भारत के करोड़ों संवेदनशील लोग इन दिनों ‘बच्चा चोर’ के नाम पर हो रही लिंचिंग यानी ‘पीट-पीटकर हत्या करने’ वाली महामारी को लेकर बेहद दुःखी और हतप्रभ हैं! मासूम लड़कियों के साथ हो रहे दुष्कर्म और उनकी निर्ममता से हो रही हत्या को लेकर भी करोड़ों लोग क्रोधित और शर्मसार हैं। सोशल मीडिया पर टिड्डी दल की तरह छाये हुए ट्रोल्स ने तो उन लोगों की नाक में भी दम कर रखा है, जो उनके जनक और पालनहार रहे हैं। मोदी युग की इन महामारियों से यदि भारतीय समाज जूझ रहा है तो इसे लेकर सियासत होना भी स्वाभाविक है। सियासत है, इसीलिए तमाम नेताओं के तरह-तरह के बयान भी सुर्खियों में तो रहेंगे ही।

कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्थायी भाव वाली चुप्पी को लेकर भी ख़फ़ा हैं! शायद, ऐसे लोगों को लगता है कि मोदी की भर्त्सना से लिंचिंग, दुष्कर्म और ट्रोलिंग रूक जाएगी। अव्वल तो ये होगा ही नहीं। लेकिन यदि थोड़ी देर के लिए ये कल्पना भी कर ली जाए कि ‘लिंचिंग, दुष्कर्म और ट्रोलिंग’ के पीछे वही भक्तों वाली मानसिकता है, जो मोदी को युग-पुरुष मानती है, तो क्या मोदी के किसी बयान या ट्वीट या विज्ञापन से हालात बदल जाएँगे? यदि हाँ, तो फिर ‘मौनं सम्मति लक्षणं’ को ही उनका बयान क्यों नहीं मान लिया जाता!

देश को झकझोरने वाले कितने ही ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर मोदी ने कभी चूँ तक नहीं की! नोटबन्दी की नीति ने देश को तबाह कर दिया, लेकिन मोदी इसका गुणगान ही करते रहे! नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे प्रधानमंत्री के दोस्तों ने ‘मोदी-गेट’ के रूप में दिन-दहाड़े बैंकों को लूट लिया, लेकिन मोदी ने कभी चूँ तक नहीं की! मोदी ख़ामोश रहे तो कौन सा पहाड़ टूट गया देश पर! कौन सी सुनामी आ गयी! उन्मादी भीड़-तंत्र ने कोई पहली बार तो अपना पराक्रम दिखाया नहीं है। ये आख़िरी भी क्यों होगा? हर साल करीब़ 3 लाख लोगों को मौत असमय गले लगा लेती है। मानव-निर्मित या दैवीय-आपदा की चपेट में आकर होने वाली मौतों को हम बेहद उदारता से हादसा मान लेते हैं!

लिहाज़ा, ये सवाल उठना लाज़िमी है कि कौन हैं वो लोग जो या तो सोशल मीडिया के ज़रिये समाज को झकझोरने की कोशिश कर रहे हैं या फिर इसी मंच से अफ़वाहें फैलाकर समाज को ‘जागरूक’ बनाने का दुस्साहस करते हैं? किसे नहीं मालूम कि आप जगा तो सिर्फ़ उसे सकते हैं जो वाकई में सो रहा हो! जो सोने का नाटक कर रहा हो, उसे भला कौन जगा पाया है! तो फिर क्यों हो रहा है ये स्यापा? मोदीजी के बोल देने से, ख़ेद प्रकट करने से, क्या संघियों, भक्तों और मन्दबुद्धि हिन्दुओं का दीन-ईमान बदल जाएगा? यदि हाँ, तो वो ज़रूर बयान देंगे! आज नहीं तो कल। देर है, अन्धेर नहीं होगी…! लेकिन मोदी के बोलने या ट्वीट करने से कुछ नहीं होगा। क्योंकि भारतीय समाज अभी मगरमच्छ की सवारी कर रहा है! इसी मगरमच्छ को आप सोशल मीडिया कह सकते हैं।

अब कल्पना कीजिए यदि देश में सौ प्रधानमंत्री हो जाएँ तो? या, राज्यों में दो-तीन सौ मुख्यमंत्री हो जाएँ तो क्या हर्ज़ है? या, देश में एक के बजाय यदि 40-50 सुप्रीम कोर्ट हो जाएँ तो क्या चटपट और उम्दा न्याय नहीं होने लगेगा? यदि हाँ, तो ज़रा सोचिए कि जिस तरह से सोशल मीडिया ने सबको पत्रकार बना दिया है, कहीं वो समाज में व्यापक स्तर पर मीठा ज़हर तो नहीं परोस रहा? बेशक, हो तो ऐसा ही रहा है! सोशल मीडिया पर कीड़े-मकोड़ों की तरह पत्रकार की भरमार हो गयी है। अब सवाल ये है कि इसमें बुराई क्या है? जवाब है: “कोई बुराई नहीं है। उल्टा, बहुत अच्छी बात है। इससे जनता अधिकार सम्पन्न (Empowered) बनती है!”

