संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अब 2019 के जनादेश की आहट साफ़ सुनायी दे रही है। सवा सौ करोड़ भारतवासियों की तरह इन्हें भी भगवा राज का पतन स्पष्ट दिख रहा है। इनके हाथों से सत्ता वैसे ही सरक रही है, जैसे मुट्ठी से सरकती रेत। अपनी आँखों के सामने अपने क़िले को ढहता देख भागवत-मोदी-शाह जैसे भगवा ख़ानदान के शीर्ष नेताओं का मानसिक सन्तुलन धोखा दे रहा है। इसीलिए, आख़िरी विकल्प के रूप में संघियों ने ‘हिन्दू-मुस्लिम नफ़रत’ को हवा देने की रणनीति बनायी है। यही वजह है कि शिकागो में चल रहे दूसरे विश्व हिन्दू काँग्रेस में ‘लव जिहाद’ को हिन्दुओं के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया गया।

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New Delhi | November 23, 2014:: The three-day World Hindu Congress Function.

सम्मेलन में धूर्त संघियों ने 49 साल पहले, 27 दिसम्बर 1969 को हुई शर्मिला टैगोर की शादी को ‘लव जिहाद’ की मिसाल बताया गया। मोहन भागवत की मौजूदगी में शर्मिला की तस्वीरें दिखाकर कहा गया कि ‘मंसूर अली ख़ान पटौदी से शादी करके शर्मिला को इस्लाम अपनाना पड़ा। उनका नाम आयशा सुल्तान हो गया। उनके बच्चों के अरबी नाम रखे गये, जिनकी परवरिश मुसलमान की तरह हुई। शैफ़-करीना की शादी भी ‘लव जिहाद’ है।’ अब आप सोचें कि शर्मिला की शादी से ‘हिन्दू हितों के सत्यानाश’ की चिन्ता किसे और क्यों खाये जा रही है? ‘लव जिहाद’ से जिन संघियों का ख़ून खौलता है, उनकी दलील है कि यदि कोई धर्म पसन्द है तो धर्म-परिवर्तन पर आपत्ति नहीं है। लेकिन शादी के लिए धर्म परिवर्तन करना ग़लत है।

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RSS Chicago बैठक में Nawab Pataudi – Sharmila Tagore की Marriage को बताया Love Jihad

‘जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा’ का नारा देने वाले संघियों के प्रमुख मोहन भागवत ने हिन्दुओं से एकजुट होकर मानव कल्याण के लिए काम करने की अपील की। हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि मानव कल्याण में ‘लव जिहाद’ कैसे बाधा पहुँचाता है? भागवत ने दावा किया कि “हिन्दुओं में सबसे ज़्यादा प्रतिभावान लोग हैं। लेकिन वो कभी साथ नहीं आते। हिन्दुओं का साथ आना, अपने आप में ही मुश्किल है। हज़ारों वर्षों से हिन्दू प्रताड़ित हैं क्योंकि वो अपने मूल सिद्धान्तों और आध्यात्मिकता को भूल गये हैं।” हिन्दुओं की एकता की दुहाई देते हुए भागवत ने ये मूर्खतापूर्ण दलील भी दी कि “शेर अकेला हो तो उसे जंगली कुत्ते भी घेरकर हरा सकते हैं!” धूर्तज्ञ भागवत को अब ये भला कौन बताये कि ‘शेर कभी झुंड में नहीं रहते!’

विश्व हिन्दू काँग्रेस के पीछे संघ समर्थित विश्व हिन्दू परिषद है। मोदी सरकार बनने के बाद इसका पहला सम्मेलन नवम्बर 2014 में दिल्ली में हुआ था। तभी तय हुआ कि दूसरा आयोजन उस शिकागो में होगा जहाँ 11 सितम्बर 1893 में स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म संसद में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया था। लेकिन 125 साल पहले विवेकानन्द ने जिस हिन्दुत्व की व्याख्या की थी, उसमें प्रेम-करुणा, भाईचारा और सहिष्णुता को हिन्दू धर्म यानी सनातन की सबसे बड़ी विशेषता बताया गया था। लेकिन विवेकानन्द के उस भाषण के 33 साल बाद पैदा हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस हिन्दुत्व को हवा दी, वो असली हिन्दुत्व का बिल्कुल उल्टा है। यही वजह है कि आज ज़्यादातर हिन्दुओं को पता ही नहीं है कि वास्तव में हिन्दुत्व है क्या!

