2014 में जब अपरम्पार झूठ की सवारी करते हुए नरेन्द्र मोदी दिल्ली की गद्दी पर क़ाबिज़ होने में सफल हो गये, तब इस बहरूपिये के ज़हन में सबसे बड़ी ख़्वाहिश ये पैदा हुई कि किसी भी तरह से वो नेहरू से भी ज़्यादा बड़े और लोकप्रिय बन जाएँ! तब भी मोदी को पता था कि वो अनपढ़ हैं। जबकि नेहरू बेहद शिक्षित और क़ाबिल नेता थे। लेकिन मोदी को पूरा यक़ीन था कि यदि उनके झूठ उन्हें भारत का सरताज बना सकते हैं तो फिर तरह-तरह के चरित्रहनन के ज़रिये वो अपनी छवि को नेहरू से भी बढ़कर क्यों नहीं बना सकते? वैसे भी मोदी के पास सिवाय झूठे विज्ञापनों के ज़रिये बनायी जाने वाली ब्रॉन्डिंग के सिवाय और कोई भी हुनर नहीं है।

मोदी के प्रोफाइल में वैसे भी कभी नेहरू जैसी दूरदृष्टि और लोकतंत्रिक उदारता का अंश रहा ही नहीं। मोदी सिर के बल भी खड़े हो जाएँ तो वो आज़ादी की लड़ाई में नेहरू जैसा संघर्ष और नेतृत्व करने का मौका पा ही नहीं सकते। मोदी कुछ भी कर लें, लेकिन वो नेहरू की तरह गाँधीवादी सत्याग्रही बनकर ज़िन्दगी के नौ साल अँग्रेज़ों की जेलों में नहीं गुज़ार सकते। अशिक्षित मोदी के लिए ये मुमकिन ही नहीं है कि वो जेल में रहते हुए ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ जैसे शानदार पुस्तक को लिखने के बारे में सोच भी सकें। नेहरू को जैसी इज़्ज़त उनकी पार्टी और यहाँ तक कि विरोधियों से हासिल थी, उसका तो मोदी पासंग तक नहीं हो सकते। आज़ादी की लड़ाई में जिस तरह से मोती लाल नेहरू के पूरे परिवार ने कुर्बानियाँ दी, उसके बारे में तो नेहरू कल्पना तक नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पास परिवार के नाम पर वो कलंकित संघ परिवार ही है, जिसमें परिवारिक भाईचारे का बुनियादी मूल्य हमेशा से नदारद रहा है।

नेहरू ने आधुनिक और ख़ुशहाल भारत के सपने को साकार करने की भरपूर कोशिश की। अपने दौर में वो भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के प्रमुख नेताओं में शुमार थे। राजनीतिक शीर्ष पर होने के बावजूद नेहरू प्रचार के भूखे नहीं थे। तालियों की गड़गड़ाहट के लिए तरसते नहीं है। उनकी सभाओं में ‘मोदी-मोदी-मोदी’ वाली रिकॉर्डिंग को बजाने के लिए भाँडों का तंत्र नहीं फिट किया जाता था। मोदी की तरह नेहरू को लफ़्फ़ाज़ी की बीमारी नहीं थी। नेहरू को 82 किलोमीटर लम्बे हाईवे के महज 9 किलोमीटर का हिस्सा निर्मित होने के बाद इसके 6 किलोमीटर वाले टुकड़े पर रोड-शो करने की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी। तभी तो 1959 में जब मद्रास का आईआईटी बनकर तैयार हुआ तो उसका उद्घाटन करने के लिए नेहरू ख़ुद नहीं गये, बल्कि अपने साइंटिफिक रिसर्च मंत्री हुमायूँ कबीर को वहाँ भेजा।

1959 में ही भिलाई इस्पात संयंत्र के उद्घाटन का सुअवसर भी आया। वो आज़ाद हिन्दुस्तान को आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाने वाला पहला विशाल कारख़ाना था। नेहरू के लिए उसका शुभारम्भ किसी बहुत बड़े सपने के साकार होने जैसा था। इसके बावजूद भिलाई स्टील प्लांट का उद्घाटन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ख़ुद नहीं किया। बल्कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से करवाया। ये वही राजेन्द्र बाबू थे, जिनसे नेहरू के नीतिगत मतभेद भी रहे, लेकिन फिर भी नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद का आदर करते हुए उन्हें लगातार दूसरी बार भी राष्ट्रपति बनवाया। क्योंकि नेहरू का सरदार बल्लभ भाई पटेल और राजेन्द्र बाबू से मतभेद वैसा ही था, जैसे लोकतंत्र में दो नेताओं के बीच हुआ करता है।

बीते चार साल में काँग्रेसी सरकारों की कई महा-योजनाओं के पूरा होने पर जब उनके शुभारम्भ का अवसर आया तो सारे ताम-झाम के साथ नरेन्द्र मोदी ने रोड-शो किये और लम्बे-चौड़े भाषण पेले। लेकिन न तो उन लोगों को याद किया जिन्होंने वो महा-प्रोजेक्ट चालू किये थे और ना ही किसी भी परियोजना को उद्घाटन का मौका राष्ट्रपति को दिया गया। लगे हाथ 1957 की नेहरू की ये तस्वीर भी देखिए। इसमें उनके साथ बुधनी नाम की वो महिला मज़दूर भी है, जिसने उस बाँध के निर्माणस्थल पर मज़दूरी की थी, जिसका वो उद्घाटन करने वाली है। जबकि दूसरी ओर 6 किलोमीटर वाला मोदी का फ़रेबी रोड-शो है।