पुरखों को कोसने की बीमारी

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में बाणसागर नहर परियोजना का लोकार्पण करते हुआ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चिर-परिचित विज्ञापन-शैली में विपक्षी दलों पर निशाना साधा। लेकिन अफ़सोस कि जिस भाषण से मोदी अपने सियासी विरोधियों पर निशाना साध रहे थे, उसी भाषण से वो अपने सियासी ख़ानदान की बखिया भी उधेड़ रहे थे। मिसाल के तौर पर जब मोदी कहते हैं कि ‘यदि पहले की सरकारों से अपना काम ठीक से किया होता तो इतनी उपयोगी परियोजना का लाभ वर्षों पहले से मिलने लगता।’ ये बयान बिल्कुल सही है। लेकिन पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी भूल जाते हैं कि ख़ुद उनके उदय से पहले भी देश में बीजेपी की सरकारें रही हैं।

मोदी ये क्यों भूल जाते हैं कि उनके दिल्ली आने से पहले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की ही सरकारें नहीं थीं, बल्कि कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, कैलाश चन्द्र जोशी, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुन्दर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह चौहान वाली भगवा सरकारें भी सत्ता में रह चुकी हैं। लिहाज़ा, पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी ये क्यों नहीं कहते कि पिछली सरकारों में बीजेपी की भी सरकारें भी शामिल हैं! मोदी का ये नहीं कहना ही वो झूठ है, जो उनके भाषणों को विज्ञापन बनाता है।

नरेन्द्र मोदी को अपनी ब्रॉन्डिंग के लिए अपना विज्ञापन करने और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने के अलावा पुरखों को कोसने की ऐसी बीमारी है, जो उनसे पहले देश के किसी मुखिया की कभी नहीं रही! मोदी के व्यक्तित्व का ये सबसे ख़राब और घातक पहलू है! क्योंकि बीजेपी के नव-निर्मित मुख्यालय के अलावा देश में शायद ही कोई ऐसी योजना हो जो अपने निर्धारित वक़्त में पूरी हुई हो! भारत की सरकारी कार्यप्रणाली कई मायने में हमेशा से ही बेहद शर्मनाक रही है। मोदी-युग में भी योजनाओं के समय पर पूरा नहीं होने के सैंकड़ों उदाहरण हैं। इसीलिए जब मोदी पिछली सरकारों पर हमला करते हैं, तब वो ख़ुद अपना और अपने पद की गरिमा की खिल्ली उड़ाते हैं।

बाणसागर की हक़ीक़त

लगे हाथ बाणसागर परियोजना के इतिहास को भी जान लीजिए। 1956 में पहली बार केन्द्रीय जल आयोग ने इसकी परिकल्पना की थी। तब इसका नाम ‘डिम्बा प्रोजेक्ट’ था। इसे सोन और बनास नदी के संगम पर शिकारगंज के पास बनाया जाना था। बाद में इसे वहाँ से 30 किलोमीटर दूर मौजूदा जगह यानी शहडोल ज़िले में देवलोंद ले जाना का फ़ैसला हुआ। 1973 में इसके लिए मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों के बीच अन्तर्राज्जीय जल समझौता हुआ। तब संस्कृत के प्राचीन विद्वान बाण भट्ट के नाम पर इसे बाणसागर नाम दिया गया। समझौते के बावजूद शिलान्यास की नौबत आने तक पाँच साल और बीत गये।

Bansagar Dam  70 साल में मोदी की तरह किसी ने पिछली सरकारों को नहीं कोसा Bansagar Dam

14 मई 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने बाणसागर परियोजना का शिलान्यास किया। जनता पार्टी की उस सरकार में जनसंघ की ओर से अटल-आडवाणी मंत्री थे। तब बीजेपी ही नहीं, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का भी जन्म नहीं हुआ था। इसके बावजूद, 1973 में जिस परियोजना की अनुमानित लागत 91.31 करोड़ रुपये थी, उसके शिलान्यास के वक़्त 322.2 करोड़ रुपये मंज़ूर किये गये। शिलान्यास के 14 महीने बाद मोरारजी सरकार गिरी। लेकिन तब तक परियोजना का निर्माण शुरू नहीं हो पाया। लिहाज़ा, क्या मोदी बताएँगे कि उस ज़माने की देरी का ठीकरा किससे सिर फोड़ा जाए!

