संघ-बीजेपी की ओर से इन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी को ऐसा सम्मान दिया जा रहा है, जिससे लगे कि वो बहुत महान थे! इतने, जितने कि महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस और इन्दिरा गाँधी भी नहीं रहे। फ़िलहाल, देश में ‘अटल महानता उत्सव’ चल रहा है। हरेक भारतीय से अपेक्षित है कि यदि वो ख़ुद को देश भक्त या भारत को प्यार करने वाला मानता है तो उसे इस अटल-पर्व में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। इसके लिए हरेक संघी लम्पट को अपने ईर्द-गिर्द ये फैलाना होगा कि अटल जैसा कोई नहीं! यदि कोई उनके आसपास हो सकता है, यदि कोई उनका असली सियासी वारिस हो सकता है तो उसका नाम है नरेन्द्र मोदी!

ये वक़्त उन लोगों के लिए बेहद सावधान रहने का है जिन्हें अटल जी एक उम्दा वक़्ता तो लगते थे, लेकिन महान राजनेता नहीं! मोतीहारी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर संजय कुमार को संघी राष्ट्रभक्तों ने इसलिए पीट-पीटकर अधमरा कर दिया कि उन्हें अटल जी महान नहीं लगते थे। स्वामी अग्निवेश की तो छाया ही अटल जी के पार्थिव शरीर के लिए अनिष्टकारी साबित होती, तभी तो अटल जी के लम्पट भक्तों ने उनके प्रति परमार्थ दिखाया! इसीलिए अब अटल जी की अस्थियों के विसर्जन वाली मंगल बेला में ये सवाल पैदा हुआ है कि कहीं आपको भी अटल जी महानता पर शक़ तो नहीं!

यदि आप अटल जी को महान मानने के लिए तैयार हैं तो भी आपका ये जानना बेहद ज़रूरी है कि संघ-बीजेपी के लफ़ंगों ने इन दिनों अटल जी की महानता को स्थापित करने के लिए भारतवर्ष में लिंचिंग-युद्ध छेड़ रखा है। संघी चिन्तकों की मंशा है कि देश में कोई ऐसा नहीं होना चाहिए जो अटल जी को महान मानने से गुरेज करे! दरअसल, संघियों को लगता है कि मोदी राज के महानता की गिरती लोकप्रियता को यदि अटल जी की महानता का सहारा मिल जाएगा तो 2019 में उनकी डूबती नैय्या पार लग जाएगी। इरादा है कि 1984 की इन्दिरा-लहर की तरह 2019 के लिए अटल-लहर पैदा हो जाए, जिसमें मोदी को महान अटल का सियासी वारिस बनाकर थोप दिया जाए! अब ज़रा इसकी अहम वजहों पर भी ग़ौर कर लीजिए।

• संघ ने अटल जी को कभी उम्दा ब्राह्मण नहीं माना। क्योंकि अटल जी, उन नागपुरिया चितपावन ब्राह्मणों की जमात से नहीं थे, जिनका संघ-बीजेपी पर हमेशा दबदबा रहा! दूसरी ओर, अटल जी, एक चतुर उत्तर भारतीय ब्राह्मण थे। उन्हें नाखुन कटवाकर शहीद होने का तमग़ा लेने में महारत हासिल थी। इसीलिए अटल जी ने जहाँ आज़ादी से पहले अँग्रेज़ों के लिए मुख़बिरी करके और उनका वादा माफ़ गवाह बनकर स्वतंत्रता सेनानी बनने के धतकरम किये, वहीं 6 दिसम्बर के ख़ूनी छींटों और क़ानून की लाठी से बचने के लिए उन्होंने आडवाणी को आगे रखा और ख़ुद पीछे से हवा देते रहे! ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा कर पाते!

