भारत में बेटियों और महिलाओं के अलावा रुपये, सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं और सम्पत्ति को भी लक्ष्मी कहा जाता है! लेकिन मोदी युग में लक्ष्मी के इन अवतारों पर ऐसा क़हर बरपा हुआ, जैसा भारतवर्ष के ‘गौरवशाली’ इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ! यहाँ साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा अवतरित हुई भगवान राम की पत्नी सीता से भी ज़्यादा अपमान और तिरस्कार पत्नी जसोदाबेन का हुआ, वो भी उत्कट राम भक्त और हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के दरबार में! इसी मोदी राज में लक्ष्मी को नारी शक्ति भी बताया गया तो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देकर नारियों को उल्लू भी बनाया गया!

एक तरफ, ‘बेटी बचाओ’ के नारे लगते रहे तो दूसरी ओर भगवा ख़ानदान के दुष्कर्मियों को बेटियों का शिकार करने, उनकी आबरू से खेलने और दिल-दहलाने वाले तरीक़ों से उनकी हत्या करने की खुली छूट दे दी गयी! अनाथ और बेसहारा बेटियों के ठिकानों को दुष्कर्मियों की अय्याशी का मन्दिर बना दिया गया। मोदी राज में भारत माता की जयजयकार का ढोंग करने वालों ने महिलाओं के प्रति ऐसी-ऐसी वहशियाना हरक़तें कीं, जैसी पहले कभी नहीं सुनी गयीं। सत्ता प्रतिष्ठान ने यदि पर्दे के पीछे से ऐसे दुष्कर्मियों को शह नहीं मिली होती तो इतने व्यापक पैमाने पर लक्ष्मी रूपी महिलाओं के प्रति अत्याचार और लिंचिंग का नंगा नाच कैसे हो सकता है!

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The UP Police arrested the couple who were managing the shelter home after the license was revoked. (ANI)

लक्ष्मी का अगला रूप है रुपया। नरेन्द्र मोदी ने दो साल पहले 15.41 लाख करोड़ रुपये की लक्ष्मी को इसलिए मृत्युदंड दे दिया क्योंकि उन्हें यूपी का इम्तिहान पास करना था! मोदी-शाह-योगी के लिए संघ-बीजेपी ने यूपी को जीतने में कामयाबी पायी। वो बात अलग है कि उन पर राज्य को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने और ईवीएम में बहुत बड़े पैमाने पर गड़बड़ी करने के भी आरोप लगे। लेकिन जीत तो जीत है। विनाशकारी ये है कि चुनाव अब प्रतिद्वन्दिता का नहीं बल्कि युद्ध बन चुका है। ‘युद्ध में सब जायज़ है’ और ‘समरथ को नहिं दोष गुसाँई’ वाले सिद्धान्त भी कालजयी हैं। इसीलिए अब जबकि नोटबन्दी के नतीज़े देश के सामने हैं, इससे सिर्फ़ इतना साबित हुआ है कि 22 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश का युद्ध जीतने के लिए संघ-बीजेपी ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों के हितों की बलि चढ़ा दी!

15.41 लाख करोड़ रुपये वाली लक्ष्मी को देह त्यागे दो साल होने को हैं। अब भी नोटबन्दी की चिता सुलग ही रही है। देश के करोड़ों लोग अब भी उस लक्ष्मी की चिता की तपिस को महसूस कर रहे हैं। विकास रूपी मॉनसून की दो बरसातें भी हो लीं, लेकिन लक्ष्मी की चिता अब भी धधक रही है। चिता में सुर्ख़ अंगारे अब भी नज़र आ रहे हैं। चिता की राख़ अब भी बेहद गर्म है। अब साफ़ दिख रहा है कि इसकी अस्थिकलश यात्रा 2019 के चुनाव में निकाली जाएगी। ये यात्रा बेहद ग़मगीन होगी। इसे वही सवा सौ करोड़ भारतवासी बेहद ख़ामोशी और शान्ति से निकालेंगे, जिनकी ज़िन्दगी को नरेन्द्र मोदी ने इसलिए तहस-नहस कर दिया क्योंकि उन्हें यूपी जीतना था!

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Prime Minister Narendra Modi during UP Assembly Polls (File Photo)

याद है ना कि नोटबन्दी के ज़रिये संघ-बीजेपी ने कैसे ये भ्रम फैलाया था कि नोटबन्दी के ज़रिये नरेन्द्र मोदी ने अमीरों पर क़हर बरपा कर दिया है, क्योंकि वो जनता-जनार्दन के साथ हैं! दरिद्र नारायण का दुःख-दर्द समझते हैं क्योंकि वो कामदार हैं, काल्पनिक चाय-विक्रेता की सन्तान हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं और कभी कॉलेज नहीं गये! लेकिन भगवान शिव से प्राप्त वरदान की वजह से ‘इंटायर पॉलिटिकल साइंस’ में पारंगत हैं! मोदी तो चमत्कारी बाबा हैं तभी तो सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘अच्छे दिन’ के रूप में सशरीर ‘स्वर्गारोहण’ करवाने का स्वप्न बेचते हैं!

