महज 50 महीने में ही नरेन्द्र मोदी के सपनों का ‘नया भारत’ बनकर तैयार हो चुका है! बीजेपी के आलीशान मुख्यालय के डेढ़ साल में बनकर तैयार होने के बाद 50 महीने की अल्पावधि में ‘नये भारत’ का निर्माण हर मायने में ऐतिहासिक उपलब्धि है! इस ‘नये भारत’ में उत्तर प्रदेश पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक प्रशान्त कुमार जहाँ काँवड़ियों पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा करते हैं, वही काँवड़िये कभी बुलन्दशहर में पुलिस के वाहन में तोड़फोड़ करते हैं, तो कभी मेरठ में इसलिए बलवा किया जाता है कि वहाँ काँवड़ियों को एक मीट की दुकान खुली दिख गयी।

बरेली के खेलुम गाँव से 250 स्थानीय हिन्दुओं और मुसलमानों ने इसलिए पलायन कर लिया कि वहाँ से शिवभक्त काँवड़ियों का जुलूस गुज़रने वाला है। ग्रेटर नोएडा में काँवड़ियों के दो गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प को भी ‘नये भारत’ की गौरवशाली घटना के रूप में देखा जा सकता है। गोरखपुर में एक दारोगा का वर्दी में योगी आदित्यनाथ को शाष्टांग करना भी ‘नये भारत’ की अद्भुत उपलब्धि है। साध्वी प्राची जैसे भगवा प्रचारक ने तो ये माँग करके ‘नये भारत’ में चार चाँद जड़ दिये कि काँवड़-यात्रा को देखते हुए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों पर रोक लगा दी जाए। दिल्ली में भी काँवड़ियों ने एक कार को अपना ताँडव रूप दिखाकर ‘नये भारत’ का जश्न मनाया।

‘नये भारत’ का ही जश्न मुज़फ़्फ़रपुर और देवरिया के बालिका आश्रय गृहों में रहने वाली बच्चियों को देह-व्यापार में ढकेलकर मनाया गया। इसे भी उन्हीं हिन्दुओं ने अन्ज़ाम दिया जो नवरात्रियों में कन्या-पूजन का पुण्य बटोरते हैं। हरदोई में भी ऐसे ही एक नारी निकेतन पर ज़िलाधिकारी की गाज़ गिरी जहाँ सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट के लिए रिकॉर्ड में महिलाओं की संख्या को बढ़ाचढ़ाकर दिखाया गया था। ‘नये भारत’ की ऐसी तमाम उपलब्धियों में लिंचिंग की अनेक गौरवशाली घटनाएँ भी शामिल हैं। मुमकिन है कि ऐसे पाप मोदी युग से पहले भी होते रहे होंगे, लेकिन मौजूदा ‘नये भारत’ में बीते ज़माने के पापों का उद्धार करके उन्हें पुण्य का जामा पहनाया जा चुका है। इसीलिए मोदी राज का ‘नया भारत’ अद्भुत है! अतुलनीय है!

‘नये भारत’ की इन ताज़ातरीन उपलब्धियों के केन्द्र में काँवड़ियों का वो गेरुआ या भगवा रंग भी है जो कभी त्याग और वैराग्य का प्रतीक होता था। लेकिन 1990 के दशक वाले अयोध्या कांड के दौर के बाद यही गेरुआ रंग उन्मादी, दंगाई, बलवाई, व्याभिचारी और आतंकवादियों की रंगत बन गया। कालान्तर में गेरुआ की आड़ में हरेक कुकर्म होने लगे। शिवसैनिकों और बजरंगदलियों को भी गेरुआ रंग बहुत प्रिय रहा है। गेरुआ धारण करते ही उनका ख़ून भी वैसे ही उबलता है, जैसे काँवड़ियों का रक्तचाप और मानसिक सन्तुलन बेक़ाबू हो जाता है। इसीलिए ‘नये भारत’ में गेरुआ रंग त्याग-तपस्या का नहीं बल्कि हिन्दू आतंकवादियों का पसन्दीदा हुलिया बन चुका है। काँवड़िये जब हाथों में तिरंगा थाम लेते हैं तो वो ऐसे और उदंड हो जाते हैं, जैसे राष्ट्रसेवा की तीर्थयात्रा कर रहे हों!

