देवेन्द्र फड़नवीस की महाराष्ट्र पुलिस बता चुकी है कि शहरी नक्सलियों से नरेन्द्र मोदी की जान को ख़तरा है! लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के संयुक्त पुलिस आयुक्त शिवाजीराव बोडखे से पूछा है कि ज़रा ये तो बताओ कि जब नौ महीने पुराना भीमा कोरगाँव हिंसा का मामला अदालत में है तो तुम्हारी ज़ुर्रत कैसे हुई कि तुम प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके आरोपियों पर एकतरफ़ा हमला करो सब-ज्यूडिस यानी न्यायालय के विचाराधीन मामले में नियम-क़ायदों का होश नहीं है, उसे तो अपने पद पर एक पल भी और बने रहने का कोई हक़ नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को तो धक्के मारकर नौकरी से निकाल देना चाहिए जो अपने सियासी आकाओं के राजनीतिक हितों को साधने का हथकंडा बन चुके हैं।

अदालतें भी अपना सिर ना ठोंके तो क्या करें? 29 अगस्त को माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धनंजय यशवन्त चन्द्रचूड़ कह चुके हैं कि “असहमति ही लोकतंत्र का सुरक्षा वाल्व है। इसके बग़ैर प्रेशर कुकर फट जाएगा।” लेकिन संघ-बीजेपी तो चाहता ही यही है कि प्रेशर कुकर कल फटता हो तो आज फट जाए। चुनाव सामने हैं। हवा ख़राब है। जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है। लेकिन रोज़ाना एक न एक बात ऐसी फैलायी जाती है जिससे जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटक सके। तभी सारे उन्मादी तत्व ये भूल जाते हैं कि बदक़िस्मती से ही सही नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्हें अपने ही देश के उन लोगों से जान का ख़तरा है, जिनका कोई आपराधिक अतीत नहीं! साफ़ है कि संघ-बीजेपी को मोदी की सियासी पारी के समापन और निजी सुरक्षा में फ़र्क़ दिखना बन्द हो गया है।

अरे, ये संघ है! ये सहानुभूति लहर पैदा करके सत्ता को हथियाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। ज़रूरी हो तो ये चुटकी बजाकर मोदी को भी दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकने में एक पल भी नहीं लगाएगा। 2019 को देखते हुए सहानुभूति लहर को तैयार किया जा रहा है। तभी तो जहाँ एक ओर देवेन्द्र फड़नवीस की पुलिस सियासी दाँव का हिस्सा बन चुकी है, वहीं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी दिन में तारे नज़र आ रहे हैं। सत्ता को हाथ से खिसकता देख शिवराज सिंह चौहान ने नया नारा बुलन्द कर दिया है कि ‘काँग्रेस उनके ख़ून की प्यासी हो गयी है!’

सोचिए, ये कैसा मुख्यमंत्री है जिसकी जनता को ‘मूर्ख बनाओ यात्रा’ को कुछ लोगों ने काले झंडे क्या दिखाये, तो इन्होंने अपने चेलों से अपने ऊपर ही कुछ पत्थर फेंकवा लिये। तभी तो पथराव हुआ और मुख्यमंत्री को खरोंच तक नहीं आयी। आती कैसे? पत्थरों का निशाना तो उन पर था ही नहीं। निशाने पर तो थे वो काला झंडा दिखाने वाले लोग जिनका आचरण पूरी तरह से लोकतांत्रिक रहा है और इसीलिए स्वागत योग्य है। बेशक़, काँग्रेसियों ने ही काला झंडा दिखाया होगा। मध्य प्रदेश की दुर्दशा को देखते हुए सरकार का विरोध होना ही चाहिए। इसीलिए विरोध को सहानुभूति में बदलने के लिए नीयतख़ोर मामा शिवराज ने अपने ही लोगों से पत्थर फेंकवा लिया! काँग्रेस का विरोध शिवराज की जान पर भी वैसा ही ख़तरा है जैसा चुनाव को सामने देख मोदी की जान साँसत में है।

संघियों का आसन जब डोलने लगता है तो उनके जान पर ख़तरा पैदा हो जाता है। जिनका इतिहास औरों की जान लेने से भरा पड़ा है, उन्हें लगता है कि सत्ता के हाथ से फिसलते ही उनका भी वही हश्र होगा, जैसा वो सत्ता को हाथ में थामकर अपने विरोधियों के साथ करते आये हैं। संघ की हिंसा का जबाब केरल के अलावा और कहीं से भी हिंसा के रूप में कभी नहीं मिला है। लोकतंत्र के लिए किसी भी तरह की हिंसा न सिर्फ़ दुःखद है, बल्कि पूर्णतया अस्वीकार्य है। हालाँकि, संघ ने इस सिद्धान्त पर कभी अमल नहीं किया। यही वजह है कि मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी उनकी जान पर कई बार ख़तरा मँडराता पाया गया। मज़े की बात ये रही कि ऐसा हरेक ख़तरा चुनाव के मौसम में ही नज़र आया। अब भी माज़रा वही है।

