यदि इस कल्पना को सही मान भी लिया जाए कि जिस विचारधारा के लोग हिंसक गतिविधियों में यक़ीन रखते हैं, उसके चिन्तक और विचारक भी हिंसा में संलिप्त समझे जाएँगे तो सबसे पहले तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नेस्तनाबूत किये जाने की आवश्यकता है। संघी भी तो ख़ुद को समाजसेवी बताते हैं। हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की सारी परिकल्पना ही हिंसक उपायों की वक़ालत करती है। क्या कभी किसी ने संघ के हज़ारों प्रचारकों को हिंसा का नंगा नाच खेलते देखा है? लेकिन ये किससे छिपा है कि संघ में हमेशा अतिवादियों, कट्टरपन्थियों और फ़िरका-परस्तों का बोलबाला रहा है!

इसी तरह से यदि माओवादी लोगों को कुछ बुद्धिजीवियों के विचार पसन्द आते हैं, तो क्या उन बुद्धिजीवियों को हिंसक गतिविधियों में लिप्त माना जा सकता है? संघ-बीजेपी को लगता है कि वामपन्थी लोग किसी भी सूरत में मानवाधिकारवादी नहीं हो सकते, क्योंकि वो तर्कवादी होते हैं, धार्मिक कर्मकांडों और ब्राह्मणवादी मनुवाद के ख़िलाफ़ होते हैं, समतामूलक और शोषणमुक्त समाज का ख़्वाब देखते हैं, पूँजीवाद का विरोध करते हैं तथा सामन्तवादी परम्पराओं की मुख़ालफ़त करते हैं। ऐसे बुद्धिजीवी मुख्य रूप से शहरों में रहते हैं और सफ़ेदपोश पेशों जैसे शिक्षक, वकील, डॉक्टर, पत्रकार वग़ैरह से जुड़े हुए हैं। लिहाज़ा, ये ‘अर्बन नक्सल’ या ‘शहरी नक्सली’ हैं!

नक्सलियों के तौर-तरीकों को कोई भी लोकतांत्रिक नहीं मानता। नक्सलियों को लोकतंत्र नापसन्द है। शायद इसलिए भी वो संविधान का पूरी तरह से सम्मान नहीं करते। चुनाव प्रक्रिया का इस्तेमाल करके मुख्य धारा की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के ज़रिये अपने लक्ष्यों को हासिल करने में उनका कुछ ख़ास भरोसा नहीं होता। संविधान और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति बाग़ी तेवर रखने के लिए उन्हें उन लोगों का ख़ून बहाने से कोई गुरेज़ नहीं होता, जो उस क़ानून के राज के पीछे खड़े हैं, जिसे संसद और विधानसभाएँ गढ़ती हैं। अपनी समानान्तर सत्ता को चलाने के लिए ये नक्सली लोग हिंसा और अपहरण-फ़िरौती के ज़रिये उन आदिवासी क्षेत्रों को अपनी मुट्टी में रखते हैं, जहाँ संवैधानिक इक़बाल दाँव पर होता है। हर तरह के विद्रोहियों या आतंकवादियों की तरह ये लोग भी पुलिस और सुरक्षा बलों को अपना दुश्मन समझते हैं, जबकि पुलिस और सेना को संविधानिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।

यदि गहराई से देखा जाए तो संघ भी नक्सली संगठन ही है! इसने भी संविधान को हमेशा ठेंगे पर ही रखा! दोनों में बुनियादी फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मायोवादियों का दबादबा जहाँ आदिवासियों और दूरदराज के इलाके में बसे ग़रीबों के बीच है, वहीं संघियों ने मुख्यधारा में शामिल होकर सवर्णों और अगड़ी जातियों के सम्पन्न लोगों में अपनी पैठ बनायी। लेकिन नक्सली हों या संघी, दोनों ने ही हिंसा को अपने वजूद का हथियार बनाया। संघियों ने जहाँ अवार्ड वापसी गैंग, अफ़ज़ल प्रेमी गैंग, अर्बन नक्सल गैंग, हमें चाहिए आज़ादी गैंग को राष्ट्रविरोधी करार दिया, वहीं अपनी लिंचिंग, दंगों, उन्मादी हत्याओं, जातीय दमन और उत्पीड़न को राष्ट्रप्रेम और देशसेवा का तरह पेश किया।

अब सुप्रीम कोर्ट की उस ताज़ा टिप्पणी से भगवा ख़ानदान में खलबली मची हुई है, जिसमें कहा गया कि असहमति और विरोध, लोकतंत्र के वैसे ही सेफ़्टी वाल्व हैं, जैसा प्रेशर कुकर में होता है। लेकिन इसी न्यायपालिका को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2015 में ये कहकर चेतावनी दी थी कि उसे ‘किसी सोच से प्रेरित अदालती फ़ैसलों को लेकर सावधान रहने की ज़रूरत है। क्योंकि इससे फ़ाइव स्टार एक्टिविस्टों को शह मिलती है।’

