चेन्नई हाईकोर्ट के जजों का ये कहना किस तालिबानी फ़रमान से कम है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI देश के Toll Plaza पर जजों और VIPs के लिए एक अलग लेन निर्धारित करे, वर्ना उसके ख़िलाफ़ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी। जज साहब का ये फ़रमान बताता है कि वो किस सीमा तक बीमार हैं! वास्तव में उन्होंने संविधान की ओर से अदालतों को दी गयी अवमानना की शक्ति की अवमानना की है! इस तरह से सबसे बड़े गुनाहगार तो वो ख़ुद हैं। काश! इंसाफ़ का कोई डंडा उनके ख़िलाफ़ चल पाता!

हाईकोर्ट के जजों का ऐसा बचकाना रवैया उस दौर में सामने आता है जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जज, न्यायपालिका के गिरते मूल्यों के प्रति चिन्तित होते हैं। क्या अब उन्हीं जजों पर ये सुनिश्चित करने का दारोमदार नहीं है कि उनके ‘ब्रदर जज’ सामान्य ज्ञान, सहज न्याय और बराबरी के तमाम सिद्धान्तों की धज़्ज़ियाँ नहीं उड़ा सकें। लोकतंत्र में जजों के बाद कोई ख़ुदाई ताकत नहीं होती। जजों से अपेक्षित है कि वो सिर्फ़ उन्हीं क़ानूनों के मुताबिक चलें, जिसे विधायिका ने लागू किया हो! क़ानून में कोई कसर हो, तब भी जज मनमाना क़ानून नहीं बना सकते!

आज बड़ा विचित्र दौर हमारे सामने है। सबूतों के आधार पर इंसाफ़ करने वाले जजों पर तालिबानी प्रवृत्ति कमोबेश वैसे ही सवार है, जैसा मोदी राज में बढ़ी लिंचिंग की बेशुमार घटनाओं के रूप में हमारे सामने है। सोचने की बात तो ये है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है कि सड़कों पर घूमते लोगों का हमारी सरकार, पुलिस और न्यायव्यवस्था से भरोसा उठ चुका है? जिसे देखिए वही क़ानून हाथ में लेता है! इसकी शुरुआत बीफ़ के नाम पर बेचारे अख़लाक़ को उसके घर में घुसकर पीट-पीटकर मार देने वाली घटना से होती है। तब मुनासिब क़दम नहीं उठाये गये। इसीलिए नफ़रत और अफ़वाह की वो आग अब जंगल की आग तरह देश में फैल गयी है। हालाँकि, इसका सबसे ज़्यादा असर बीजेपी शासित राज्यों में ही दिख रहा है।

मिसाल के तौर पर बीते 24 घंटे में ही लिंचिंग की चार वारदातें सामने आयी हैं। दिल्ली के भलस्वा इलाके में 16 साल के एक लड़के पर भीड़ ने पूरी बेरहमी से अपना हाथ साफ़ किया। उस पर चोरी का आरोप था। बेचारा, भीड़ की भेंट चढ़ गया। भीड़ ने उसकी हत्या कर दी। कोई नहीं कह सकता कि हत्यारों के ग़िरेबान तक कभी क़ानून के लम्बे हाथ पहुँच पाएँगे! दिल्ली में ही कुछ दिनों पहले काँवड़ियों ने ताँडव करके बताया था कि वो हरेक क़ायदे-क़ानून से ऊपर हैं। आज ही भोपाल से ख़बर आयी कि एक ड्रॉइवर को बस में जमकर पीटा गया। फ़िरोज़ाबाद में एक रिक्शेवाले को भी इसलिए पीटते-पीटते अधमरा कर दिया गया कि उसने किसी महिला से बदसलूकी की थी।

