जाएगा। लिहाज़ा, पूरे देश के मुसलमानों को गुजरात की तरह सबक सिखाना ज़रूरी है। इसके लिए दंगों और क़त्लेआम का होना ज़रूरी है।

अब यदि आपने कभी किसी संघी से ये पूछ लिया कि भाई, दंगों में कितने मुसलमानों को काट डालोगे! देश में क़रीब 20 करोड़ मुसलमान हैं। क्या इन सबको मार पाओगे? दंगों की आड़ में, एक बार में, हज़ार-दो हज़ार मुसलमानों से ज़्यादा नहीं मार पाओगे। इसके लिए भी हरेक दंगे का काफ़ी व्यापक और भयानक होना ज़रूरी है। फिर दो करोड़ के लिए कितने दंगे करने पड़ेंगे? कितने व्यापक पैमाने पर नफ़रत फैलानी पड़ेगी? कितने सालों तक भारत उस तरह के भीषण दंगों से रूबरू होता रहेगा?

संघियों से आप ये भी पूछ सकते हैं कि संघ तो अपनी शाखाओं उस अखंड भारत को फिर से स्थापित बनाने की बात करता है जिसमें पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश सबको मिलाकर एक देश बनाने की बातें की जाती हैं। जबकि ये तो मुस्लिम बहुल देश हैं। इन सबके विलय से तो भारत और भी आसानी से मुस्लिम बहुल बन जाएगा। फिर उस राष्ट्र का क्या होगा जिसकी भक्ति की ख़ातिर गाँधी ने लेकर अभी तक क़ुर्बानी पर क़ुर्बानी ली जा रही है।

वैसे क्या ये मुमकिन है कि जैसे कश्मीर से पंडितों को मार भगाया गया है, वैसे ही भारत से मुसलमानों को मार भगाया जाए? या फिर ज़बरन सबका धर्म-परिवर्तन करवा उन्हें हिन्दू बना दिया जाए? दरअसल संघ परिवार, सिरफिरे, मूर्ख और कट्टरपन्थियों का जमावड़ा है। इसका लक्ष्य बीजेपी के लिए मन्दबुद्धि हिन्दुओं का एक ऐसा वोट-बैंक तैयार करना है, जो हिन्दुओं को लगातार मुसलमानों का डर दिखाकर उनमें विकृत राष्ट्रभक्ति का ज़हर लगातार भरे रखना चाहता है। सबसे बड़ा सच ये है कि चटपट इंसाफ़ करने की संघ की आदत ने भारत का जितना नुकसान किया है उतना तो कभी कोई विदेशी हमलावर भी नहीं कर पाया। इसीलिए यदि भारत को बचाना है तो संघ में पनपने वाले साम्प्रदायिक तिलचट्टों यानी काक्रोचों का सफ़ाया ज़रूरी है।

भूखा रखने के सिवाय अन्य किसी तरीके से तिलचट्टों का सफ़ाया सम्भव नहीं है। सत्ता इनकी भूख है। इनसे सत्ता छीनना होगा। अपनी भूख की ख़ातिर ये लोग हमेशा और बड़ी होशियारी से असली मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाते रहते हैं। जैसे ही जनता इन्हें कठघरे में खड़ा करती है, वैसे ही ये एक बम धमाका या दंगा करवा देते हैं। इसीलिए, भारत से सच्ची मुहब्बत करने वालों को ऐसे साम्प्रदायिक गिरोहों से लड़ना ही पड़ेगा।