अब ज़रा सोचिए कि किसी अस्पताल के सारे कर्मचारी यदि सर्जरी करने लग जाएँ तो क्या होगा? जवाब होगा: “ये तो अनर्थ होगा। सब कैसे सर्जन बन जाएँगे! सर्जन तो उसे ही बनना चाहिए, जो उस विधा में शिक्षित और प्रशिक्षित हो।” बिल्कुल ठीक। सही फ़रमाया। इसी मिसाल से अन्दाज़ा लगाइए कि सोशल मीडिया पर कितने लोग अनाड़ी सर्जन, सर्ज़िकल उपकरणों के साथ घूम रहे हैं? ये जिसको-तिसको पकड़ लेते हैं और जहाँ-तहाँ उसकी सर्ज़री करने लगते हैं। ऐसी सर्जरी के मरीज़ ही हमें समाज में लूले-लंगड़े, अपाहिज, दिव्यांग और बौद्धिक रूप से क्षत-विक्षत नागरिकों के रूप में दिखायी देते हैं। यही सर्ज़न सोशल मीडिया पर बचकानी, हास्यास्पद, अनाड़ी, मूर्खतापूर्ण, घातक और विनाशकारी टिप्पणियाँ करते फिरते हैं ताकि भारतीय समाज में नाहक ज़हर फैलाया जा सके!

मन्द-बुद्धि जनमानस को इनकी अधकचरी पत्रकारिता में भारी गौरव, छद्म राष्ट्रवाद, छिछोरी राजनीति जैसी बातों का मज़ा मिलता है। हिन्दुत्ववादियों को उनकी राजनीतिक विचारधारा को अफ़वाहों के रूप में फैलाने वाला वहशी कॉडर मिल जाता है। तभी तो ये झाँसा सिर चढ़कर बोलने लगता है कि यक़ीन करो कि ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं! यक़ीन करो कि नोटबन्दी ने काला धन ख़त्म कर दिया! यक़ीन करो कि विकास सिर्फ़ भाषणों से हो सकता है! यक़ीन करो कि 70 साल तक देश को सिर्फ़ लूटा गया है! लूटने वालों में एक भी देशवासी शामिल नहीं था! यदि कोई था भी तो, उनमें कोई भगवा नेता, भक्त और समर्थक शामिल नहीं था! हरेक व्यक्ति जो मोदी समर्थक बनकर गौरवान्वित है वो अपना कर्त्तव्य पूर्ण निष्ठा, समर्पण, ईमानदारी और लगन से निभा रहा है!

कल तक जो अध्यापक फ़ोकट की तनख़्वाह लेते थे वो अब विद्यार्थियों का भविष्य सँवारने के लिए तपस्या कर रहे हैं! बीजेपी शासित राज्यों के पुलिस वालों की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से तो देवता भी ईष्या करने लगे हैं! उन्हीं राज्यों में डॉक्टरों ने अपने मरीज़ों का शोषण त्यागकर उन्हें अपने आराध्य माता-पिता जैसा सम्मान देना शुरू कर दिया है! बीजेपी शासित राज्यों में जनता ने यातायात के नियमों का आदर अपने धार्मिक ग्रन्थों की तरह करना शुरू कर दिया है! उन्हीं राज्यों की अदालतों में इन्साफ़ की नदियाँ बह रही हैं! वहाँ ग़ैरक़ानूनी व्यवहार तो अपवाद स्वरूप भी दिखायी नहीं देता!

बीजेपी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का आचरण त्याग, बलिदान और ‘नर-सेवा, नारायण सेवा’ की शानदार मिसाल बन चुका है! हरेक हिन्दूवादी छात्र ने भीष्म प्रतीज्ञा ले ली है कि वो अपने विद्यालय और गुरुजनों का भरपूर आदर करेगा और परीक्षा की सुचिता को माँ-बहनों की इज़्ज़त से कम नहीं समझेगा! यदि वास्तव में ऐसा होने लगा है तो सोशल मीडिया पर हरेक ख़ास-ओ-आम को पत्रकार बनने का हक़ बिल्कुल होना चाहिए! उसकी श्रेष्ठता का अभिनन्दन अवश्य होना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो ज़रा सोचिए कि वो कौन लोग हैं जो आपमें झूठी और ग़लत जानकारियाँ ठूँसकर आपको बौद्धिक रूप से दिवालिया बना रहे हैं? ऐसा करके वो किसका हित साध रहे हैं? कैसी राष्ट्रभक्ति दिखा रहे हैं?

