दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल और नरेन्द्र मोदी के बीच छिड़ी ‘मूँछ की लड़ाई’ के सामने भारत का सुप्रीम कोर्ट बौना साबित हुआ है! सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने दोनों पहलवानों की छीछालेदर की है। लेकिन दंगल में मुँह के खाने के बावजूद कोई भी पक्ष अपनी शिकस्त मानने को तैयार नहीं है। उल्टा, दोनों की अपनी हार को जीत के रूप में परिभाषित करने पर आमादा हैं। ‘दो पाटन के बीच साबुत बचा न कोय’ की तर्ज़ पर असली नुकसान दिल्ली की जनता को झेलना पड़ रहा है। बीजेपी और ‘आप’ दोनों पक्षों ने अभी तक तो सिर्फ़ इतना ही साफ़ किया है कि सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ की ताज़ा नज़ीर अपने आप में नाकाफ़ी है और किसी भी गफ़लत को दूर करने के लिए कम से कम एक और अदालती नज़ीर की दरकार है।

दिल्ली के दंगल को ख़त्म करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को ही ये तय करना पड़ेगा कि 21 मई 2015 को केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी हुई उस अधिसूचना की क्या अहमियत है, जिसके मुताबिक़, उपराज्यपाल को दिल्ली का ऐसा ख़ुदा बना दिया गया, जिसकी जान केन्द्र सरकार के पास रखे पिंजड़े में ही बन्द रहेगी। 2015 की वो अधिसूचना, केजरीवाल का घमंड तोड़ने के लिए लाया गया था। लेकिन उसने केन्द्र सरकार में नया घमंड भर दिया। फिर दोनों के घमंडों का झगड़ा दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा। हाईकोर्ट ने 4 अगस्त 2016 को जो फ़ैसला दिया, उसने केजरीवाल के लिए ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा’ वाले हालात बना दिये। हाईकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। इसका फ़ैसला आना अभी बाक़ी है। वहीं से अगली नज़ीर आएगी।

दरअसल, सारा झगड़ा ही नीयतख़ोरों का है। संविधान पीठ ने कोई नयी व्यवस्था नहीं दी। मोदी-केजरी के सत्ता में आने से पहले दिल्ली का राजपाट वैसे ही चलता था, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले के मुताबिक़ होना चाहिए। पुरानी व्यवस्था के तहत भी दिल्ली में बीजेपी की कई बार सरकारें रह चुकी हैं। मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज ने शीला दीक्षित से पहले दिल्ली को उन्हीं क़ानूनों और परम्परा के मुताबिक़ चलाया, जैसा कि अभी सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है। लेकिन केजरीवाल तो अलग किस्म का डमरू बजाते हुए सत्ता में आये थे, इसीलिए उन्होंने नौकरशाही पर ऐसा रौब ग़ालिब करने की नीति अपनायी, जिसे बाबुओं ने अपनी हेठी समझा।

ख़ुद नौकरशाह रह चुके केजरीवाल ये भूल गये कि नौकरशाहों की डीएनए कैसा होता है? नौकरशाहों की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि कैसे किसी वाज़िब, मुनासिब और क़ानून-सम्मत काम को भी नहीं किया जाए! उनका सारा कौशल ही बनती बात में खुरपेंच लगाने का होता है। इसी की बदौलत जहाँ वो अपनी क़ाबलियत दिखाते हैं, वहीं रिश्वतख़ोरी, भष्ट्राचार, भाई-भतीजावाद जैसी महामारियों को पैदा करते हैं। नौकरशाहों की तो आदत ही होती है कि क़ानून और इसकी प्रक्रिया में मीन-मेख निकालना। इससे लोगों को परेशान करना। नौकरशाहों के बीच इतना शानदार भाईचारा होता है, जैसा किसी भी अन्य समुदाय में कभी नहीं देखा गया। ये आपस में एक-दूसरे की मदद करने के लिए किसी भी सीमा तक चले जाते हैं।

अपनी इसी मानसिकता की वजह से 2015 में दिल्ली सरकार के तमाम नौकरशाह रोते हुए साउथ ब्लॉक यानी केन्द्रीय गृह मंत्रालय पहुँचे। वहाँ अपने वरिष्ठ साथियों को बताया कि कैसे केजरीवाल उनकी बेइज़्ज़ती कर रहे हैं? उनसे अव्यावहारिक हुक़्म की तामील करने की अपेक्षा की जा रही है। बस, फिर क्या था! वरिष्ठ नौकरशाहों ने अपने भगवा सियासी हुक़्मरानों को केजरीवाल के ख़िलाफ़ भड़काना शुरू किया। ये साज़िश रंग लायी। 21 मई 2015 को मोदी सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी कि केन्द्र शासित प्रदेश होने के नाते दिल्ली पर केजरीवाल की नहीं बल्कि बीजेपी और उपराज्यपाल के रूप में तैनात होने वाले केन्द्र सरकार के एजेंट की है। 4 अगस्त 2016 वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले में भी उन्हीं नौकरशाहों के रुख़ का परचम लहराया।