बाणसागर का श्रेय सिर्फ़ बीजेपी को क्यों?

विंध्य क्षेत्र से जुड़े मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के सर्वाधिक सूखाग्रस्त इलाके की अनियमित वर्षा को देखते हुए सोन नदी के पानी के इस्तेमाल के लिए बनी बाणसागर परियोजना के जलाशय के पानी को तीन हिस्से में बाँटने की योजना बनी। लाभार्थी राज्यों के जल अनुपात के मुताबिक ही बाणसागर की 50 फ़ीसदी लागत मध्यप्रदेश को और बाक़ी 25-25 फ़ीसदी उत्तर प्रदेश तथा बिहार को देना था। लेकिन समय रहते राज्यों से वित्तीय अंशदान नहीं मिला और परियोजना लटकती चली गयी। इन अड़चनों को दूर करने के बाद निर्माण का असली काम 1997 में शुरू हो पाया। हालाँकि, 1998 तक संशोधित लागत 1055 करोड़ रुपये को पार कर चुकी थी।

निर्माण शुरू होने के वक़्त अटल जी प्रधानमंत्री थे, तो मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और बिहार में राबड़ी देवी की सरकारें थीं। दिग्विजय सरकार दिसम्बर 2003 तक रही। फिर उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह की सरकारें बनीं। ज़ाहिर है, बाणसागर का श्रेय किसी अकेले को नहीं मिल सकता। बहरहाल, शिवराज के वक़्त बाणसागर का मध्य प्रदेश वाला हिस्सा बन गया और 25 सितम्बर 2006 को अटल जी ने उसका लोकार्पण किया। इस दौरान 1997 में उत्तर प्रदेश के हिस्से वाली 172 किलोमीटर लम्बी बाणसागर नहर परियोजना का काम शुरू हुआ। इसी का लोकार्पण मोदी ने अभी किया है।

आख़िरकार, 3500 करोड़ रुपये की लागत और दशकों की देरी के बाद विंध्य पर्वत में सुरंग बनाकर सोन नदी के पानी को मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश की ओर लाने का सपना साकार हुआ। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने पिछली पीढ़ियों की मेहनत का सेहरा जिस ढंग से अपने सिर बाँध लिया, उसके बाद ये पूछना लाज़िमी हो गया है कि क्या बाणसागर का सपना उन्होंने देखा था? क्या सिर्फ़ उनकी सरकार ने इसके लिए रात-दिन एक कर दिया? क्या इतनी बड़ी परियोजना योगी-मोदी राज की कोशिशों से ही चालू हो पायी? सच्चाई तो ये है कि जुलाई 2015 में आयी प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना से जोड़े जाने तक बाणसागर का 90 फ़ीसदी काम हो चुका था। दशकों की देरी के बावजूद यदि मोदी श्रेय के हक़दार हैं तो फिर पुरानी सरकारें क्यों नहीं!

मुफ़्त की वाहवाही का नशा

दरअसल, मोदी को मुफ़्त की वाहवाही बेहद पसन्द है। किस्मत में उन्हें ऐसे कई मेगा-प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण करने का सौभाग्य भी मिलता रहा, जिसके लिए सारी जद्दोज़हद पिछली सरकारों ने की। मिसाल के तौर पर, 4 जून 2016 को मोदी, अफ़ग़ानिस्तान को जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे, उसकी व्यावहारिकता (Feasibility) रिपोर्ट 1957 में बनी थी और निर्माण 1976 में शुरू हुआ था। इससे पहले 25 दिसम्बर 2015 को मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान के नये संसद भवन का लोकार्पण किया, उसका शिलान्यास भी अगस्त 2005 में मनमोहन सिंह ने किया था।

