उत्तर भारत के सवर्णों को अपनी बुद्धि पर बहुत ग़ुमान है! ऐसा उनकी वास्तविक बुद्धिमत्ता की वजह से कम और सामाजिक तथा जातिगत श्रेष्ठता के दम्भ के नाम पर ज़्यादा है! इन सवर्णों को हिन्दू गौरव के नाम पर राम मन्दिर आन्दोलन के दौर यानी 1990 के दशक से ग़ुमराह किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिन्दू-हितों की दुहाई देकर जिन्हें लामबन्द करने में कामयाबी पायी, उन मन्दबुद्धि हिन्दुओं में इन्हीं सवर्णों की तादाद सबसे ज़्यादा है। लेकिन उत्तर भारतीय राज्यों में बसे सवर्णों को अपना वोट बैंक बनाने के नाम पर संघ ने जिन मनुवादी सिद्धान्तों को हवा दी, अब वही उसके लिए साँप-छछूँदर वाला हाल पैदा कर चुके हैं।

आरक्षण विरोधी दुष्प्रचार को हवा देने से भी संघ को बहुत फ़ायदा हुआ। कभी संघ का जनाधार मुख्य रूप से बनियों और चितपावन ब्राह्मणों तक ही सीमित था। हिन्दू समाज की अन्य बिरादरियाँ तब तक या तो काँग्रेस के साथ थीं और उभर रही क्षेत्रीय पार्टियों के साथ। लेकिन राम मन्दिर आन्दोलन के बाद सवर्णों में संघ की पैठ ख़ासी बढ़ गयी। इसके दो मुख्य कारण थे। पहला, मनुवादी हिन्दू गौरव का पाखंड और दूसरा, आरक्षण विरोध। संघियों ने काँग्रेस पर हमला करने के लिए आरक्षण को अपने दुष्प्रचार का हथकंडा बनाया। सवर्णों के घरों में अक्सर आरक्षण को लेकर भ्रामक चर्चाएँ होने लगीं। देश की बढ़ती आबादी की वजह से शिक्षा और रोज़गार के घटते अवसरों ने ऐसी चर्चाओं के लिए ख़ूब सामग्री दी। दशकों से जारी भ्रामक प्रचार की वजह से आरक्षण को सवर्ण समाज घृणा और तुष्टिकरण की नापाक नीति के रूप में देखने लगा। वही सिलसिला बढ़ते-बढ़ते अब इस मुक़ाम पर आ चुका है कि सवर्ण को आरक्षण बड़ा दुश्मन नज़र आता है।

व्यापक साज़िश के तहत मन्दबुद्धि सवर्णों में ये धारणा बैठा दी गयी कि आरक्षण की सुविधा सिर्फ़ दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए ही क्यों है? क्या सवर्णों में ग़रीब नहीं हैं? ग़रीबों में भेदभाव करके सरकारें ही जातिवाद को हवा देती हैं। कोई कहता है कि आरक्षण से प्रतिभा का अनादर होता है। कोई कहता है कि सरकार दलितों की मदद करना चाहती है, वो उन्हें शैक्षिक रूप से मज़बूत बनाये, सारी सुविधाएँ दे, लेकिन आरक्षण ख़त्म होना चाहिए। किसी को इस बात की पीड़ा है कि बाप को आरक्षण मिला तो फिर बेटे को क्यों? कोई कहता है कि अफ़सर को आरक्षण तो उसके बेटे को क्यों? दलितों में भी जो सम्पन्न हैं, उन्हें आरक्षण क्यों? शिक्षा में तो चलो मान लिया लेकिन नौकरियों में क्यों? इस नौकरी में आरक्षण है तो उसमें क्यों नहीं?

आरक्षण विरोधियों के किसी भी बहस में आरक्षण की मूल वजह की चर्चा नहीं होती। आरक्षण की मूल वजह है जातिगत भेदभाव, जातिगत हीनभाव, जाति आधारित पेशा, जाति आधारित शोषण और उत्पीड़न, जातिगत दुराव या ऊँचनीच और सामन्तवादी प्रवृतियाँ। इन सबकी जड़ें सदियों पुरानी हैं। बीते 70 साल में बहुत सुधार भी आया है। बहुत सारे सवर्णों में बदलाव आया है। लेकिन 10 साल के लिए लाये गये आरक्षण ने अभी तक ऐसे हालात नहीं बनाये हैं, जिससे कोई इसे ख़त्म करने के बारे में सोच भी सके। कालान्तर में पिछड़ा वर्ग को समुचित मौका देने के नाम पर आरक्षण का दायरा बढ़ाया गया। इससे सवर्णों की छाती पर और साँप लोटने लगा।

