सवा सौ करोड़ भारतवासी ये कान खोलकर सुन लें कि देश में किसी को भी सरेआम पीट-पीटकर मार डालने यानी ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएँ तब तक नहीं थमने वालीं, जब तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ती रहेगी! लिहाज़ा, जो लोग भी ये सोचते हैं कि लिंचिंग बन्द होनी चाहिए, उन्हें मोदी की लोकप्रियता को गिराना होगा, उसे ख़त्म करना होगा। या, सीधे शब्दों में कहें तो मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना होगा। वर्ना, मोदी को सत्ता चाहिए, सत्ता के लिए लोकप्रियता चाहिए और लोकप्रियता के लिए लिंचिंग चाहिए!

केन्द्रीय वित्त और कम्पनी मामलों के राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बीजेपी शासित राज्यों में लगातार बेलग़ाम बनी हुई ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाओं का ऐसी समाजशास्त्रीय और राजनीतिक विश्लेषण किया जैसे पहले कभी किसी राजनेता या वैज्ञानिक ने नहीं किया। मेघवाल ने बताया कि “जैसे-जैसे प्रधानमंत्री मोदी पॉपुलर हो रहे हैं, इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह सब मोदी जी क्यों पॉपुलर हो रहे हैं? इससे डरकर किया जा रहा है। केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों को कह दिया है कि इस तरह की किसी भी घटना पर कार्रवाई करें। लेकिन जैसे-जैसे 2019 का चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे नरेन्द्र मोदी की पॉपुलैरिटी और बढ़ती जा रही है। इसीलिए ये सब घटनाएँ सामने आ रही हैं।”

राजनीति की इतनी सहज और सटीक व्याख्या करने वाले महापुरुष अर्जुन राम मेघवाल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस को छोड़कर वैसे ही राजनीति में अपने क़दम रखे थे, जैसे कभी यशवन्त सिन्हा ने सरकारी नौकरी छोड़कर सियासत में अपने पैर जमाये थे। मेघवाल ने गौरक्षा के नाम पर अलवर में हुई लिंचिंग में हुई अकबर ख़ान की हत्या की निन्दा की। लेकिन साथ ही लिंचिंग की वजह भी समझायी। मेघवाल से पहले यशवन्त सिंह के सपूत और केन्द्रीय नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयन्त सिन्हा ने भी लिंचिंग के लिए अदालत से दोषी ठहराये जा चुके अपराधियों का माला पहनाकर अभिनन्दन भी इसीलिए किया था, क्योंकि मोदी की लोकप्रियता के लिए लिंचिंग ज़रूरी है!

लिंचिंग की संवेदनशीलता को ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी किसी से कम नहीं समझते हैं। तभी तो उन्होंने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई 12 घंटे लम्बी चर्चा में पौने दो घंटे का अभिनयपूर्ण भाषण दिया। इस भाषण ने मोदी ने चन्द्र बमुश्किल 10 सेकेंड के भीतर ये कहकर रस्म अदायगी की कि ‘लिंचिंग मानवता के ख़िलाफ़ है और राज्यों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए!’ बेचारे प्रधानमंत्री की ये दो टूक भी, पता नहीं किसी ने सुनी या नहीं! यदि सुन ली होती तो यक़ीन जानिये कि बीजेपी शासित 22 राज्यों में लिंचिंग फ़ौरन रूक जाती! बेचारा अकबर ख़ान, अलवर में बेमौत नहीं मारा जाता!

बहरहाल, लिंचिंग रूकी नहीं। लिहाज़ा, मोदी की लोकप्रियता बढ़ी। लोकप्रियता और बढ़ना है तो लिंचिंग बढ़ानी होगी। दूसरे शब्दों में कहे तो ‘लिंचिंग रूकी, मोदी सरकार गिरी!’ या, ‘लिंचिंग नहीं तो मोदी नहीं!’ इसीलिए ज़रा इस सच्चाई को भी समझ लीजिए कि मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से डरकर कौन लिंचिंग करवा रहा होगा? विपक्षी नेता तो मोदी की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए लिंचिंग करवाने से रहे! मोदी की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए संघ-बीजेपी और उसके अन्ध भक्तों के अलावा और कौन बेचैन हो सकता है? ये बेचैनी भी क्या तभी नहीं बढ़ेगी, जब मोदी-प्रेमियों को साफ़ दिख रहा होगा कि मोदी की लोकप्रियता गिर रही है और उसे बढ़ाने के लिए लिंचिंग वाले बूस्टर डोज़ की सख़्त ज़रूरत है?

अब ज़रा ये सोचिए कि जब सामने नरेन्द्र मोदी की गिरती लोकप्रियता को सम्भालने और फिर उसे बढ़ाने की चुनौती हो, तो फिर कौन माई का लाल सुप्रीम कोर्ट के उस ताज़ा आदेश को अमल में लाएगा, जो कहता है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

इसका मतलब ये हुआ कि मोदी की लोकप्रियता बढ़ाने में माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया बाधक साबित होगा! लिहाज़ा, आने वाले दिनों में यदि आप सुप्रीम कोर्ट को अपनी अवमानना को लेकर सिर धुनते देखें तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा! दूसरे शब्दों में जो लोग भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को गम्भीरता से लेना चाहते हैं, उनके लिए अर्जुन राम मेघवाल का अघोषित सन्देश है कि जितना लिंचिंग करना है करो, जितना दंगा फैलाना है फैलाओ, जितना हिन्दू-मुसलिम करना है करो, बीजेपी हरेक उपद्रवी को माला पहनाएगी और देश भर में ढोल पीटेगी कि सारे फ़साद की जड़ वो डरपोक लोग हैं जो मोदी की लोकप्रियता को बढ़ने नहीं देने की साज़िश करते हैं।

मेघवाल ने इन शब्दों पर भी ग़ौर कीजिए जिसमें वो कहते हैं कि ‘मोदी जी ने योजनाएँ दी और उसका असर दिख रहा है। ये उसका एक रिएक्शन है।’ मेघवाल के इस बयान का ये मतलब हुआ या नहीं कि मोदी ने ही अघोषित तौर पर लिंचिंग की योजना बनायी है और उसका असर सामने है! दूसरा मतलब ये भी हो सकता है कि ‘मोदी जी की लोकप्रियता चाहिए तो मुफ़्त में लिंचिंग पाइए’! तीसरा मतलब ये है कि लोकप्रियता और लिंचिंग – एक के साथ एक फ़्री!

एक और अघोषित व्याख्या है कि बीजेपी बिल्कुल बेशर्म है। वो लिंचिंग की रोकथाम के लिए कुछ नहीं करेगी। क्योंकि हरेक चीज़ के लिए बस काँग्रेस ज़िम्मेदार है! काँग्रेस सत्ता में हो तो ज़िम्मेदारी सत्ता की और बीजेपी सत्ता में हो तो ज़िम्मेदारी काँग्रेस की! एक अन्य महापुरुष, केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी अघोषित रूप से कह ही चुके हैं कि चौरासी का दंगा ‘सबसे बड़ी लिंचिंग’ था। मोदी राज की लिंचिंग के बारे में सवाल तब पूछिएगा, जब इसमें मारे जा रहे लोगों की संख्या 1984 में मारे गये लोगों से ज़्यादा हो जाएगी।