जम्मू-कश्मीर को हर मौसम में सड़क मार्ग से जोड़ने वाली 10 किलोमीटर लम्बी चेनानी-नाशरी (पटनीटॉप) सुरंग का लोकार्पण मोदी ने 2 अप्रैल 2017 को किया। इस हाईटेक प्रोजेक्ट का निर्माण 2011 में शुरू हुआ। लेकिन उद्घाटन के वक़्त सारा श्रेय मोदी ने ऐसे लपक लिया, मानों ये उनकी नोटबन्दी की उपलब्धि रही हो। दूसरी ओर, मोदी राज की कार्यशैली की पोल ज़ोजीला सुरंग की योजना ने खोल दी।

हक़ीक़त ये है कि कश्मीर को लेह से जोड़ने वाली ज़ोजीला सुरंग के निर्माण को मनमोहन कैबिनेट की मंज़ूरी अक्टूबर 2013 में मिली। इसके बावजूद शिलान्यास मई 2018 में हो सका। इसी तरह, असम को अरूणाचल से जोड़ने वाले ब्रह्मपुत्र पर बने जिस सबसे लम्बे ढोला-सादिया या भूपेन हज़ारिका पुल का उद्घाटन नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2017 को किया, उसके सर्वेक्षण का काम 2003 में शुरू हुआ था। जनवरी 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी थी।

जुमला बना घड़ियाली आँसू

मिर्ज़ापुर की जनसभा में ही मोदी कहते हैं कि “जो लोग आजकल किसानों के लिए घड़ियाली आँसू बहाते हैं, उनसे आपको पूछना चाहिए कि आख़िर क्यों उन्हें अपने शासनकाल में देश भर में फैली इस तरह की अधूरी सिंचाई परियोजनाएँ नहीं दिखाई दीं? पिछली सरकार ने कभी किसानों की चिन्ता नहीं की। जो लोग किसानों के नाम पर राजनीति कर रहे हैं उनके पास न्यूनतम समर्थन मूल्य की कीमत को बढ़ाने का समय नहीं था।”

अरे मोदी जी, किसानों के नाम पर कथित घड़ियाली आँसू बहाने वालों से तो जनता देर-सबेर जबाब तलब करती ही रही है, लेकिन क्या आपको पता है कि आपने तो ख़ुद कभी भी जनता के सवालों का सामना नहीं किया! अब यदि हिम्मत हो तो देश को ये बताइए कि आपके शासनकाल में अब तक कितनी सिंचाई परियोजनाओं को मंज़ूरी मिली? उनमें से कितनों पर काम चालू हुआ? और, उनमें से कितनी परियोजनाओं का लोकार्पण मई 2019 तक होने वाला है? इसके अलावा, क्या आप कह सकते हैं कि आपके पाँच साल पूरे होने तक देश की कोई सिंचाई परियोजना देरी से नहीं चल रही होगी?

नौकरशाही का ढर्रा

अरे, पिछली सरकारों को तो छोड़िए, आपकी सरकार की सैंकड़ों महत्वाकाँक्षी योजनाएँ या तो बेहद देरी से चल रही हैं या फिर उनकी उपलब्धि शर्मनाक है। सच्चाई तो ये है कि आपके मातहत काम कर रहे अलग-अलग मंत्रालय भी अब भी वैसे ही अड़ंगा लगाते हैं, जैसा वो पिछली सरकारों के ज़माने में होता था! ज़ाहिर है कि आप दावे चाहे जितने कर लें, लेकिन आपके राज में भी नौकरशाही का ढर्रा बिल्कुल पहले जैसा ही है। और हाँ, यदि आपको पता हो तो ज़रा देश को बताइएगा कि क्या आपसे पहले किसी सरकार ने कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया था या नहीं? या फिर 70 साल में क्या ये पहला मौका है जब किसानों पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्रान्तिकारी इज़ाफ़ा करके किसानों को निहाल कर दिया है!