मोदी राज के ‘नये भारत’ में हिन्दू आतंकियों को हिन्दू तालिबानी भी कह सकते हैं और हिन्दुत्व के क्रान्तिकारी भी! इन गेरुआधारियों को संघ-बीजेपी की खुली शह हासिल है। लिंचिंग इनकी भाषा का बुनियादी व्याकरण है। मौजूदा दौर में यही राष्ट्रभक्त और धर्मभीरू लोगों की जमात भी है। यही सोशल मीडिया वाले पालतू ट्रोलर भी हैं। इनकी मानसिकता ही अब पुलिस की वर्दी में घूमते सुपारीबाज़ हत्यारों में भी देखी जा सकती है। गेरुआ से ओतप्रोत सत्ता प्रतिष्ठान ऐसे पुलिसवालों को भी वैसे ही अपनी भ्रष्ट जाँच एजेंसियों से सुरक्षा प्रदान करवाता है, जैसे काँवड़ियों को अभय-दान हासिल होता है। यही लिंचिंग-वीर कभी-कभार मीडिया के स्टिंग ऑपरेशन में अपनी वीरगाथा सुनाते हुए भी दिख जाते हैं!

अब सवाल ये है कि क्या ये उत्पाती गेरुआधारी हमारे-आपके परिवारों के ही भटके हुए, अल्प-शिक्षित, आंशिक रोज़गारधारी लोग नहीं हैं? क्या इनके दिमाग़ को ही वैसे विषाक्त (indoctrinated) नहीं किया गया है, जैसा हम पाकिस्तान से आने वाले आतंकियों के मामले में देखते आये हैं? गेरुआधारी हिन्दू आतंकियों को पाकिस्तान, सीमापार के शिविरों से नहीं भेजता। इन्हें तो नागपुर अकादमी की शाखाएँ दिन-रात भारत के ही कोने-कोने में दीक्षित और प्रशिक्षित करती रहती हैं। यही गेरुआधारी थोड़े दिनों बाद गणेश-उत्सव और फिर दुर्गापूजा और कालीपूजा के वक़्त भी उन्माद फैलाते नज़र आएँगे। यही लोग मोदी-राज की पकौड़ा-योजना को भी सफलता की नयी बुलन्दियों पर पहुँचा रहे हैं, ताकि मोदी-शाह के ‘नये भारत’ को यथाशीघ्र संघ प्रमुख मोहन भागवत के सपनों वाला ‘विश्व-गुरु’ बनाया जा सके!

अगला सवाल है कि विश्व-गुरु के गेरुआधारी परम शिष्यों की करतूतों को शर्मनाक या दुःखद कैसे कहा जा सकता है? जिस दिन बहुसंख्यक-मध्यमवर्गीय-मन्दबुद्धि-सवर्ण हिन्दू समाज इन सवालों का जबाब जान जाएगा, उसी दिन मक्कारों का राज ख़त्म हो जाएगा। हालात वैसे ही अपने आप सुधरने लगेंगे, जैसे ज्वलनशील पर्दाथों के जलकर खाक़ हो जाने के बाद बड़ी से बड़ी आग भी अपने आप शान्त हो जाती है!

फ़िलहाल, आप चौकन्ना रहकर इस बात का हिसाब रख सकते हैं कि किन-किन नेताओं ने गेरुआ परिधानों में घूम रहे काँवड़ियों के उत्पातों की निन्दा की और उनके ख़िलाफ़ ‘कड़ी कार्रवाई’ की दुहाई दी! ग़ौर कीजिएगा कि कितने भगवा बयान-वीर ये कहने का साहस जुटा पाते हैं कि ‘क़ानून अपना काम करेगा!’ अरे, क़ानून कहीं होगा, तभी तो कुछ करेगा! अभी तो आप क़ानून-रहित भारत में आनन्दित होने का सुख लीजिए, यदि ले सकें तो!