• संघ-बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे की वजह से 1980 में अटल-आडवाणी को जनता सरकार की जड़ों में मट्ठा डालना पड़ा, वहीं एनडीए-1 की सत्ता की ख़ातिर अटल जी को फिर से उसी साम्प्रदायिक एजेंडे से दूरी रखनी पड़ी जिसे ‘मन्दिर, 370 और कॉमन सिविल कोड’ जैसे विवादित मुद्दों के नाम से जाना जाता है। सत्ता की ख़ातिर अपनी प्रगतिशील तथा उदारवादी छवि को भुनाने के लिए अटल जी ने जैसे विवादित मुद्दों से कन्नी काटी थी, वैसे ही जम्मू-कश्मीर में संघ-बीजेपी ने अलगाववादियों की हिमायती महबूबा मुफ़्ती के साथ नाता जोड़ा। ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा कर पाते!

• अटल जी के मौकापरस्त और भ्रमित करने वाले व्यक्तित्व को देखते हुए ही गोविन्दाचार्य ने उन्हें संघ-बीजेपी का मुखौटा कहा था। तब अटल जी प्रधानमंत्री थे और गोविन्दाचार्य, बीजेपी के महासचिव! गोविन्दाचार्य को इसकी वैसी ही सज़ा मिली जैसे जिन्ना को सेक्यूलर बताने के लिए लौहपुरुष को निपटाया गया! इसीलिए 2002 में जब अटल जी ने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का मुखौटा दिखाने की ज़ुर्रत की तो मोदी ने उनकी हिदायत को ठेंगे पर रखा। संघ-बीजेपी वही करते रहे जो उन्हें करना था, जबकि अटल जी दुनिया को अपना मुखौटा दिखाकर हमदर्दी बटोरते रहे! क्योंकि अपनी इसी अदा से अटल जी 13 दिन वाले दौर में विरोधियों से ये वाहवाही बटोर चुके थे कि ‘वो ग़लत जगह पर खड़े सही आदमी आदमी हैं!’ ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा कर पाते!

• संघ-बीजेपी ने अटल जी की कड़े फ़ैसले लेने वाले राजनेता की छवि के लिए वैसे ही पोखरण-2 करवाया, जैसे नरेन्द्र मोदी के लिए सर्ज़िकल हमला हुआ। इसी तरह, पाकिस्तान के प्रति प्रेम जताने के लिए जहाँ अटल जी बस लेकर लाहौर गये, वहीं नरेन्द्र मोदी भी नवाज़ शरीफ़ की बिरयानी खाने के लिए अचानक उनके घर में जा टपके। अटल जी ने उत्कट देशभक्ति दिखाते हुए जहाँ जेल में बन्द आतंकवादियों को कन्धार पहुँचवाया, वहीं नरेन्द्र मोदी ने भी आईएसआई को पठानकोट वायुसेना स्टेशन पर आदर-सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा कर पाते!

• अटल-युग में ताबूत घोटाला हुआ, विनिवेश के ज़रिये 37 सरकारी कम्पनियाँ कौड़ियों के मोल बेची गयीं, बंगारू लक्ष्मण कैमरे पर रुपयों के साथ देश भक्ति प्रदर्शित करते पाये गये, तो जबाब में मोदी ने 70 साल का सबसे बड़ा, राफेल घोटाला देश को दिया, संचार तंत्र की सत्ता रिलायंस जियो समर्पित कर दी और विश्व के सर्वश्रेष्ठ उद्यमी जय अमित शाह ने इतना शानदार मुनाफ़ा कमाकर दिखाया, जितना पहले कभी कोई नहीं कर पाया। मोदी-युग ने तो नोटबन्दी के ज़रिये कालेधन को ऐसा निहाल किया कि कोई भी संघी उनका उपकार माने बग़ैर नहीं रह सकता। बैंकों के लूटरों नीरव-मेहुल-माल्या का चौकीदार की नज़रों के सामने फ़ुर्र हो जाना भी महानता की ही तो निशानी है। ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा कर पाते!

