दिल्ली का बॉस कौन? सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फ़ैसले के मुताबिक़, कौन जीता और कौन हारा? इन सवालों को लेकर सियासी मठाधीश चाहें जितनी लाठियाँ भाँजें, लेकिन सच्चाई सिर्फ़ इतनी है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार, उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार सरीख़े सभी पक्षों को दो टूक हिदायत दी है कि वो ख़ुद को ख़ुदा ना समझें और अपनी औक़ात में रहें! संविधान के दायरे में रहकर उसकी भावनाओं का आदर करते हुए अपना ध्यान उस जनता की सेवा पर लगाएँ जिसकी नो नुमाइंदगी करते हैं! यानी, दिल्ली का बॉस देश या दिल्ली की जनता है, लोकतंत्र है, संविधान है। नेता नहीं! नेतागिरी नहीं! ढोंग नहीं! धौंस नहीं! मक्कारी नहीं! बेईमानी नहीं! अफ़सर नहीं! अफ़सरशाही नहीं!

रही बात हार-जीत की, तो हरेक पक्ष कान खोलकर सुन ले कि कोई जीता नहीं है। कोई हारा भी नहीं। अलबत्ता, फ़ज़ीहत सभी पक्षों की हुई है। और, सबसे ज़्यादा फ़ज़ीहत उस केन्द्र सरकार की हुई है, जिसकी क़मान अभी नरेन्द्र मोदी के हवाले है। केजरीवाल सरकार की फ़ज़ीहत ये रही कि संविधान पीठ ने साफ़ कर दिया कि दिल्ली एक केन्द्र शासित प्रदेश ही है और यही रहेगा। इसे यूपी-बिहार जैसे राज्यों की तरह पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल सकता। उपराज्यपाल की फ़ज़ीहत ये हुई कि उन्हें साफ़-साफ़ बता दिया गया कि वो दिल्ली के बादशाह नहीं, बल्कि नियम-क़ायदों के मुताबिक़, चलने वाले एक प्रशासक से ज़्यादा और कुछ नहीं हैं। इस प्रशासक को अपने मंत्रिमंडल की उस सलाह के मुताबिक़ चलना ही होगा जो विधि-सम्मत हो।

यदि किसी मामले में राज्यपाल को ये लगे कि मंत्रिमंडल की सलाह विधि-सम्मत नहीं है तो वैसी स्थिति में वो अपने स्तर पर फ़ैसला नहीं ले सकता। बल्कि उसे मतभेद के मामले को राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। ध्यान रहे कि यहाँ ‘राष्ट्रपति’ का व्यावहारिक मतलब केन्द्र सरकार ही है। क्योंकि संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफ़ारिशों के मुताबिक ही फ़ैसला लेना पड़ता है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल की क़मान भले ही प्रधानमंत्री के हाथों में हो, लेकिन प्रधानमंत्री का फ़ैसला भी मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त के तहत सर्वसम्मति से ही होता है। संविधान की ये व्यवस्था क्षेत्राधिकार का सिद्धान्त यानी Principle of Separation of Power कहलाता है।

संविधान की यही व्यवस्था, सभी राज्यों और संस्थाओं पर लागू होती है। लिहाज़ा, दिल्ली का कोई विशेषाधिकार नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट का ये स्थापित करना कि चुनी हुई सरकार की जबाबदेही जनता के प्रति ही रहेगी, निर्वाचित सरकार को अपनी नीतियाँ बनाने और उसे लागू करने से तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक कि वो क़ानून-सम्मत हो। नाहक रोक-टोक से तानाशाही और अराजकता की दशा पैदा होती है। इसीलिए क्षेत्राधिकार की आड़ में अड़ंगेबाज़ी की इजाज़त किसी को नहीं मिल सकती। फिर चाहे वो उपराज्यपाल हों या केन्द्र सरकार! क़ानून-व्यवस्था, पुलिस और ज़मीन को छोड़कर बाक़ी किसी भी क्षेत्र में दिल्ली सरकार अन्य राज्यों की तरह ही सक्षम समझी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने अघोषित तरीके से मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है। क्योंकि भारत के संघीय ढाँचे में किसी राज्य सरकार की इतनी ज़ुर्रत नहीं है कि वो केन्द्र से पंगा ले सके। केन्द्र की भूमिका छतरी जैसी है। जिसकी तीलियों के रूप में राज्यों का रहना ज़रूरी है। इसीलिए भले ही केजरीवाल अपनी परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हों, लेकिन ये भी सच है कि मोदी सरकार का रवैया उसे परेशान और बदनाम करने का रहा है। बाक़ी, राज्यपाल और उपराज्यपाल जैसे संवैधानिक पद तो हमेशा केन्द्र सरकार की कठपुतली ही रहे हैं। ये वही करते हैं, जो इनसे करने के लिए कहा जाता है।

