कहावत है, ‘गाँव बसा नहीं कि मँगते चले आये!’ इसका मतलब है कि कोई बस्ती अभी ठीक से बसी भी नहीं थी कि भिखारियों का ताँता लगने लगा। बिल्कुल यही हाल मोदी सरकार का है। इसकी कोई योजना शुरू नहीं होती कि दावे होने लगते हैं कि करोड़ों की ज़िन्दगी बदल गयी, चुटकियों में चमत्कार हो गया! मोदी राज ने हुक़ूमत को एक तमाशा बना दिया है। इस खेल-तमाशे का नाम है ‘फेंकते रहो!’ इसके सबसे धुरन्धर खिलाड़ी या सबसे बड़े मदारी तो ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं। तभी तो जनाब ने लाल क़िले से चुटकी बजाकर देश को ज्ञान दे दिया कि 25 सितम्बर को लॉन्च होने वाले प्रधानमंत्री जनआरोग्य अभियान का परिणाम ये होने वाला है कि “ग़रीब व्यक्ति को अब बीमारी के संकट से जूझना नहीं पड़ेगा।”

ज़ाहिर है, अब यदि कोई ग़रीब बीमारी से जूझता पाया गया तो इसके लिए शासन-प्रशासन, बीजेपी की सरकारों और ख़ासकर प्रधानमंत्री की कोई जबाबदेही नहीं होगी! इसके लिए अगर कोई कसूरवार है तो वो तेल-पानी की तरह मिलने को बेताब विपक्ष दल हैं! इसे कहते हैं, ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी, टइयाँ मेरे बाप की!’ लाल क़िले के चन्द रोज़ बाद, इसी नुस्ख़े का ज्ञान बाँटने मोदी पहुँच गये जूनागढ़। वहाँ उन्होंने ये कहकर गुजरातियों के दिमाग़ की बत्ती जला दी कि “यदि 70 साल पहले स्वच्छ भारत शुरू किया जाता तो भारत रोग मुक्त हो गया होता!” ऐसी सूझ-बूझ तो महात्मा गाँधी और सरदार पटेल जैसे गुजरात के महान सपूतों में भी कभी नहीं दिखी!

मोदी ‘रोग मुक्त भारत’ पर ही नहीं थमे, क्योंकि उन पर तूफ़ानी रफ़्तार से बस ‘फेंकते रहो’ का भूत सवार है! तभी तो उन्होंने लाल क़िले से कहा था कि ‘सौ साल भी कम पड़ जाते, अगर 2013 की रफ़्तार से चले होते तो!’ लिहाज़ा, मोदी ने जूनागढ़ में हुँकार भर दी कि ‘वो हर ज़िले में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने वाले हैं!’ कब? ये जानना मना है! मोदी सरकार का कोई मंत्री, संघ-बीजेपी का कोई नेता ऐसा नहीं, जो अपने-अपने दायरे में ‘फेंकते रहो’ का खेल ना खेल रहा हो! तभी तो कोई कहता है कि केरल में बाढ़ के लिए बीफ़ का सेवन ज़िम्मेदार है तो कोई बताता है कि सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं को जाने का अधिकार मिलने की वजह से केरल डूबने लगा।

इसी सिलसिले में नये सितारे जड़ते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भुवनेश्वर में एक ज़ोरदार शिग़ूफ़ा फेंक डाला कि ‘क्षेत्रीय असन्तुलन घटाने के लिए प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत देश में 22 नये एम्स खोले जा रहे हैं!’ उन्होंने ये भी माना कि ‘साढ़े चार साल से जारी विकास की ज़बरदस्त रफ़्तार के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में’ कुशल मानव संसाधन की भारी कमी है। लेकिन उन्होंने 70 साल में पहली बार मेडिकल शिक्षा में पीजी की 8,500 और स्नातक की 16,000 से अधिक सीटें बढ़कर चमत्कार कर दिया है। इसके अलावा, 70 मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशियालिटी सेवाएँ भी शुरू हो चुकी है। चालू बजट में 24 नये मेडिकल कॉलेजों, 20 राज्य कैंसर संस्थानों और 50 कैंसर देखभाल केन्द्र स्थापित होने हैं।

समारोह में नड्डा ने तो 50 करोड़ वंचित तबके के लिए ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जनआरोग्य अभियान’ को शुरू भी करवा दिया। जबकि मोदी को दीनदयाल जयन्ती का इन्तज़ार है। लेकिन इसी सरकारी समारोह में मौजूद नड्डा के अलावा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, राज्यपाल गणेशी लाल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और ओडिशा के स्वास्थ्य मंत्री प्रताप जेना में से किसी ने नहीं बताया कि राउरकेला के उस जनरल हॉस्पीटल का क्या स्टेटस है, जिसे मेडिकल बनाने का ऐलान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 अप्रैल 2015 को किया था? इसी ऐलान को लेकर मुक्तिकान्त बिस्वाल नामक शख़्स 27 जून 2018 को 71 दिनों में 1350 किलोमीटर की पदयात्रा करके दिल्ली पहुँचा था। बेचारे मुक्तिकान्त को लोकतंत्र पर कितना भरोसा था कि वो सत्ता के अहंकार में मदहोश नरेन्द्र मोदी की हुक़ूमत को झकझोरने या शर्मसार करने निकला था!