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एक ‘प्रतिभावान’ लेकिन दिग्भ्रमित हिन्दू हैं। संघ की मंशा के मुताबिक़, वो भी हिन्दुओं को हज़ारों साल पीछे ही पहुँचाने पर आमादा हैं। तभी तो 60 देशों से शिकागो पहुँचे हिन्दू प्रतिनिधियों को मोदी का सन्देश दिया गया कि ‘प्राचीन महाकाव्यों और शास्त्रों को डिज़िटल स्वरूप में लाने से युवा पीढ़ी उनके साथ बेहतर तरीके से जुड़ सकेगी। यह आगामी पीढ़ियों के लिए महान सेवा होगी। क्योंकि हिन्दू दर्शन की बदौलत हम दुनिया की अनेक समस्याएँ हल कर सकते हैं।’ अब ये जानना ज़रूरी है कि चाहे मोहन भागवत हों या नरेन्द्र मोदी, किसी ने भी हिन्दुओं पर गहराये सबसे बड़े ख़तरे यानी ‘लव जिहाद’ की बात नहीं छेड़ी तो फिर संघ के टुटपुजिये नेताओं की हिम्मत कैसे हुई कि वो हिन्दुओं पर छाये संकट की दुहाई दें?

दरअसल, संघ की ख़ासियत ही यही है कि वो विवादों को हवा देते वक़्त किसी तार्किकता से नहीं सोचता। उसके पास दोमुँही बातें बनाने वाली और अफ़वाहें फ़ैलाने वाली मन्दबुद्धि हिन्दुओं की विशाल फौज़ है। सोशल मीडिया पर दिखने वाले भक्त या संघी ट्रोल्स तो अभी पैदा हुए हैं, इनकी पिछली पीढ़ियों का क़माल तो अद्भुत रहा है! युवा पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा की कैसे गुरुवार, 21 सितम्बर 1995 को संघियों ने पूरे भारत में गणेशजी को दूध पिला दिया था! तब आधी दुनिया सो रही थी, इसीलिए वहाँ के गणेशजी ने अगले दिन यानी शुक्रवार को दूध पीकर दिखाया था! ‘लव जिहाद’, ‘तीन तलाक’ और ‘निक़ाह हलाला’ जैसा खेल तो अपेक्षाकृत नया है। राम मन्दिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता तो संघ-बीजेपी का पुराना एजेंडा रहा है। सत्ता में आने के बाद इसकी सिर्फ़ बातें ही रह जाती हैं।

करोड़ों लोगों से जुड़े संघ में मुट्ठी भर भी मुसलमान नहीं हैं। संघ की विचारधारा हमेशा से मुस्लिम विरोधी रही है। संघ की स्थायी विचारधारा है कि क़रीब 80 फ़ीसदी हिन्दुओं को 20 फ़ीसदी मुसलमानों का डर दिखाते रहो। डर होगा, तभी नफ़रत होगी। नफ़रत बढ़ेगी तो हिन्दू एकजुट होकर उसकी छतरी के नीचे आने के लिए मज़बूर होंगे। तभी तो ‘लव जिहाद’ की बातें करके आम लोगों में नफ़रत फैलाने वालों की पार्टी में मौजूद ख़ास लोग बाक़ायदा ‘लव जिहादी’ बनकर आते हैं और ख़ूब फलते-फूलते हैं। मोदी सरकार में अभी दो ‘लव जिहादी’ मंत्रीपद के मज़े लूट रहे हैं।

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Mukhtar Abbas Naqvi and Seema Naqvi

केन्द्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने 3 जून 1983 को सीमा नामक हिन्दू युवती को अपनी जीवन संगिनी बनाया। उनके बेटे का नाम अरशद है। केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे (मोबाशर जावेद) अकबर ने 1975 में मल्लिका जोसेफ़ से शादी की। दोनों की बेटी का नाम मुकुलिका अकबर और प्रयाग अकबर है। वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे शाहनवाज़ हुसैन ने 12 दिसम्बर 1994 को रेनू शर्मा के साथ शादी की। इनसे पहले बीजेपी में लम्बी पारी खेल चुके सिकन्दर बख़्त भी क्या लव जिहादी नहीं थे, जिन्होंने 25 मई 1952 को राज शर्मा नामक हिन्दू महिला से शादी की थी? बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने ईसाई महिला जेसिस जॉर्ज से शादी की, तब कौन सा ‘लव जिहाद’ हुआ था? सुब्रमण्यम स्वामी की बेटी सुहाषिनी हैदर ने भी तो मुसलमान से शादी की। क्या वो ‘लव जिहाद’ था? ऐसे कितने ही उदाहरण हैं। ये तो सिर्फ़ भगवा ख़ानदान से जुड़े चुनिन्दा उदाहरण हैं।

