सवा सौ करोड़ भारतवासी आज पेट्रोलियम पदार्थों के दाम को लेकर त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहे हैं! जनता हाहाकार कर रही है और अहंकारी मोदी सरकार की कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही! जनता का जीना मुहाल है। लेकिन सरकार अपना ख़ज़ाना भरने में मस्त है! प्रधानमंत्री को अपने सैर-सपाटों, समारोहों और विज्ञापनों के लिए भारी-भरकम रकम चाहिए। उनके लिए पेट्रोलियम पदार्थों का दर्ज़ा कामधेनु से कम नहीं। इससे होने वाली कमाई उनके लिए सरकारी अय्याशी का ज़रिया बन गयी है। तभी तो पेट्रोलियम पदार्थों पर लागू उत्पाद शुल्क या एक्साइज़ ड्यूटी की गगनचुम्बी दरों की बदौलत केन्द्र सरकार की कमाई बीते चार साल में दोगुनी हो गयी!

इस टैक्स की बदौलत 2014-15 में जहाँ केन्द्र सरकार ने जनता की जेब से 99,184 करोड़ रुपये निकाले थे, वहीं 2017-18 में जनता को 2,29,091 करोड़ रुपये की चपत लगायी गयी! 1,29,907 करोड़ रुपये की ये अतिरिक्त कमाई 131 फ़ीसदी की है! ज़रा सोचिए कि क्या चार साल में आपकी आमदनी भी इसी अनुपात में बढ़ी है? यदि नहीं, तो सरकार आपके गले पर छुरी रखकर आपकी जेब से पैसा निकाल रही है। जबकि संघ परिवार भक्तों को अफ़ीम चटाकर उनसे मोदी-मोदी-मोदी के नारे लगवा रहा है। एक ‘बग़ैर पढ़े-लिखे कामदार’ पर भरोसा करने की इतनी भारी कीमत तो जनता को सिर्फ़ एक चीज़ यानी पेट्रोलियम पदार्थों पर चुकानी पड़ी है! सरकारी आमदनी बढ़ाने के लिए बहुत तरह के टैक्स हैं, फिर सारा क़हर पेट्रोलियम पर ही क्यों बरपा होना चाहिए?

साफ़ है कि जिस जनता ने नरेन्द्र मोदी को 30 साल बाद पूर्ण बहुमत वाली सत्ता दी, उसी जनता की नाक में दम मोदी ने बिल्कुल वैसे ही किया जैसे पौराणिक कथाओं में सैकड़ों बार देवताओं से शक्तियाँ प्राप्त करके असुरों, राक्षसों और दानवों ने उनका ही जीना मुहाल कर दिया था! इस लिहाज़ से मोदी में आप उन सभी विशेषताओं को देख सकते हैं, जो असुरों, राक्षसों और दानवों में होती हैं। अर्थात् उन्हें ही सताओ जिन्होंने तुम्हें शक्ति दी! बीते चार सालों में मोदी सरकार जैसा ही रवैया राज्य सरकारों का भी रहा। उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ धोने से कोई गुरेज नहीं किया। पेट्रोलियम पदार्थों पर लागू वैट से राज्य सरकारों ने 2014-15 में जहाँ 1,37,157 करोड़ रुपये वसूले वहीं 2017-18 में यही कमाई 1,84,091 करोड़ रुपये हो गयी।

सभी धर्मों की आध्यात्मिक कथाएँ हमें बताती हैं कि असुरों, राक्षसों और दानवों ने हमेशा पहले तो देवताओं से शक्ति प्राप्त की और बाद में उसी शक्ति से देवताओं को ही सताया। बिल्कुल यही हाल नरेन्द्र मोदी का है। उन्होंने लोकतंत्र के देवताओं यानी जनता -जनार्दन से सरकार चलाने के लिए जो शक्तियाँ प्राप्त कीं, उसके लिए दलीलें दीं कि वो प्रधान सेवक बनकर सेवा करेंगे, अच्छे दिन लाएँगे, चोरों-बेईमानों से सुरक्षित रखने के लिए चौकीदारी या पहरेदारी करेंगे। लेकिन किया क्या? जमकर जुमलेबाज़ी की, भरपूर झूठ बोले, जनता पर टैक्स का बोझ लादकर उसका जीना मुहाल किया, नोटबन्दी और घटिया जीएसटी को ज़बरन थोपकर उसी जनता-जनार्दन के उन्हीं लोगों के लिए रोज़ी-रोटी का संकट पैदा कर दिया जिससे उन्हें सारी ताक़तें मिली थीं।