इलाहाबाद में तो एक रिटायर दारोगा जी को किसी रंजिश की आड़ में सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला गया। दारोगा मुसलमान था और उसे ख़ुदागंज़ पहुँचाने वाले भी मोहल्ले के मुसलमान ही थे। यानी, बात किसी हिन्दू-मुस्लिम की नहीं है। बात इंसानियत के मर जाने की है। क़ानून के राज के ख़त्म हो जाने की है। रामराज्य के स्थापित होने और गुँडाराज या जंगलराज के पतन की है! दरअसल, ये सब झूठ है। सच तो ये है कि तालिबानी इंसाफ़ है। आपको पसन्द हो या नापसन्द। आप सहमत हों या लेकिन, किन्तु, परन्तु और अगर-मगर में उलझे रहें। लिंचिंग के ज़रिये फ़ौरी इंसाफ़ करने वाली हरेक घटना आपको चीख़-चीख़कर कह रही है कि आपकी सरकार, आपकी पुलिस और आपका न्यायतंत्र अपना बुनियादी काम तक नहीं कर रहा है।

अब यदि आप भारत के इस पतन के लिए मोदी युग को लानत भेजेंगे तो लाखों मोदी भक्त आपसे कहेंगे कि काँग्रेस के ज़माने में क्या होता था? ये काँग्रेस की देन है? चारों ओर अमन-चैन है! ‘विकास’ हर्षोल्लास में डूबा है! वो ‘विकास दर’ के सुधरने पर नृत्य कर रहा है! इसी नृत्य को गौरवशाली बनाने के लिए लिंचिंग की आहुतियाँ दी जा रही हैं! इसी उत्सव की वजह से नरेन्द्र मोदी को फॉसिस्ट कहना गुनाह हो गया है। मोदी राज में लिंचिंग के प्रति सरकारी उदासीनता और पर्दे के पीछे से संघ-बीजेपी की ओर से लिंचिंग करने वाले तत्वों को हवा देने का नतीज़ा आपके सामने है। मौजूदा दौर में आप मोदी ज़िन्दाबाद तो बोल सकते हैं, लेकिन मोदी को फॉसिस्ट नहीं बोल सकते, उन्हें तानाशाह नहीं बोल सकते, उन्हें मुर्दाबाद नहीं बोल सकते! भले ही इस सरकार की आततायी नीतियों ने आपका जीना मुहाल कर रखा हो!

पेट्रोल-डीज़ल, रसोई गैस के दाम के ज़रिये सरकार आपको लूटकर आपका विकास कर रही हो। लेकिन यदि आप पाकिस्तान परस्त नहीं हैं तो आप उफ़ तक नहीं कर सकते। इसीलिए, अनुभवी अरूण शौरी बिल्कुल सही कह रहे हैं कि यदि मोदी राज ख़त्म नहीं हुआ तो 2019 का चुनाव, भारतीय लोकतंत्र का आख़िरी चुनाव होगा! सही कह रहे हैं कि यशवन्त सिन्हा कि नोटबन्दी और राफ़ेल से बड़ा घोटाला सारी दुनिया में पहले कभी नहीं हुआ! लेकिन नरेन्द्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान को अपनी जान ख़तरे में दिख रही है। ताकि जनता गुमराह होकर इनकी झोली में थोड़ी सी सहानुभूति डाल दे। इस दौर में सिर्फ़ वसुन्धरा राजे को दीवार पर लिखी इबारत साफ़ दिख रही है। उन्हें काले रंग का ख़ौफ़ खाये जा रहा है। वो जानती हैं कि चुनाव में जनता बीजेपी के मुँह पर कालिख़ पोतने वाली है!

सवा सौ करोड़ भारतवासियों को अब सिर्फ़ ये तय करना है कि जो हो रहा है, जैसे हो रहा है, यदि वो सही नहीं है तो इसके लिए किसे जबाबदेह माना जाए और उसके प्रति कैसा सलूक़ किया जाए! चारों और फैले अराजकता और मायूसी भरे माहौल में उम्मीद की सिर्फ़ यही किरण दिखायी दे रही है कि चुनाव नज़दीक है। इससे पैदा होने वाला जनादेश ज़रूर बदलाव लेकर आएगा! क्योंकि समाज के कुछ लोग भले ही हैवान हो गये हों, भले ही हैवानियत को प्रशंसक हों, लेकिन ज़्यादातर भारतीयों के दिल में अब भी टीस उठती है, हूँक उठती है! यही वेदना, नया सवेरा लाएगी!