आग के बग़ैर धुआँ नहीं उठता। कुछ पदार्थ ऐसे ज़रूर होते हैं जो जलने पर कहीं ज़्यादा घना और काला धुआँ छोड़ते हैं। भले ही केजरीवाल ने ज़्यादा धुआँ छोड़ने वाले पदार्थ से बने नेता हों, लेकिन मोदी सरकार का ये ढोंग किसी से छिपा नहीं है कि वो संविधान के संघीय ढाँचे और राज्यों के अधिकारों का कैसा सम्मान करती है? कई राज्य सरकारों को गिराने-बनाने के खेल ने मोदी राज की नीति और नीयत दोनों को जमकर बेनक़ाब किया है। जनता से कुछ भी छिपा नहीं है। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सबसे ज़्यादा किरकिरी मोदी सरकार और उसके उपराज्यपाल की हुई है। उधर, केजरीवाल सरकार के पास भी अब अपनी नाक़ामियों का ठीकरा किसी और पर फोड़ना आसान नहीं होगा।

इसका मतलब ये हुआ कि अब केजरीवाल सरकार के पास तमाम रार-तकरार को छोड़कर अपने काम पर ध्यान देने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं होगा। नौकरशाही पर इसकी क़मान ऐसी ही होगी, जैसी कि अन्य राज्य सरकारों की होती है। सुप्रीम कोर्ट की ये व्यवस्था दिल्ली सरकार के लिए सबसे बड़ी राहत है। नौकरशाहों के लिए अब उपराज्यपाल या केन्द्र सरकार के इशारे पर दिल्ली सरकार का काम में अड़ंगा लगाना मुश्किल होगा। केजरीवाल के लिए ये राहत की बात भले ही हो, लेकिन इसे उनकी जीत नहीं माना जा सकता। क्योंकि संविधान ने कार्यपालिका की स्वतंत्रता के लिए जो प्रावधान किये हैं, उनकी बदौलत यदि अफ़सर ठान लेंगे तो मुख्यमंत्री मनमानी नहीं कर पाएँगे।

सियासत में नेताओं का अन्य संस्थाओं से टकराव सभी तभी होता है, जब नेता किसी बात पर अड़ गया हो और नौकरशाही उसकी हेंकड़ी के आगे नहीं झुके। नेता को मनमानी करने की मौक़ा नहीं मिलने पर टकराव के हालात बनते हैं। फ़ाइलें मोटी होती रहती हैं। नीतियों का फ़ायदा ज़मीन पर नज़र नहीं आता। तरह-तरह की परियोजनाओं में विलम्ब होता है। एक-दूसरे की ख़ामी को छिपाने और उभारने की जद्दोज़हद में तरह-तरह का भ्रष्टाचार जन्म लेता है और फलता-फूलता है।

आख़िरकार, हरेक झगड़े की क़ीमत जनता को ही चुकानी पड़ती है। क्योंकि नेताओं को तो जनता पाँच साल में बदल सकती है। अफ़सरशाही तो स्थायी होती है। निरंकुश, अमानवीय और लापरवाह होना नौकरशाही का सामान्य स्वभाव है। जबकि राजनीति का काम इसे संवेदनशील और जबाबदेह बनाना होता है। सरकारें तभी ठीक से काम कर पाती हैं, जब सभी पक्ष व्यावहारिकता और संयम से काम लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने इन्हीं बातों को फिर से स्थापित किया है।