नरेन्द्र मोदी के कई पुराने अवतारों के बारे में हम सब पहले से जानते हैं। जैसे फेंकूँ, जुमलेबाज़, विकास के पापा, महामानव, ड्रामेबाज़, ब्रॉन्डिंग-मैन वग़ैरह-वग़ैरह। लेकिन अब मोदी का एक नया अवतार सामने आया है। इसे आप उनका चमत्कारी अवतार कह सकते हैं। मोदी का नया चमत्कार है, ‘बोले बग़ैर बता देना!’ सभी जानते हैं कि मोदी अपनी तारीफ़ों के पुल बाँधने के महारथी हैं। लेकिन अब उन्होंने अपनी नाकामियों को स्वीकार करने का अनोखा तरीक़ा ढूँढ़ निकाला है। इसी तरीक़े के तहत मोदी ‘बोले बग़ैर बता देने’ का चमत्कार कर रहे हैं!

इसी चमत्कार के रूप में नरेन्द्र मोदी ने अब स्वीकार कर लिया है कि न सिर्फ़ उनकी नोटबन्दी योजना पूरी तरह से नाकाम रही है। बल्कि इसकी लीपापोती के लिए शुरू की गयी ‘डिज़ीटल पेमेंट’ योजना की भी हवा निकल चुकी है। ‘डिज़ीटल पेमेंट’ योजना में चार चाँद लगाने के लिए भारतीय रेल ने दिसम्बर 2017 में रेलवे की वेबसाइट आईआरसीटीसी से ऑनलाइन टिकट ख़रीदने वालों को मुफ़्त में बीमा की सुविधा देने का ऐलान किया था। लेकिन अब रेल यात्रा से पहले जिस माई के लाल को अपनी सलामती की चिन्ता सताएगी उसे अपना बीमा ख़ुद करवाना होगा और टिकट ख़रीदते वक़्त ख़ुद ही प्रीमियम भरना होगा। रेलवे अब इस बोझ को नहीं उठाएगी।

नरेन्द्र मोदी से मशविरे के बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल ने तय कर दिया है कि 1 सितम्बर 2018 से रेलवे की वेबसाइट से टिकट लेने वालों को मुफ़्त बीमा देने की सुख-सुविधा बन्द कर दी जाएगी। रेलवे चाहती है कि यदि आपको बीमा चाहिए तो इसका फ़ैसला ख़ुद लीजिए और उसके लिए अपेक्षित प्रीमियम भी ख़ुद भरिये। रेलवे के भरोसे रहने की ज़रूरत नहीं है। इसका मतलब ये हुआ कि जिस डिज़ीटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए रेलवे ने मुफ़्त बीमा का प्रोत्साहन या लॉलीपॉप दिया था, उसकी आठ महीने बाद ही कोई ज़रूरत नहीं रही। इसका ये अर्थ भी है कि या तो डिज़ीटल पेमेंट योजना ने अपने अपेक्षित लक्ष्य को हासिल कर लिया है, या फिर वो बुरी तरह से नाकाम रही है।

कोई भी प्रोमोशन स्कीम किसी ख़ास मक़सद से ही शुरू की जाती है। यदि डिज़ीटल पेमेंट योजना कामयाब हुई होती तो सरकार को इसे जारी में गर्व क्यों नहीं होता! और यदि, योजना फ़ेल हो चुकी है तो उसे ख़त्म कर देने में ही समझदारी है। अब ये कैसे तय होगा कि योजना फ़ेल हुई या नहीं? यदि योजना से फ़ायदा हुई तो वो सफल रही और यदि फ़ायदा नहीं हुआ तो फेल हुई। इसे तय करना बहुत आसान है। याद है ना कि जब नोटबन्दी से कालाधन, जाली नोट और आतंकवाद पर नकेल कसने के दावे ध्वस्त हो गये तो नरेन्द्र मोदी ने सारी नाकामियों को छिपाने के लिए अपना नया ‘गोल पोस्ट’ बना लिया था।

नये ‘गोल पोस्ट’ को ‘डिज़ीटल इंडिया’ और ‘डिज़ीटल पेमेंट’ के रूप में पेश किया गया। डुगडुगी बजायी गयी कि नोटबन्दी के दौरान लाइनों में खड़े लोगों ने ‘डिज़ीटल पेमेंट’ को क़ामयाब बनाने के लिए तपस्या की है। हालाँकि, इंटरनेट बैंकिंग, एटीएम और कार्ड से पेमेंट्स की सुविधा वर्षों से मौजूद थी, लेकिन नरेन्द्र मोदी हर जगह यही ढोल पीटते नज़र आये कि ‘सारे काम मैंने ही किये हैं’ और ‘70 वर्षों में देश में कुछ नहीं हुआ’। इसी रणनीति के तहत ‘भीम एप’ को धमाके की तरह पेश किया गया। लेकिन जल्दी ही जनता ने जान लिया कि ऐसी नौटंकियों से उन करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी बहाल नहीं हो सकती, जिन्हें नोटबन्दी तबाह कर चुकी थी।