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने उस वक़्त भी सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी ही की, जब उन्होंने कहा कि “हम अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को कम करना चाहते हैं। इसका परिणाम जल्द ही आपको दिखने लगेगा। क्योंकि पहली बार विकास न सिर्फ़ हो रहा है, बल्कि दिख भी रहा है! [इसी विकास को] ग़रीब अब आपकी आँखों में आँखें डालकर विश्वास से देख सकता है। क्योंकि मोदी ग़रीब को इस लायक बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” अरे मोदी जी, जब आप कहते है कि अमीर-ग़रीब की खाई कम होने वाली है तब डर लगता है कि कहीं आप नीरव-मेहुल जैसे कई और दोस्तों पर भी मेहरबान ना हो जाएँ! आपको ये कौन बताएगा कि बैंकों में रखा ग़रीबों का पैसा वहाँ से दिन-दहाड़े लूटकर देश से फ़ुर्र हो जाने से ही अमीर-ग़रीब की खाई मिट नहीं रही, बल्कि और चौड़ी तथा गहरी हो रही है!

मोदी बने विज्ञापन

दरअसल, नरेन्द्र मोदी की शख़्सियत में एक प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक या चौकीदार या एक शिक्षित, समझदार और गरिमावान राजनेता का अक़्स बेहद कम है। उनमें एक विज्ञापन की ख़ूबियाँ कहीं ज़्यादा नज़र आती हैं! मोदी में वो सभी गुण हैं, जो किसी विज्ञापन में होते हैं! विज्ञापनों में जिस तरह से सच के मामूली से अंश को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर और आकर्षक ढंग से पेश किया जाता है, वैसे ही मोदी अपनी चौतरफ़ा नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अपने मामूली से योगदान को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।

Modi Baan Sagar AD  70 साल में मोदी की तरह किसी ने पिछली सरकारों को नहीं कोसा Modi Baan Sagar AD

मोदी भूल चुके हैं कि सच की महिमा निराली है! सच, निष्कपट होता है। सच जितना होता है, उतना ही नज़र आता है। कम-ज़्यादा नहीं। यही ब्रह्म सत्य है! सच को आप जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहेंगे, आपको उसमें उतना ही झूठ मिलाना पड़ेगा! झूठ को आँख बन्द करके नहीं मिलाया जा सकता। इसीलिए विज्ञापनों में किसी उत्पाद की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते वक़्त कई तरक़ीबें अपनायी जाती हैं। जैसे जिंगल, मॉडलिंग, संवाद, अभिनय, फ़ोटोग्राफ़ी, रोशनी, सेट वग़ैरह-वग़ैरह। ये आकर्षण परस्पर मिलकर झूठ का मेकअप या शृंगार करते हैं। झूठ को शृंगार की ज़रूरत इसलिए है, क्योंकि वो बुनियादी तौर पर कुरूप होता है!

हरेक भाषण विज्ञापन

नरेन्द्र मोदी का हरेक भाषण, सिर्फ़ उनका विज्ञापन है। बीते पाँच साल में, मोदी देश में हो या विदेश में, लेकिन शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब मोदी ने भाषणबाज़ी नहीं की। मौका जो भी हो, लेकिन उनका भाषण हमेशा चुनावी और वीर-रस से ओत-प्रोत ही रहता है। इसीलिए उन्हें हक वक़्त ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने’ की लत पड़ गयी है। जब हमेशा अपना गुणगान करने की लाचारी होगी तो हमेशा विज्ञापन की तरह सच-कम और झूठ-ज़्यादा तो बोलना ही पड़ेगा। अपनी इसी लाचारी की वजह से वो ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें फेंकूँ का ख़िताब मिला!

विज्ञापन की तरह झूठ को बार-बार फैलाना ही ब्रॉन्ड मोदी की सबसे बड़ी ख़ासियत है। काश! कोई उन्हें समझा पाता कि झूठ का मोटा पलेथन लगाकर भी सच की छोटी लोई से बड़ी रोटी नहीं बेली जा सकती! काश! कोई उन्हें बता पाता कि सार्वजनिक जीवन में विरोधियों पर हमला करने से पहले हमेशा तथ्यों को ठोक-बजाकर देख लेना चाहिए। वर्ना, आपको जितना सियासी फ़ायदा होगा, उससे कहीं ज़्यादा आप हँसी के पात्र बनेंगे। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए व्यंग्य और मसख़रापन में मामूली फ़र्क़ ही होता है!