बहरहाल, जगज़ाहिर है कि भारतीय संस्कृति और हिन्दू हितों की रक्षा के नाम पर संघ-बीजेपी से जुड़ा भगवा ख़ानदान, ‘लव जिहाद’ की बातें करके नफ़रत फैलाता है। इसी चिन्तन को हवा देने के लिए संघ-समर्थित संगठनों की ओर से ‘एंटी रोमियो और एंटी वेलेन्टाइन’ वाली बातें की जाती हैं। ये दोनों ही बातें भारतीय संविधान और इसके तहत बनाये गये क़ायदे-क़ानून के ख़िलाफ़ है। यदि क़ानून-विरोधी रवैया देश-द्रोह है तो क्या संघ ‘लव जिहाद’ का ज़हर फैलाकर राष्ट्र-प्रेम दिखा सकता है? क्या संघ को ये मालूम नहीं कि भारत में अन्तर-धार्मिक और अन्तर-जातीय विवाह करने की पूरी छूट हरेक नागरिक को हासिल है!

संघियों को पता है कि भारत में सभी धर्मों के लोगों के लिए जहाँ उनके पर्सनल लॉ हैं, वहीं धर्म और जाति की दीवारों को तोड़कर शादियाँ करने वालों के लिए सिविल मैरिज़ लॉ है। इसका स्पेशल मैरिज़ एक्ट 1954, जम्मू-कश्मीर के सिवाय देश भर में लागू है। वैसे तो ये क़ानून अपने मौजूदा अवतार में 1 जनवरी 1955 से लागू है, लेकिन उससे पहले अँग्रेज़ों ने 1872 में ही लिखित क़ानून बनाकर सिविल मैरिज़ को मान्यता दे दी थी। उधर, ये भी सच है कि आज भी जाति और धर्म की दीवारों को तोड़कर घर-बसाने वालों की संख्या, भारत में सालाना होने वाली 1 करोड़ शादियों के मुकाबले नगण्य ही है।

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लिहाज़ा, यदि संघ-बीजेपी की मंशा वास्तव में हिन्दू-हितों की रक्षा की ख़ातिर ‘लव जिहाद’ को रोकने की है तो फिर उन्हें स्पेशल मैरिज़ एक्ट 1954 को ख़त्म करने का ऐलान करना चाहिए। संसद इस काम को सामान्य बहुमत से कर सकती है। बीजेपी और मोदी सरकार के पास इसके लिए पर्याप्त बहुमत है। ‘लव जिहाद’ के नाम पर नफ़रत फैलाने वाले संघियों को ऐलान करना चाहिए कि नेहरूकालीन ‘स्पेशल मैरिज़ एक्ट’ की वजह से नरेन्द्र मोदी का ‘विकास’ लापता हो चुका है, अर्थव्यवस्था का सत्यानाश हो चुका है, ‘अच्छे दिन’ सिर्फ़ चौकीदार के दोस्तों के आये, आम जनता पेट्रोल-डीज़ल और रुपये के दाम को लेकर हाहाकार कर रही है।

इसीलिए, है हिम्मत तो ‘लव जिहाद’ के नाम पर विधवा-विलाप करने के बजाय समस्या की जड़ पर हमला करो। स्पेशल मैरिज़ एक्ट को ख़त्म करो। 2019 के चुनाव घोषणापत्र में इसका ऐलान करो। तभी तो ‘न रहेगा बाँस और ना बजेगी बाँसुरी!’ दरअसल, संघ परिवार, जिन मन्दबुद्धि और मनुवादी हिन्दुओं की राजनीति करता है, उसे अन्तर-जातीय और अन्तर-धार्मिक विवाहों के बढ़ते चलन से सामाजिक तौर पर भारी चुनौती मिल रही है। ऐसी शादियाँ जातिवाद तो तोड़ती हैं, धर्म-निरपेक्षता को बढ़ावा देती हैं, मानवता को सर्वोपरि बनाती हैं और धार्मिक आडम्बरों को तोड़ती हैं। संघ को ऐसी प्रगतिशीलता बर्दाश्त नहीं है, क्योंकि इससे उसकी विचारधारा खोखली साबित होती है।