सोशल मीडिया पर बज रहे ऐसे डमरूओं की आवाज़ें यदि आप सुन और समझ पा रहे हैं तो आपसे ज़्यादा नसीबवाला शायद ही कोई और हो! लेकिन बदक़िस्मती से ऐसा हो नहीं रहा। बल्कि हो ये रहा है कि सोशल मीडिया, ख़ासकर WhatsApp, के ज़रिये अपनी पहचान को ज़ाहिर किये बग़ैर उन लोगों तक विशुद्ध झूठ और अफ़वाह को फैलाया जा रहा है, जो इसे परखने और सच्चाई को जानने-समझने की क्षमता नहीं रखते। इसी तरह विकृत सर्जनों की सर्जरी वाले मरीज़ समाज में बेतहाशा फैलते जा रहे हैं। झूठ और अफ़वाह की बदौलत जो नेता, नीति और माहौल बन रहा है वो सैकड़ों प्रधानमंत्री, हज़ारों मुख्यमंत्री और तमाम सुप्रीम कोर्ट्स को पैदा किये बिना नहीं मानेगा!

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आज़ादी को ‘अभिव्यक्ति की अराजकता’ में बदल दिया है। ये अराजकता आज जिसकी ताजपोशी करती है, कल उसी का तख़्ता पलट भी करेगी! इस अराजकता का जवाब भी अराजकता से ही मिलेगा। जिसकी अराजकता बेहतर होगी, वही सरताज बनेगा। इसीलिए बारूद या परमाणु या रासायनिक हथियारों से भी कहीं ज़्यादा विध्वंसक है सोशल मीडिया! ये मगरमच्छ की सवारी है! जो इसे सफ़लतापूर्वक कर लेगा, उसे भी यही मार डालेगा! ये साक्षात भस्मासुर है! इसकी अनियंत्रित और अघोषित फ़ौज हमेशा सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती है। कहीं कुछ अच्छा या सकारात्मक दिखा तो फ़ौरन Likes, Retweet, Share, Trending जैसी बयार बहने लगती है। और, यदि कुछ नकारात्मक है तो तुरन्त यही ‘भाड़े के टट्टू’ राशन-पानी लेकर पिल पड़ते हैं। आपको ये फ़ासिस्ट तरीक़ा लगता है, तो लगा करे। किसे परवाह है!

सोशल मीडिया इतना व्यापक है कि ये किसी क़ानून से क़ाबू में नहीं आएगा। अभी तो इसके प्रकोप से इंसान को परमात्मा भी नहीं बचा सकते। मुमकिन है कि इंसान कभी न कभी इसका इलाज़ ज़रूर ढूँढ़ लेगा। लेकिन जब तक सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की तकनीक विकसित नहीं होती, तब तक तो ये इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन बना रहेगा। समाज को नैतिक मूल्यों से विहीन बनाता रहेगा। इंसान की सनकी प्रवृत्तियों को बढ़ाता रहेगा। अनुशासन और शर्म-ओ-हया लगातार क़िताबी ही बनी रहेगी।

इसीलिए, हमें इसकी ख़ौफ़नाक प्रवृत्तियों से ख़ुद ही बचना होगा। सोशल मीडिया के प्रकोप से रोकथाम के लिए हमें ‘जनरल हाईजीन’ के तौर-तरीकों को सीखना होगा। ये कमोबेश वैसे ही होगा, जैसे हम साबुन से हाथ धोकर साफ़-सफ़ाई रखते हैं और ख़ुद को बीमारियों से बचाते हैं। ‘जनरल हाईजीन’ का सबसे आसान तरीका है कि आप सोशल मीडिया की हर सामग्री को सच और प्रमाणिक मत मानिए। बल्कि जो बातें सनसनीख़ेज़ लगें उसकी सच्चाई को फ़ौरन और पहली नज़र में संदिग्ध तथा दुर्भावनापूर्ण ही मानिए। किसी बात तो तब तक फारवर्ड या शेयर या रिट्वीट मत कीजिए, जब तक कि आप उसकी सच्चाई के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त न हो जाएँ। क्योंकि क़ानूनन ‘Forward as arrived…’ लिखने से भी आप IT Act के तहत गुनाहगार ठहराये जा सकते हैं! यदि रखिए कि जब बुरा वक़्त आता है तो ऊँट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट लेता है!