बहती गंगा में हाथ धोने के लिए संघी जहाँ निजी स्तर पर आरक्षण को कोसते रहे, वहीं सियासी मोर्चे पर उनकी हिम्मत नहीं हुई कि वो आरक्षण की ख़त्म करवा सकें। सवर्णों को ख़ुश करने के लिए कई बार संघियों ने आरक्षण की समीक्षा की दुहाई दी, लेकिन इससे जनाधार की हवा ऐसी पलटी कि बीजेपी के तमाम आला नेताओं के घोषणा करने पड़ी कि आरक्षण हर्ग़िज़ ख़त्म नहीं होगा। हालाँकि, ऐसे पैंतरों के बावजूद भगवा ख़ानदान के बारे में ये धारणा पुख़्ता होती चली गयी कि वो आरक्षण विरोधी है। रोहित वेमुला की मौत, उना में दलितों की पिटाई, ईसाईयों और मुसलमानों के साथ हुई दरिन्दगी वाली अनेक घटनाओं ने दलितों को अब बीजेपी और संघ से बहुत दूर पहुँचा दिया है।

Bharat-Bandh  सवर्णों का ‘भारत बन्द’ तो बहाना है, मकसद तो उन्हें उल्लू बनाना है! Bharat Bandh MP

दशकों से तैयार हो रही ऐसी पृष्ठभूमि में SC-ST Act का वो प्रावधान भी वर्षों से क़ायम था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 को अनुचित बताते हुए ख़ारिज़ कर दिया था। ये घटना कमोबेश वैसी ही है, जैसे अदालत ने अयोध्या में विवादित राम मन्दिर का ताला खुलवा दिया था। तब संघ-बीजेपी हालात को भुनाने वाली दशा में थे। लेकिन अभी माज़रा बिल्कुल उल्टा है। तभी तो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने दलित समाज में भारी आक्रोश पैदा कर दिया। उसका असर सड़कों पर भी दिखा। लेकिन सवर्ण ख़ुश थे, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने SC-ST Act के उस एकपक्षीय प्रावधान को ख़त्म दिया, जिसे लेकर संघ परिवार दशकों से सवर्णों को बरगलाता आ रहा था।

आरक्षण की आड़ में सवर्णों को बरगलाने का काम, कालान्तर में सपोलों को पालने जैसा साबित हुआ। क्योंकि सपोले अब जहरीले साँप बन चुके हैं। वो ख़ुद को ठगा-ठगा महसूस कर रहे हैं। उन्हें अब साफ़ दिख रहा है कि संघ-बीजेपी ने उन्हें उल्लू बनाया है। ये भी आरक्षण को क़ायम ही रखेंगे। सवर्णों को कोई ये बताने वाला नहीं है कि भारतीय संविधान एक समता मूलक समाज के निर्माण की कल्पना करता है। कमज़ोरों को आगे लाये बग़ैर ये हो नहीं सकता। आरक्षण में भले ही कुछ ख़ामियाँ हों, लेकिन इसने समाज में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभायी है। दूसरी ओर, योग्यता की दुहाई देने वाले सवर्णों के चतुर्दिक भ्रष्ट और देश विरोधी आचरण की असंख्य कहानियों ने साबित कर दिया कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ज़्यादा अंक पाने वाले अथवा ज़्यादा योग्य लोग वाकई में ज़्यादा उम्दा हैं।

किसी ने भी सवर्णों को ये समझाने की कोशिश नहीं है कि आरक्षण के बावजूद उसके हिस्से में उनकी आबादी के मुकाबले दोगुना ज़्यादा अवसर आ रहे हैं। देश में सवर्णों की आबादी 25 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। लेकिन उनके लिए 50 फ़ीसदी अवसरों को पाने का मौका है। क्योंकि इन्दिरा साहनी वाले फ़ैसले के अनुसार, आरक्षण 50 फ़ीसदी से अधिक नहीं हो सकता। कोई सवर्णों को बताने वाला नहीं है कि यदि उनका वास्ता गला-काट प्रतिस्पर्धा से पड़ता है तो सिर्फ़ इसीलिए कि बढ़ती आबादी के हिसाब से शिक्षा और रोज़गार के अवसर नहीं बढ़ पाये हैं। इसके लिए जितने निवेश और जैसे प्रयास की आवश्यकता है, वो दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

उधर, जनता को भी सरकारें बदलने के बावजूद अवसरों की जो किल्लत झेलनी पड़ती है, उसमें भाई-भतीजावाद, पक्षपात और भ्रष्टाचार सभी कुछ बना रहता है। अभाव की यही अन्ततः हमारे चुनावों को जाति आधारित बना देती है। जाति के नाम पर टिकट बँटते हैं और जाति के नाम के नाम पर ध्रुवीकरण होता है। विकास, ग़रीबी, किसान, मज़दूर, सर्वहारा, पूँजीपति सब नेपथ्य में जा पहुँचते हैं। संघ-बीजेपी के पास भी ध्रुवीकरण का कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसीलिए, ये हिन्दू के नाम पर लामबन्दी चाहता है, क्योंकि देश में 80 प्रतिशत हिन्दू हैं।

(जारी है…)

पढ़ें, लेख का दूसरा और अन्तिम भागहे सवर्णोंयदि SC-ST Act ग़लत होता तो 83% अनारक्षित सांसद उसे क्यों पास करते!