21 महीने तक अधरझूल में रखने के बाद आख़िरकार, रिज़र्व बैंक ने बता ही दिया कि नोटबन्दी पूरी तरह विफल रही! अवैध ठहराये गये सिर्फ़ 10 हज़ार करोड़ रुपये ही बैंकों में वापस नहीं लौटे! बन्द हुए कुल रुपये का ये महज 0.7 फ़ीसदी रहा! इससे साबित हो चुका है कि नोटबन्दी दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है! इसके ज़रिये देश-भक्ति के नाम पर एक ही झटके में सवा सौ करोड़ भारतवासियों को उल्लू बनाया गया! जनता के भरोसे से ऐसा खिलवाड़ इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था! सबसे ज़्यादा मज़ेदार तो ये रहा कि 56 इंची सीना वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी तक किसी चौराहे पर जनता-जनार्दन से सज़ा सुनने के लिए नहीं पहुँचे! नोटबन्दी के बाद तो वो बस ही एक बार सड़क पर दिखे, वो भी अटलजी की शवयात्रा में!

नरेन्द्र मोदी के नोटबन्दी घोटाले की वजह से देश को अब तक क़रीब 10 लाख करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। ये रकम नये नोट छापने, उन्हें हर जगह पहुँचाने, एटीएम को नये नोटों के अनुकूल बनाने, बैंककर्मियों की अथक मेहनत और लाइनों में खड़े करोड़ों लोगों के अरबों मानव-दिवसों की बर्बादी से जुड़ा है। अर्थव्यवस्था के औधें मुँह गिरने, करोड़ों लोगों के बेरोज़गार होने और काम-धन्धों चौपट होने से हुआ आर्थिक नुकसान भी इसमें शामिल है। लेकिन नोटबन्दी की लाइनों में ‘शहीद’ हुए 140 लोगों के नुकसान का हिसाब इसमें शामिल नहीं है। मौत से हुए नुकासान का कोई हिसाब नहीं होता! ये तो जिन पर गुज़रती है, वही जानते हैं!

नोटबन्दी की समीक्षा के लिए वित्त मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने सैकड़ों घंटे की माथापच्ची करके जो रिपोर्ट तैयार की, अभी चन्द रोज़ पहले मोदी सरकार ने उसकी भ्रूण-हत्या करवा दी है। इसे संसद का गला घोटने की तरह भी देखा जा सकता है। मोदी राज का ऐसा रवैया हर तरह से ऐतिहासिक है। ये भी वैसी ही करतूत है, जैसे राज्यसभा को अपमानित करने के लिए मोदी सरकार ने कई ऐसे विधेयकों को ज़बरन ‘मनी बिल’ का दर्जा दिलवा दिया, जिन्हें सामान्य विधेयक की तरह संसद के दोनों सदनों को पारित करना चाहिए था। संविधान ने ‘मनी बिल’ के लिए सिर्फ़ लोकसभा की मंज़ूरी का प्रावधान रखा है। लोकसभा में सरकार के पास बहुमत का अहंकार है। लिहाज़ा, नरेन्द्र मोदी के इशारे पर लोकतंत्र के सर्वोच्च मन्दिर में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाला नंगा नाच हुआ।

अब रिज़र्व बैंक की सालाना रिपोर्ट कहती है कि कुल 15.41 लाख करोड़ रुपये की नोटबन्दी हुई। इसमें से 15.31 लाख करोड़ रुपये यानी 99.3 फ़ीसदी रकम बैंकों में वापस आ गयी। सिर्फ़ 10,720 करोड़ रुपये ही अर्थव्यवस्था से बाहर हुए। तो क्या नरेन्द्र मोदी कभी बताएँगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था में बस इतना ही कालाधन था? अरे, ऐसी ‘मामूली सी’ रकम तो नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे मोदी के चहेते लेकर सरक लेते हैं और चौकीदारों के चौकीदार तथा वित्त मंत्री अरूण जेटली को हवा तक नहीं लगी!

अब इस सच्चाई को भी कोई नकार नहीं सकता कि नोटबन्दी के ज़रिये नरेन्द्र मोदी ने अपने धन्ना सेठ दोस्तों और संघियों के पास मौजूद अरबों-खरबों रुपये के सारे कालेधन को सफ़ेद करवा दिया। वो भी राष्ट्रभक्ति दिखाने और भ्रष्टाचार को मिटाने के नाम पर! कालेधन पर सख़्त कार्रवाई या ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के नाम पर! ‘लुटेरी काँग्रेस’, ‘बेईमान मायावती’ और ‘गुंडा अखिलेश’ को निपटाने के नाम पर! ‘अच्छे दिन’ की बरसात और बहार के नाम पर!

उधर, बेशर्म बीजेपी अब भी यही गाना गा रही है कि ‘नोटबन्दी का मतलब सही ढंग से नहीं समझा गया।’ देश-भक्तों ने अपना कालाधन सफ़ेद करवा लिया, अर्थव्यवस्था को तहत-नहस कर दिया, आम जनता को तबाही ही तबाही दी, अरबों रुपये विज्ञापनों, ब्रॉन्डिंग और विदेशी सैर-सपाटों पर बहा दिये गये और अब भी अफ़वाह फैलाया जा रहा है कि ‘न खाऊँगा और ना खाने दूँगा’ का ढोल पीटने वाले, दुनिया के सबसे महँगे चौकीदार ने नोटबन्दी वाले सर्ज़िकल स्ट्राइक से कई लक्ष्य हासिल किये!