संघ-बीजेपी और प्रधानमंत्री, सभी को उन एक्टिविस्टों से नफ़रत है, जो उन्हें नापसन्द करते हैं। फ़ाइव स्टार एक्टिविस्टों या शहरी नक्सलियों से तो इन्हें सख़्त एलर्ज़ी है, क्योंकि ये अपने ही ग्रामीण नक्सली भाईयों की तरह जंगल-जंगल नहीं भटकते, बल्कि शहरों में रहते हैं। शहरों के बिजली-पानी, सड़क-सब्सिडी, क़ानून-पुलिस का मज़ा लेते हैं, ट्रेन-विमान से शहर-शहर और देश-विदेश घूमते हैं, तरह-तरह के एनजीओ चलाते हैं और कट्टरवाद का मुक़ाबला करते हैं। इसीलिए कमज़ोर वाले प्रधानमंत्री अर्थात् मनमोहन सिंह जहाँ माओवादियों को देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा बताते हैं, वहीं मजबूत और कड़े फ़ैसले लेने वाले प्रधानसेवक ने सीधे शहरी नक्सलियों पर निशाना साधा है।

मोदी और संघ-बीजेपी के रणनीतिकारों को अच्छी तरह से पता है कि ग्रामीण नक्सलियों पर सुरक्षा बलों की बड़ी से बड़ी कार्रवाई से वैसी ब्रॉन्डिंग नहीं होगी, जैसी मुट्ठी भर अर्बन नक्सलियों पर निशाना साधने से होगी। कल्पना कीजिए कि सुकमा में यदि सुरक्षा बलों ने दो दर्जन नक्सलियों को मार गिराया होता या उनका आत्मसमर्पण करवाकर उन्हें मुख्यधारा में शामिल करवाया होता तो उसकी ख़बर क्या अख़बारों के भी भीतरों पन्नों तक नहीं सिमट जाती! लेकिन पाँच-सात बुद्धिजीवियों के ख़िलाफ़ मनगढ़न्त सबूतों के आधार पर मोर्चा खोलने से मीडिया, कोर्ट-कचहरी और राजनीति में हंगामा खड़ा हो जाता है। उन्हें तो बस हंगामे से मतलब है।

ऐसे हंगामें से ही भक्तों में नयी ऊर्जा का संचार होता है। राफेल सौदे, नोटबन्दी और विकास दर की कलई खुलने से हुई किरकिरी से जनता का ध्यान भटकना आसान होता है। लिहाज़ा, प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर ही ख़तरा खड़ा करके उस सहानुभूति को भुनाने की कोशिश करो, जिसे अटलजी के अस्थिकलश में तलाशा गया था! इस समाज शास्त्रीय सिद्धान्त को ही राजनीति की भाषा में ‘भागते भूत की लंगोटी’ कहते हैं। लेकिन हक़ीक़त ये है कि मोदी सरकार की दुर्भावनापूर्ण करतूतों की फेहरिस्त इतनी लम्बी हो चुकी है कि वो अब किसी भी जतन से अपने पतन को टाल नहीं सकती!

ये समझने में कोई गफ़लत नहीं होनी चाहिए कि आख़िर नरेन्द्र मोदी की जान को सुधा भारद्वाज जैसे लोगों से क्या ख़तरा हो सकता है? गौरी लंकेश और डाभोलकर, पनसारे तथा कलबुर्गी जैसे लोगों से भी क्या नरेन्द्र मोदी की जान को ख़तरा था? कतई नहीं। मोदी की जान को कोई ख़तरा नहीं है, लेकिन उस विचारधारा पर ख़तरा ज़रूर गहराया हुआ है जिसकी नुमाईन्दगी मोदी करते हैं। सुधा जैसे लोग देश के संविधान और क़ानून के ज़रिये ग़रीबों, वंचितों, आदिवासियों को उनका हक़ दिलवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार और कॉरपोरेट के गुंडों ने प्राकृतिक सम्पदा से सम्पन्न छत्तीसगढ़ और झारखंड को ऐसे पत्रकारों और वकीलों से खाली करवा दिया है जो इनके गठजोड़ और लूट को बेनक़ाब करते थे। इसी रणनीति की वजह से अब अर्बन नक्सल निशाने पर हैं!

दरअसल, संघ-बीजेपी को दलितों-आदिवासियों के गोलबन्द होने से भारी ख़तरा नज़र आ रहा है। शिक्षित दलितों से सरकार के मंसूबों को भारी चुनौती मिल रही है। इसीलिए दलितों के आक्रोश को माओवाद, नक्सलवाद और ‘रेड टेटर’ का नाम दिया गया है। संघियों को यही बीमारी जेएनयू में नज़र आयी थी। यही रोग उन्हें भीमा कोरेगाँव में भी नज़र आया। इसीलिए जैसे कन्हैया और उमर ख़ालिद को निशाना बनाया गया, जैसे उनकी अदालत में पेशी के वक़्त वकीलों से मारपीट करवायी गयी, वैसे ही अब उन लोगों पर निशाना साधा गया है जो भीमा कोरेगाँव की हिंसा के वक़्त वहाँ मौजूद नहीं थे। उन पर आरोप भी ऐसे हैं मानो उन्होंने बन्दूक या लाठियाँ लेकर उत्पात मचाया हो। अरे, ये सारे लोग तो पढ़ने-पढ़ाने वाले हैं। यदि इनका ताल्लुक हिंसा से हो सकता है तो संघ के हरेक पदाधिकारी को भी जेल में ही होना चाहिए!