• अटल जी महान थे। क्योंकि वो भी मोदी की तरह संघ के हर कुकर्म के साथ रहे। अटल जी ने जैसे मंडल के ख़िलाफ़ मन्दिर की आग भड़काकर समाज को तोड़ा, वैसे ही गाय, बीफ़, लव-जिहाद और एनआरसी जैसे मामलों में मोदी राज की लिंचिंग-नीति कोई कसर नहीं छोड़ रही है। अटल जी ने जातीय जनगणना को रोककर ओबीसी का हक़ मारा, यूपी में मुलायम-मायावती से गठबन्धन तोड़कर वैसी ही महानता दिखायी, जिसकी राह पर चलते हुए महबूबा को चलता किया गया और चन्द्र बाबू अपना रास्ता देखने के लिए मज़बूर हुए। नीतीश को धमकाया गया कि ‘साथ आओ, वर्ना सारी उम्र जेल में सड़ा देंगे!’ उसी तर्ज़ पर पहले मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों और आदिवासियों की लिंचिंग हुई, वहीं अब मोदी राज में ओबीसी पर सीधा निशाना है। इसीलिए तो मोतीहारी के प्रोफेसर संजय कुमार का मौत से साक्षात्कार करवाया गया है! ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा हो पाता!

Prof Sanjay Kr Motihari  कहीं आपको भी अटल जी की महानता पर शक़ तो नहीं! Prof Sanjay Kr Motihari

प्रो संजय कुमार, मोतीहारी

• यदि अटल जी महान नहीं होते तो 1992 में झुंड वाले बहादुर हिन्दुओं की उपलब्धि पर शर्मिन्दगी क्यों ज़ाहिर करते! कारसेवकों की करतूत की निन्दा करके भी यदि कोई महान बना रह सकता है तो उसका नाम अटल बिहारी वाजपेयी ही हो सकता है। संघ हमेशा से झुंडबाज़ कायरों अधिपति रहा है। उसने 1984 को काँग्रेसियों को बदनाम करने के लिए बड़े पैमाने पर सिखों की क़त्लेआम करवाया तो 2002 में लम्पट झुंडबाज़ों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उतार दिया! ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा हो पाता!

• यदि अटल जी महान नहीं होते तो कारगिल युद्ध भारतीय सीमा में ही रहकर क्यों लड़ा जाता! लाहौर और इस्लामाबाद में तिरंगा क्यों नहीं लहराया होगा! नरेन्द्र मोदी की ही तरह अटल जी ने उस नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री क्यों बनवाया होता, जिसने अटल जी के जीते-जी बिहार को जंगलराज से निकालकर सुशासन और रामराज्य के ऐसे युग में स्थापित कर दिया, जहाँ दर्जन भर ज़िलों के बालिका या महिला आश्रय गृह देखते ही देखते व्याभिचार का अड्डा बन गये। बिहार का ऐसा विकास, 70 साल में तो छोड़िए, इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। ज़ाहिर है, यदि अटल जी महान ना होते तो क्या ऐसा हो पाता!

ऐसे चुनिन्दा तथ्यों के आधार पर अटल जी की महानता का गुणगान नहीं होगा, तो ये कैसे स्थापित होगा कि उनके दौर के लम्पट भक्तों को अब मोदी राज ने अव्वल दर्जे का गुंडा बना दिया है! अब तो मीडिया भी जनता को याद नहीं दिला सकता कि अटल जी की महान नीतियों की वजह से सरकारी कर्मचारियों की पेंशन पर डाका पड़ा, पक्की नौकरियों की जगह कान्ट्रैक्ट ने ले ली और संविधान समीक्षा आयोग बनाकर हिन्दू राष्ट्र बनाने का खेल हुआ। अटल जी महानता की वजह से 2004 वाले इंडिया-शाइनिंग से ज़्यादा चमक अभी मोदी-शाइनिंग में है। अब तो आपको सिर्फ़ इतना समझना है कि अटल जी तो मुखौटों से महान बने थे, जबकि मोदी तो बग़ैर मुखौटों के अटल जी से लाख गुना ज़्यादा महान हैं!