ये नौकरशाहों का खेल था कि नजीब जंग के बाद केजरीवाल का वास्ता उपराज्यपाल के रूप में उस अनिल बैजल से पड़ा, जो ख़ुद भी नौकरशाह रह चुके हैं। नौकरशाहों की प्रवृत्ति होती है, सत्ता या शक्ति को अपनी मुट्ठी में रखना! राजनेता बन चुके केजरीवाल कभी इतने व्यावहारिक नहीं बने कि वो नौकरशाही के अपने संस्कारों को भूल जाएँ। नरेन्द्र मोदी की तरह उनकी लालसा भी हमेशा चमत्कारी दिखने की ही रही। वास्तव में चमत्कारी कोई नहीं है। कोई हो भी नहीं सकता! एक ही दौर में कई नेता ख़ुद के चमत्कारी होने का भ्रम भी नहीं फैला सकते! इसीलिए संविधान पीठ के फ़ैसले को सभी पक्षों ने ही अपने-अपने घमंड से जोड़ लिया।

केजरीवाल ने नौकरशाही के बीच बह रही हवा का रुख़ भाँपे बग़ैर आनन-फ़ानन में अफ़सरों के तबादले का आदेश जारी कर दिया। उन्हें फिर से मुँह की खानी पड़ी, क्योंकि नौकरशाह भी कोई कच्चे खिलाड़ी तो होते नहीं! उन्होंने भी फ़ौरन मुख्यमंत्री को लिखकर भेज दिया कि वो 21 मई 2015 वाले उस आदेश से बँधे हैं, जिसे राष्ट्रपति ने जारी किया था और जिसके बारे में संविधान पीठ का फ़ैसला ख़ामोश है।

नौकरशाहों से अघोषित तौर पर केजरीवाल को बता दिया कि ‘हमें अपना नौकर मत समझो। हम तुम्हारा हुक़्म नहीं मानने वाले। बाक़ी तुमसे जो करते बने, सो कर लो।’ ये सुनते ही अपनी चिरपरिचित शैली में केजरीवाल बुक्का फाड़कर रोने लगे। कहने लगे कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं मानने से अवमानना हो रही है! अराजकता फैल रही है! लोकतंत्र ख़तरे में है! मोदी सरकार हमें काम नहीं करने दे रही! नौकरशाही सहयोग नहीं कर रही! संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ रही हैं!

‘मोदी राज में अवमानना और अराजकता!’ इतना सुनना था कि खाली बैठे केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली की बाहें फड़फड़ा उठीं। उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट लिख मारा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को कैसे पढ़ा जाना चाहिए? बड़े वकील रहे हैं। क़ानून मंत्री रहे हैं। ख़ुद को अँग्रेज़ी और अदालत की भाषा का विद्वान मानते हैं। लिहाज़ा, दुनिया को बता कि नौकरशाही का बॉस कौन है? सुप्रीम कोर्ट ने भले ही कहा हो कि उपराज्यपाल को मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से काम करना होगा, लेकिन विधि-मर्मज्ञ अरूण जेटली ने फ़रमान सुना दिया है कि नौकरशाहों का अफ़सर तो उपराज्यपाल ही रहेगा। मुख्यमंत्री की क्या औक़ात कि वो नौकरशाहों को हाँके! दिल्ली, केन्द्र शासित है तो इसके नौकरशाह भी केन्द्र के अधीन समझे जाएँगे! यानी, ‘जाओ केजरीवाल, तुमसे जो उखाड़ते बने, उखाड़ लो।’

जेटली हों या केजरी, दोनों का अन्दाज़ उसी टकराव को हवा देने का है, जिससे परहेज़ करने की हिदायत सुप्रीम कोर्ट ने दी है। नीयतख़ोरों को नेकी से जुड़ी हिदायतें कभी पसन्द नहीं आतीं! दिल्ली के झगड़े के तीनों पक्षकार नीयतख़ोर हैं। नौकरशाही हो या बीजेपी या केजरीवाल, कोई किसी से कम ख़ुराफ़ाती नहीं! हरेक की फ़ितरत का ख़ामियाजा दिल्लीवासी भुगत रहे हैं। ये झगड़ा अभी और खिंचेंगा, क्योंकि आम चुनाव अब ज़्यादा दूर नहीं है। लिहाज़ा, एक ओर केजरीवाल के निक्कमेपन का शोर गूँजेगा तो दूसरी ओर से ये तराना सुनाई देगा कि ‘मोदी सरकार हमें काम नहीं करने दे रही! लेकिन हम हैं कि हमने तीन साल में ही ऐसे-ऐसे चमत्कार कर दिखाये हैं, जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुए! हम वो सूरमा हैं, जिसके हाथ-पैर बाँध दिये गये, फिर भी हमने ओलम्पिक की दौड़ का नया कीर्तिमान बना दिया!’

सुप्रीम कोर्ट साफ़ कर चुका है कि दिल्ली, एक ख़ास किस्म का केन्द्र शासित प्रदेश है। इसकी ज़मीन, पुलिस और क़ानून-व्यवस्था का ज़िम्मा केन्द्र के पास ही रहेगा। अन्य विषयों के लिए राज्य सरकार जबाबदेह है। राज्य के विषयों के लिए उपराज्यपाल वैसे ही संवैधानिक मुखिया हैं, जैसे अन्य राज्यों के राज्यपाल होते हैं। अब सिर्फ़ एक ही बात का फ़ैसला होना बाक़ी है कि क्या केन्द्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में तैनात किये गये नौकरशाहों की जबाबदेही उस सरकार के प्रति नहीं होगी, जिसके लिए वो तैनात किये गये हैं? केजरीवाल ने ये माँग तो कभी नहीं की कि पोर्ट ब्लेयर में तैनात नौकरशाह भी उन्हीं का हुक़्म मानें। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को ही जेटली और नौकरशाहों की व्याख्या को ख़ारिज़ करना पड़ेगा। फ़िलहाल, कोई भी समझाने से नहीं समझने वाला!