मोदी के यार-दोस्त, कभी सरकारी बैंकों को सीधे-सीधे तो कभी राफेल विमान जैसे सौदों के ज़रिये जनता-जनार्दन को ही लूटते रहे और नसीबवाले महाशय, ग़रीबों से वसूले गये टैक्स की बदौलत हवा में उड़ते हुए चौकीदारी का खेल खेलते रहे। इनके इशारों पर ही संसद, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सीएजी जैसी लोकतंत्रिक संस्थाएँ बिल्कुल वैसे ही ध्वस्त होती रहीं, जैसे असुरों, राक्षसों और दानवों की ओर से देवताओं के मन्दिरों या यज्ञ-अनुष्ठानों में विघ्न डाला जाता था! इसी वजह से मोदी राज में बीते साढ़े चार साल से चतुर्दिक पतन का एक न एक सोपान आप रोज़ाना देख रहे हैं।

आप बहस कर सकते हैं कि आये दिन होने वाले दुष्कर्मों, हत्या, लिंचिंग जैसी दिल-दहलाने वाली वारदातों के लिए सीधे-सीधे मोदी को क़सूरवार कैसे ठहराया जा सकता है! मुमकिन है कि बैंकों के लुटेरों के फ़ुर्र होने और राफ़ेल घोटाले के लिए आप नरेन्द्र मोदी को सन्देह का लाभ देने पर ही आमादा रहें, क्योंकि उन्होंने देश की ख़ातिर अपना घर-परिवार त्याग देने का ढोंग किया था और वो 18-18 घंटे काम करने की डुगडुगी पीटते रहते हैं! लेकिन मनमोहन सरकार के मुक़ाबले हर चीज़ पर ज़्यादा टैक्स वसूलने, जनता-जनार्दन की ज़िन्दगी में दुश्वारियाँ बढ़ाने के लिए आपको हर तरह से नरेन्द्र मोदी को ही ज़िम्मेदार मानना पड़ेगा! नोटबन्दी घोटाले का ठीकरा आप चाहकर भी किसी और के सिर नहीं फोड़ सकते! इसी तरह पेट्रोल, डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस की आसमान छूती क़ीमतों के लिए भी आप सिर्फ़ रुपये में गिरावट और कच्चे तेल के दाम में उछाल को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते!

अब ज़रा नरेन्द्र मोदी में मौजूद आसुरी, राक्षसी और दानवी वृत्तियों के पीछे खड़ी धार्मिकता को भी समझते चलिए। बीजेपी हो या जनसंघ या अटल-आडवाणी, ये सभी उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखौटा हैं, जो मोदी को हिन्दू हृदय सम्राट बनाकर पेश करता है और जिसका लक्ष्य हिन्दुत्व के ज़रिये हिन्दू-राष्ट्र की स्थापना है। अब सवाल ये कि हिन्दू क्या है? हिन्दू धर्म का सही नाम सनातन धर्म है। हिन्दू नाम तो बाक़ी दुनिया ने उन लोगों को दिया जो सिन्धु नदी के पूरब वाले इलाकों के बाशिन्दे थे। कालान्तर में मुसलिम आक्रमणकारियों ने इन लोगों के धर्म को भी हिन्दू ही कहा। उनके लिए बौद्ध और जैन भी हिन्दू ही थे, क्योंकि ये भी मूर्ति पूजक थे और अपने उपासना स्थल को मन्दिर ही कहते थे।

सनातन धर्म जिस ब्राह्मणवादी व्यवस्था से प्रेरित है, उसके शीर्ष धार्मिक ग्रन्थों में वेद, वेदांग, पुराण और उपनिषद प्रमुख हैं। रामायण, महाभारत और गीता भी हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं। ज़्यादातर हिन्दुओं की इसकी कथाओं के बारे में पता है। लेकिन इन्हें वेद, पुराण और उपनिषद से अलग माना गया है। हनुमान चालीसा और तरह-तरह की आरतियाँ तथा भजन-कीर्तिन वग़ैरह तो बहुत आधुनिक दौर की कृतियाँ हैं। हनुमान चालीसा और राम चरित मानस के लेखक तुलसीदास (1511-1623 ईसवी), अकबर के समकालीन थे। तुलसीदास से पहले सैंकड़ों बार रामकथा या रामायण लिखी जा चुकी थी।