डिज़ीटल पेमेंट आन्दोलन की रही-सही हवा रिज़र्व बैंक के उन आँकड़ों ने निकाल दी, जिसमें बताया गया कि नोटबन्दी के वक़्त जहाँ अर्थव्यवस्था में कुल 17.5 लाख करोड़ रुपये की करेंसी थी, वो अब बढ़कर 20 लाख करोड़ रुपये हो चुकी है। साफ़ है कि यदि वास्तव में कोई डिज़ीटल पेमेंट क्रान्ति हुई होती तो ये आँकड़ा बढ़ता नहीं बल्कि घटता! उधर, तीन महीने तक वित्त मंत्री का काम देखने वाले रेल मंत्री पीयूष गोयल को किसी सिद्धपुरुष ने सपने में आकर बताया कि रेल यात्रियों की मुफ़्त बीमा योजना की वजह से ट्रेनें, देरी से चलने का रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाती जा रही हैं। 70 सालों में पहले कभी ऐसा नहीं देखा गया। क्योंकि पहले कभी मुफ़्त बीमा का खेल भी नहीं खेला गया था।

आनन-फ़ानन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सारा कहानी सुनाई गयी। किस्सा सुनते ही ‘कड़े फ़ैसले लेने वाले’, ‘निडर होकर फ़ैसले लेने वाले’ तथा ‘तेज़ी से फ़ैसले लेने के लिए सारी दुनिया में मशहूर’ नरेन्द्र मोदी हरक़त में आ गये। उन्होंने तय किया है कि रेलयात्रियों की हरामख़ोरी फ़ौरन बन्द होनी चाहिए। इस पर जेटली-गोयल ने मोदी को याद दिलाया कि इस हरामख़ोरी को ख़ुद उन्होंने ही डिज़ीटल क्रान्ति लाने के नाम पर चालू करवाया था। इतना सुनना था कि मोदी थोड़ा सा झेंपे, लेकिन फिर 56 इंची बहादुरी दिखाते हुए तय किया कि 1 सितम्बर से उन्हीं यात्रियों को बीमा कराने की सुख-सुविधा दी जाए, जो इसका दाम चुकाएँगे।

मोदी का कहना था कि जिस देश में लोग रसोई गैस की सब्सिडी त्याग सकते हैं, जहाँ पेट्रोल-डीज़ल के दामों के आसमान छूने के बावजूद उन्हें बाज़ार की ताक़तों के हवाले रखा जाता हो, जहाँ पेट्रोलियम पर उसके दाम से ज़्यादा टैक्स हो, वहाँ रेलवे में मुफ़्त-बीमा की सुविधा का कोई तुक़ नहीं हो सकता। बीते 8 महीने से रेल यात्रियों को हासिल ऐसा ‘ट्रैवल इंश्योरेंस’ तो ग़रीब और देशविरोधी है। इसीलिए जाने रेलयात्री, जाने बीमा कम्पनी, रेलवे को इसमें नहीं फँसना है।

दूसरी ओर, बीमा कम्पनी ने मोदी-जेटली को सेट कर लिया। इन्हें बताया गया कि रेल हादसों में मौत होने या अपंग-अपाहिज होने वाले ग़रीबों या उनके परिजनों को बीमा की रकम मालामाल कर देती है। इतनी भारी रकम से तो उनकी ज़िन्दगी निहाल हो जाती है। लोग ट्रेन में बैठते ही उसके हादसे का शिकार होने और उसमें ख़ुद की मौत के लिए दुआ माँगने लगते थे। ये रेलवे के लिए बद-शगुनी जैसा हो रहा था। लिहाज़ा, मुफ़्त बीमा को ख़त्म कर देना चाहिए। अभी स्वैच्छिक रेल बीमा योजना के प्रीमियम की नयी दरें तय नहीं हुई हैं। लेकिन इतना तय हो चुका है कि सम्पन्न लोग मौत की एवज में 10 लाख रुपये, अंग-भंग की दशा में 7 लाख और घायल होने की दशा में 2 लाख रुपये पाने का बीमा करवा सकते हैं।

इस तरह, एक तीर से कई निशाने लग गये। रेल बीमा के नाम पर 8 महीने से जारी मुफ़्तख़ोरी ख़त्म! अब ग़रीबों को मुआवज़ा पहले की तरह रेलवे से मिलेगा, वो भी यदि मिल सका तो! सम्पन्न लोग बीमा करवाएँगे और रेलवे का बोझ ख़त्म करेंगे! प्रधानमंत्री देश को बग़ैर बोले ही बता देंगे कि डिज़ीटल इंडिया को यदि जनता आगे बढ़ाना चाहती है तो अपने बूते आगे बढ़े, उनके भरोसे नहीं रहे। मोदी का ये अघोषित तेवर किसी चमत्कार से कम नहीं है! 70 साल में पहली बार चमत्कारी बाबा ने अपनी नाकामी को बग़ैर बोले ही स्वीकार कर लिया! ये अद्भुत है!