मोदी मायावी हैं! तभी तो उनकी नोटबन्दी की सफलता के लिए 150 से ज़्यादा ग़रीबों और देशभक्तों ने क़ौम की ख़ातिर लाइनों में लगकर अपने प्राणों की आहुति दे दी! क्या नोटबन्दी के वक़्त ये धारणा नहीं फैलायी गयी थी कि इसकी सफ़लता से यदि अमीरों का सफ़ाया नहीं होगा, तो भी उनकी सम्पन्नता मिट जाएगी! लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। ‘नोटबन्दी समारोह’ के दौरान बेचारी हीराबाई के अलावा एक भी नामी-गिरामी शख़्स को कभी, किसी ने, कहीं पर भी लाइन में खड़ा नहीं देखा! जब अमीर लोग पाई-पाई के मोहताज नहीं दिखे तो फैलाया गया कि उन्होंने ‘फ़ीस या कमीशन’ देकर ग़रीबों को लाइनों में लगा दिया। मुमकिन है कि उस दौर में लाखों लोगों के घरों में लाइन में लगने की मज़दूरी से चूल्हा जला हो।

लेकिन ये अपवाद तो विकास की सड़क पर बने छोटे-मोटे गड्ढे की तरह थे। कालाधन वाली हाईवे कहाँ चली गयी? आतंकियों की फंडिंग क्यों नहीं रुकी? भ्रष्टाचार क्यों नहीं थमा? जाली नोट का सफ़ाया क्यों नहीं हुआ? बाद में कैश-लेस और लेस-कैश की बातें भी हुई, लेकिन वो भी फटा ढोल ही क्यों साबित हुआ? अब नगाड़ा पीटा जा रहा है कि नोटबन्दी की वजह से जनता में ‘टैक्स कम्प्लायंस’ में क्रान्ति आ गयी है। हालाँकि, ये क्रान्ति नहीं, सुधार का मामूली सा प्रयास है। ज़्यादा लोग आयकर भरें, अपनी आपदनी का स्रोत ज़ाहिर करें, टैक्स चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो; इन लक्ष्यों के प्राप्त करने के लिए नोटबन्दी को हथियार बनाने का कोई तुक़ नहीं हो सकता! क्योंकि इस हथियार की बहुत भारी कीमत सवा सौ भारतवासियों और इनकी अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ी है।

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People scuffle to exchange Rs 500 and Rs 1000 notes at a bank. “

टैक्स संग्रह नीति का सामान्य नियम हमेशा से ये रहा है कि टैक्स वसूली की लागत टैक्स की कमाई के मुक़ाबले बेहद मामूली होनी चाहिए। लेकिन नोटबन्दी के बाद आयकर वसूलने में जितना इज़ाफ़ा हुआ, उससे कहीं ज़्यादा तगड़ी चोट देश के नये नोट छापने, पुराने नोट को बदलने और पूरी क़वायद से पैदा हुई बेरोज़दारी, काम-धन्धे के चौपट होने से हुई। आयकर की चोरी रोकने के लिए नोटबन्दी से पहले जो उपाय मौजूद थे, वही अभी भी हैं। इन्हें किसी भी तरह से अपर्याप्त नहीं माना जा सकता। इन्हीं उपायों के बदौलत तो आज पैदा हो रहे कालेधन पर नकेल कसी जा रही है। क्या कोई ये दावा कर सकता है कि नोटबन्दी के बाद देश में कालाधन पैदा नहीं हो रहा, रिश्वतख़ोरी नहीं हो रही, जाली नोट नहीं छप रहे, आतंकवादियों की फंडिग बन्द हो चुकी है। डिज़िटाइजेशन तो नोटबन्दी से पहले जितना था, अब उससे भी कम हो चुका है।

संघ-बीजेपी को नोटबन्दी का अंज़ाम अच्छी तरह से पता था। उन्होंने इसके ज़रिये जहाँ एक ओर मोदी को ग़रीब-वत्सल बनाकर पेश करने में कामयाबी पायी, वहीं दूसरी ओर अपना और अपने धन्ना सेठ दोस्तों के काले धन को सफ़ेद करवा दिया। संघियों पर नयी वाली लक्ष्मी भी मेहरबान रही। जबकि चुनावी युद्ध के दुश्मनों की सप्लाई लाइन कट गयी। हालाँकि, बदलते वक़्त के साथ संघ-बीजेपी के दुश्मनों (प्रतिद्वन्दी नहीं) का भी कालाधन सफ़ेद हो गया, लेकिन ऐन चुनाव के वक़्त आयी नोटबन्दी की मुसीबत से वो उबर नहीं पाये।