गुजरात वाले नरेन्द्र मोदी की तर्ज़ पर शिवराज सिंह चौहान को ये ग़लतफ़हमी हो गयी है कि पड़ोस वाले मरीज़ की दवा खा लेने से उनकी तबीयत भी ठीक हो जाएगी। लेकिन कभी ऐसा हुआ है, जो अब हो जाएगा! शिवराज के पीछे मध्य प्रदेश की महान पुलिस खड़ी है, जो अमेरिकी पुलिस से ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे उम्दा मानी जाने वाली इंग्लैंड की पुलिस स्कॉटलैंड यार्ड से भी बेहतर है। लेकिन जब हवा ख़िलाफ़ होती है तो इतनी उम्दा पुलिस भी अपने मुख्यमंत्री को पथराव से नहीं बचा पाती! अरे, जिस देश की सुरक्षा एजेंसियाँ अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की हिफ़ाज़त नहीं कर सकतीं, उसके पीएम-सीएम को फ़ौरन इस्तीफ़ा देकर वानप्रस्थ का रास्ता थाम लेना चाहिए!

इन नेताओं की तरह ही केन्द्र सरकार में भी एक अज़ीबोग़रीब धूर्तज्ञ विराजमान हैं। ये हैं नीति आयोग के चेयरमैन राजीव कुमार। इनकी गिनती विदेश को तो छोड़िए, देश के भी दो कौड़ी के अर्थशास्त्रियों में नहीं है। लेकिन मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने के लिए जनाब ज्ञान दे रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का सत्यानाश करने के लिए रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ज़िम्मेदार हैं! नोटबन्दी बेक़सूर है! राजीव कुमार बता रहे हैं कि रघुराम राजन की नीतियों की वजह से देश के सरकारी बैंकों का भट्ठा बैठ गया। उनका एनपीए सरकार चूमने लगा। हे मूर्ख, भूल गये क्या कि मोदी-जेटली राज में रघुराम कितने वक़्त तक रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे। वो काम का आदमी नहीं था तो क्यों दो साल तक उसे पद पर बनाये रखा?

क्या ये सही नहीं है कि रघुराम राजन ने नोटबन्दी का रास्ते का विरोध किया था? क्या ये सही नहीं है कि नोटबन्दी के बारे में उस वित्त मंत्री अरूण जेटली को भी पता नहीं था, जिनके मातहत रिज़र्व बैंक काम करता है? इतना ही नहीं, रिज़र्व बैंक के उस गवर्नर उर्जित पटेल को भी नोटबन्दी की जानकारी नहीं थी, जिसके कन्धे पर बन्दूक रखकर सारा नंगा नाच करने की रणनीति बनी थी? भूल गये क्या कि सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि नोटबन्दी की वजह से सरकार ने क़रीब 4 लाख करोड़ रुपये के बैंकों में नहीं लौटने का अनुमान लगाया था? अब सच्चाई सामने है कि 99.3% पुराने नोट बैंकों में आ गये। हालाँकि, इस जानकारी को छिपाने की कोई कम कोशिश तो हुई नहीं थी। बेचारा रिज़र्व सालों-साल एक-एक नोट की जाँच में लगा रहा।

बहरहाल, अब जब साफ़ दिख रहा कि जनता नोटबन्दी की आड़ में अपने साथ हुई धोखाधड़ी का चुनचुनकर हिसाब करेगी तो सबकी कुर्सियाँ हिल रही हैं। इसी आफ़त को देखते हुए नरेन्द्र मोदी ने बीमार अरूण जेटली को मिनिस्ट्री का ब्लॉगिंग का अतिरिक्त प्रभाव सौंप दिया है वो राष्ट्रपति की आदेश के बग़ैर! मोदी जानते हैं कि ये बहुत ज़रूरी है कि नोटबन्दी की नाकामी को छिपाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा झूठ फैलाया जाये। राजीव कुमार भी यही कर रहे हैं।

राजीव कुमार से पहले वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के सचिव एससी गर्ग ने भी मोदी-जेटली को ख़ुश करने के लिए नोटबन्दी को हरेक लक्ष्य में सफल बताया था। दरअसल, सरकार में बैठे सभी लोगों को ये मुग़ालता है कि उनके अलावा सारा देश बेवकूफ़ है। वो जितना भी झूठ बोलेंगे उसे 2014 की तरह भक्त सच भी मानते रहेंगे। अरे, अब तो भक्तों को चटाई गयी अफ़ीम का नशा भी उतरने लगा है। इन्तज़ार है तो बस ये कि ख़ुद मोदी किस दिन ट्वीट करके नोटबन्दी की विफलता के लिए काँग्रेस, विपक्ष या नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराते हैं!