मोदी राज की ‘फेंकते रहो’ नीति के सिलसिले में ही अब ज़रा एक बेहद मज़ेदार किस्सा भी जान लीजिए। मई में अपनी चौथी सालगिरह से पहले मोदी कैबिनेट ने देश में 20 नये एम्स यानी आखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान बनाने का ऐलान किया। इससे पहले चार सालों में 13 एम्स बनाने की घोषणा हो चुकी थी। इसकी प्रगति के बारे में सूचना के अधिकार के तहत जून 2018 में मोदी सरकार ने बताया कि ‘13 में से एक भी एम्स शुरू नहीं हो पाया है!’ उससे पहले 4 मार्च 2018 को, बीजेपी ने मोदी राज का महिमामंडन करते हुए ट्वीट किया कि “परिवार राज से स्वराज: 2014 तक 7 एम्स स्थापित किये गये, लेकिन मोदी सरकार के 48 महीने में 13 एम्स जैसे संस्थाओं को मंज़ूरी दी है।”

अब ज़रा जून 2018 तक हुई 13 एम्स की प्रगति का जायज़ा लीजिए। (1) गोरखपुर एम्स: जगह तय, 1,011 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, मार्च 2020 का लक्ष्य और 10% से कम फंड जारी। (2) नागपुर एम्स: जगह तय, 1,577 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, अक्टूबर 2020 का लक्ष्य, 15% फंड जारी। (3) कामरूप एम्स: जगह तय नहीं, 1,123 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, अप्रैल 2021 का लक्ष्य, सिर्फ़ 5 करोड़ रुपये जारी। (4) देवघर एम्स: जगह तय नहीं, 1103 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, 2021 का लक्ष्य, सिर्फ़ 9 करोड़ रुपये। (5) गुजरात एम्स: अभी तक शहर का नाम ही तय नहीं, कोई फंड जारी नहीं, कोई डेडलाइन तय नहीं। (6) बिहार एम्स: 2015 के चुनावी साल में बजट में ऐलान, तीन साल बाद भी स्थान तय नहीं, कोई डेडलाइन तय नहीं, कोई फंड जारी नहीं।

(7) गुंटूर एम्स: जगह तय, 1,618 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, अक्टूबर 2020 का लक्ष्य, 15% फंड जारी। (8) कल्याणी एम्स: जगह तय, 1,754 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, अक्टूबर 2020 का लक्ष्य, 16% फंड जारी। (9) बठिंडा एम्स: जगह तय, 925 करोड़ रुपये की लागत, जून 2020 का लक्ष्य, 4% फंड जारी। (10) जम्मू एम्स: सम्बा ज़िले के विजयपुर में प्रस्तावित, कोई बजट और कोई डेडलाइन तय नहीं। (11) कश्मीर एम्स: पुलवामा ज़िले के अवन्तिपुरा में प्रस्तावित, कोई बजट और कोई डेडलाइन तय नहीं। लेकिन जम्मू-कश्मीर के दोनों एम्स के नाम पर 91 करोड़ रुपये का फंड जारी हुआ। (12) बिलासपुर एम्स: जगह तय, 1,350 करोड़ रुपये की लागत मंज़ूर, दिसम्बर 2021 का लक्ष्य, नरेन्द्र मोदी ने 3 अक्टूबर 2017 को शिलान्यास किया, लेकिन कोई फंड जारी नहीं! (13) तमिलनाडु एम्स: अभी तक शहर का नाम ही तय नहीं, कोई फंड जारी नहीं, कोई डेडलाइन तय नहीं।

यही है ‘तेज़ी से, कड़े फ़ैसले लेने वाली सरकार’ की सिर्फ़ एक नीति का रिपोर्ट कार्ड! यक़ीन जानिए, ‘फेंकते रहो धर्म’ के ऐसे ही खेवनहार मोदी सरकार का हरेक मंत्री है। ये नज़ारा आपको फेंकने की इन्तेहा भले ही लगे, लेकिन मोदी राज का आलम ही यही कि ‘आव देखो ना ताव, बस फेंकते रहो!’ इस खेल में गेंद को वाइड बॉल या नो बॉल करार देने वाला कोई अम्पायर नहीं है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अम्पायर वाली होनी चाहिए। लेकिन मोदी राज में ‘फेंकते रहो धर्म’ के आगे हमारा मीडिया तो चारण-भाट बन चुका है। अपने आकाओं के इशारे पर वो भी आपको बताता रहेगा कि ‘स्वच्छ भारत’ से देश रोग मुक्त हो चुका है!

अब यदि आप ‘फेंकते रहो धर्म’ को बेनक़ाब करेंगे, इसके दावों पर सवाल उठाएँगे तो आपको राष्ट्रद्रोही, वामी, खाँग्रेसी, गाँधी परिवार के चमचे, अफ़ज़ल प्रेमी गैंग, तुष्टिकरण की राजनीति करने वाला, छद्म धर्मनिरपेक्ष और पिडी वग़ैरह के ख़िताब से नवाज़ा जाएगा। बहरहाल, तसल्ली की बात सिर्फ़ इतनी है कि देश की जनता अब साढ़े चार साल से जारी ‘फेंकते रहो’ वाली नौटंकी की हक़ीक़त को समझने लगी है। इसीलिए अब चुनावी हवा पूरी तेज़ी से मोदी राज और बीजेपी के तमाशों के ख़िलाफ़ बहने लगी है, क्योंकि ‘ये पब्लिक है, ये सब जानती है!’