नोटबन्दी के दौर में उत्तर प्रदेश को जीतने के लिए संघ-बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को ऐसे युगपुरुष की तरह पेश किया जिसका साम्राज्य सम्राट अशोक और अकबर से भी ज़्यादा विशाल है, जो विक्रमादित्य और जहाँगीर से भी कहीं बड़ा इंसाफ़ पसन्द और हरिश्चन्द्र से बड़ा सत्यवादी है! लेकिन नीयतख़ोरी कभी नहीं छिपती। जनता की चीख़-पुकार ने जब हवा का रुख़ पलट दिया तो इतिहास का ये महानतम व्यक्ति और पतित हो गया। इसने सवा सौ करोड़ भारतवासियों की आँखों में धूल झोंकने के लिए एक ओर, ‘मैंने देश के लिए घर-परिवार सबको त्यागने’ की दुहाई देकर घड़ियाली आँसू बहाये। दूसरी ओर, ‘50 दिन की मोहलत’ तथा ‘चौराहे पर सज़ा’ देने की नौटंकी की। तीसरी ओर, उस बेहद बूढ़ी माँ हीराबाई को लाइन में खड़ा करके उनका तमाशा बनाया, जो बेटों-पोतों से सम्पन्न है।

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उत्तर प्रदेश की चुनौती को ही देखते हुए ही नोटबन्दी (8 नवम्बर 2016) से पाँच हफ़्ते पहले यानी 29 सितम्बर 2016 को सर्ज़िकल हमले का दाँव खेला गया। ताकि लाहौर दौरा, पठानकोट की मेज़बानी और उरी के हमलों से पैदा हुई बड़बोले राजनेता की छवि को बदलने के लिए ये झूठ फैलाया जा सके कि विश्व में नरेन्द्र मोदी जैसा पराक्रमी और कोई नहीं है! इससे पहले मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के ज़रिये साम्प्रदायिक उन्माद को जमकर हवा दी गयी। लेकिन संघ को उत्तर प्रदेश से यही फ़ीडबैक मिलता रहा कि बीजेपी के लिए मैदान साफ़ नहीं है। तब चुनावी मैदान साफ़ करने के लिए संघ ने नोटबन्दी के रूप में लक्ष्मी की बलि चढ़ाने वाला ब्रह्मास्त्र चुना। नोटबन्दी, संघ के ख़ुराफ़ाती दिमाग़ की उपज थी। मोदी तो सिर्फ़ उसके मुखौटा थे।

इस ब्रह्मास्त्र की बदौलत कई और चुनाव भी जीते गये। वहाँ भी तरह-तरह के झूठ का ही बोलबाला रहा। इसीलिए जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया, वैसे-वैसे सवा सौ करोड़ भारतवासियों को नोटबन्दी का मतलब, उसकी हक़ीक़त समझ में आने लगी। तभी तो चाहे गुजरात हो या कर्नाटक या कई राज्यों में हुए दर्जनों उपचुनाव, हर जगह बीजेपी की मिट्टी पलीद हुई। आज तो आलम ये है कि रुपया, पेट्रोल-डीज़ल, रसोई गैस, सीएजी, एनपीए, रेलवे, रोज़गार, शिक्षा वग़ैरह सभी का हाल सिर्फ़ इतना ही बता रहा है कि सरकार चलाने वालों को बस, जनता को लूटने और राफ़ेल जैसे सौदों के ज़रिये अपनी और दोस्तों की जेबें भरने के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा!

‘मिनिमम गर्वनमेंट, मैक्ज़ीमम गर्वनेंस’ की बात करने वालों ने आज देश को ‘ऑटो पायलट’ पर डाल दिया है! देश में अघोषित आपातकाल यानी नमोजेंसी लागू है। जनता को जगाने वाले मीडिया का गला घोंट दिया गया है। असहमति जताने वालों और विपक्ष को देशद्रोही बताया जा रहा है! क्योंकि बुनियादी तौर पर संघ-बीजेपी के लोग बेहद डरपोक हैं! उनकी साँसें सिर्फ़ झूठ से चलती हैं। वो भयभीत हैं कि अकूत धन-दौलत, गोला-बारूद, पुलिस-फौज़ के बावजूद उस दिन क्या होगा जब निहत्थे और ग़रीब उनसे ख़ौफ़ खाना बन्द कर देंगे! इसीलिए, 2019 के चुनावों को आपको बुराई पर अच्छाई की विजय वाला भाव दिखायी देगा। झूठ और उन्माद की ताक़तों का मुक़ाबला सच और इंसानियत की ताकतों से होगा। इसका नतीज़ा 2004 से भी ज़्यादा शानदार होगा, क्योंकि इसमें मोदी के विपक्ष में उनके ही अनगिनत झूठे बयान और जुमले, सच बनकर उनके ख़िलाफ़ खड़े होंगे!