रामायण-महाभारत की तरह सनातनियों के सभी धार्मिक ग्रन्थों में तरह-तरह के देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं। ज़्यादातर कहानियाँ अतार्किक, काल्पनिक, अवैज्ञानिक और चमत्कारों का महिमामंडन करने वाली हैं। दरअसल, इनके कथाकारों के लिए ये बहुत ज़रूरी था कि वो देवताओं की कथाओं या लीलाओं को चमत्कारों से परिपूर्ण बनाएँ। सनातन ही नहीं बल्कि हरेक धार्मिक दर्शन में आस्था को ताक़तवर बनाने के लिए उसमें चमत्कारों को भरा जाना बेहद ज़रूरी रहा है।

ईश्वर को मनुष्य के मुक़ाबले बेहद व्यापक, शक्तिशाली और चमत्कारी बताये बग़ैर श्रेष्ठतम नहीं ठहराया जा सकता। चमत्कारों को स्थापित करने के लिए देवताओं के मुक़ाबले में असुर, राक्षस, दानव जैसे पात्र गढ़े गये। हरेक असुर या राक्षस या दानव की कथा में एक बात अवश्य होती है कि उसने देवताओं की पूजा, उपासना और तपस्या करके उनसे वरदान स्वरूप चमत्कारी शक्तियाँ हासिल कीं और फिर इन्हीं शक्तियों के अहंकार में डूबकर चमत्कारी ताक़तों का बेज़ा या अनैतिक या अमानवीय इस्तेमाल किया। ऐसे इस्तेमाल की जब अति हो गयी तो अधर्म का बोलबाला हो गया। अब चूँकि देवता की दी हुई ताक़त की वजह से ही अधर्म फैला था, लिहाज़ा देवता ही उसे दुरस्त करके ‘धर्म की स्थापना’ के लिए अवतार पर अवतार लेते थे।

मज़े की बात ये है कि अधर्म का बोलबाला, धर्म की स्थापना, वरदान, चमत्कार, अवतार और पुनर्जन्म वग़ैरह सिर्फ़ प्राचीन काल और ख़ासकर वैदिक काल में ही होते थे! ज्ञात इतिहास वाले हज़ारों साल से जारी लम्बे दौर में चमत्कारों का होना बन्द हो गया! हालाँकि पाप, अधर्म और अत्याचार वग़ैरह का होना तथा बढ़ना अनवरत जारी है। लेकिन देवता, भगवान, अल्लाह, या गॉड वग़ैरह का दिल है कि वो किसी भी पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, रोजा-नमाज़, चर्च-प्रार्थना वग़ैरह से पसीजने का नाम ही नहीं लेता! पापियों का नाश करने के लिए शायद अब भगवानों के पास अवतार लेने की फ़ुर्सत नहीं है।

बहरहाल, सभी धर्मों में यही धारणा या आस्था है कि सब कुछ ‘ऊपर वाले’ की मर्ज़ी से होता था, होता है और होता रहेगा! इसीलिए ख़बरदार, जो किसी ने ये सवाल खड़ा किया कि जब सब ‘ऊपर वाले’ की मर्ज़ी से ही है तो फिर पाप या अधार्मिक या ग़लत काम क्यों होते हैं? ‘ऊपर वाले’ महाराज इन्हें होने क्यों देते हैं? वो इसे रोकते क्यों नहीं? इन सवालों का तार्किक और प्रमाणिक जबाब दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी धर्म के व्यक्ति को कभी नहीं मिलता। क्योंकि सभी तरह की आस्थाएँ, हमारे देवताओं के चमत्कारी स्वरूप में ही क़ायम रखी जाती हैं।

हरेक धर्म के पुरोहित ज़िन्दगी भर आस्थाओं की ही हिफ़ाज़त करते रहते हैं। यही पुरोहित ईश्वर का भय दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। लेकिन ईश्वर से भयभीत भी सिर्फ़ शरीफ़ लोग ही हो पाते हैं। बदमाशों, दुष्टों, अपराधियों, कुकर्मियों, असुरों, राक्षसों और दानवों पर ईश्वर का कोई भय कभी काम नहीं करता! इसीलिए 2019 में विष्णु रूपी जनता को मतदान रूपी मोहिनी नृत्य करके मोदी रूपी भस्मासुर से शिव रूपी लोकतंत्र को बचाना होगा!