बीजेपी कह रही है कि नोटबन्दी को एक आर्थिक सुधार की तरह देखना चाहिए, क्योंकि इससे आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ। लेकिन धूर्त ये नहीं बताते कि इससे आयकर से होने वाली सरकार की आमदनी कितना बढ़ी? चींटी मारने के लिए तोप के गिरने गोले दाग़े गये? भक्तों का राग-मोदी ये भी है कि ‘कभी ऐसा नहीं कहा गया कि पुराने नोट बैंकों में नहीं आएँगे। नोट तो आये हैं लेकिन लोगों को बताना पड़ेगा कि कहाँ से आये? सारा हिसाब चल रहा है, कार्रवाई हो रही है।’ ऐसी लीपापोती को ही कहा जाता है कि ‘चोर चोरी से जाए, हेराफ़ेरी से ना जाए!’

अब धूर्त भक्तों को कौन बताये कि सरकार के सबसे बड़े वकील मुकुल रोहतगी ने 10 दिसम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि ‘मोदी सरकार को उम्मीद थी कि 10-11 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोटों की वापस हो जाएगी। लेकिन अब तक 12 लाख करोड़ रुपये वापस आ चुके हैं। क़रीब एक लाख करोड़ रुपये और लौटने की सम्भावना है।’ साफ़ मतलब है कि हमारे महा-अनाड़ी और सनकी प्रधानमंत्री को उम्मीद थी कि नोटबन्दी की वजह से क़रीब 4 लाख करोड़ रुपये बैंकों में वापस नहीं लौटेंगे! लेकिन मिला क्या? कहाँ 4 लाख करोड़ रुपये का दावा और कहाँ 10,720 करोड़ रुपये वाली हक़ीक़त!

नोटबन्दी के पूरी तरह से और हरेक मोर्चे पर फ़ेल साबित होने की जबाबदेही किसकी है? क्या उनकी जिन्होंने ‘मेरे प्यारे भारतवासियों’ से माँगे तो थे 50 दिन, लेकिन बैंकों में जाकर नोट बदलने का काम 24 नवम्बर 2016 को ही रोक दिया? इतना ही नहीं, पहले कहा गया था कि नोटबन्दी के लिए 31 दिसम्बर 2016 तक वक़्त मिलेगा, लेकिन सारा तमाशा 15 दिसम्बर को ही रोक दिया। इसीलिए कल्पना कीजिए कि यदि वो 15 दिन और मिले होते तो शायद ये 10 हज़ार करोड़ रुपये भी घूमते-फिरते रिज़र्व बैंक के पास पहुँच ही गये होते!

बहरहाल, आख़िर में इतना जान लीजिए कि यदि नरेन्द्र मोदी ज़रा सा भी चरित्रवान होते तो नोटबन्दी पर आयी रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट के बाद एक पल भी सत्ता में नहीं रहते! वैसे तो मोदी को नोटबन्दी के विफल रहने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए साल भर पहले यानी अगस्त 2017 में ही इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था, क्योंकि तभी ये पता चल चुका था कि 99 फ़ीसदी नोट वापस बैंकों में पहुँच चुके हैं! लेकिन सत्ता के लालची नरेन्द्र मोदी के पास ऐसा ‘नैतिक बल’ तो कभी रहा ही नहीं कि वो अपनी ग़लतियों के लिए ख़ुद को जबाबदेह मान सकें! उनके इसी गुण की वजह से 2002 के गुजरात दंगों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अटल-आडवाणी ने मोदी को नष्ट नहीं किया, क्योंकि मोदी ने ‘संघी कट्टरवाद’ में चार चाँद जो लगाये थे!

बिल्कुल मोदी की तरह ही, 2017 में वित्त मंत्री अरूण जेटली भी भक्तों को ये झाँसा देने में मशगूल थे कि जमा हुए नोटों की जाँच हो रही है, जबकि वो हक़ीक़त से पूरी तरह से वाक़िफ़ थे! शायद, ईश्वर ने उन्हें सवा सौ करोड़ भारतवासियों को गुमराह करने के लिए ही ऐसी सज़ा कि उनकी दोनों किडनियों ने धोखा दे दिया। किडनी का काम है सफ़ाई करना। गन्दगी और विकारों को छानकर अलग करना। लेकिन जब शरीर में विकारों पर अम्बार लग जाएगा तो उसके पुर्जे धोखा देगें ही! ‘कर्मन की गति न्यारी साधो!’ बेचारे वही जेटली, अब राफेल सौदे को लेकर भी पूरी ताक़त से झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। निश्चित रूप से इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर के अन्य अंगों पर पड़ रहा होगा। ख़ैर, इसका नतीज़ा तो जब सामने आएगा, तब आएगा। अब तक भारत की जनता ने साढ़े चार साल से जारी मोदी राज की तमाम तमाशेबाज़ी को अच्छी तरह से जाँच-परख लिया है। छह महीने बाद जनता-जनार्दन इन्हें निश्चित रूप से ‘गेट-आउट’ करके दिखाएगी!