पूरी मानवता के लिए कितना ख़ुशगवार है कि आज न्यूटन, आर्किमीडीज़, कॉपरनिकस, फ्लेमिंग, ओह्म या आर्यभट्ट और मिहिरभट्ट जैसे वैज्ञानिक ज़िन्दा नहीं हैं, वर्ना सारे के सारे एक साथ चिता सजाकर जौहर कर लेते! क्योंकि, आज से पहले कभी मानव समाज के ज्ञात इतिहास में किसी माई के लाल ने इतना युगान्तरकारी अनुसंधान या रहस्योद्घाटन या शोध या आविष्कार नहीं कर पाया जैसा क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने चुटकियों में करके दिखा गया! सवा सौ करोड़ भारतवासियों को इस धूर्तज्ञ राजनेता का चिर-आभारी रहना रहना चाहिए।

अमित शाह जैसे पतित-धर्मात्मा की अन्तिम इच्छा के मुताबिक़, अगले 50 साल तक विश्व-गुरु भारत की क़मान भी फ़ौरन रविशंकर प्रसाद के हवाले कर देनी चाहिए। नरेन्द्र मोदी को तो उनके पिछले बयानों को देखते हुए फ़ौरन कारागार में ठूँस देना चाहिए। उससे पहले मोदी को हिन्दू न्याय विधान के मुताबिक, चौराहे पर खड़ा करके 101 कोड़े खाने का दंड भी देना चाहिए। अब सवाल ये है कि रविशंकर प्रसाद ने 10 सितम्बर 2018 को ही ये क्यों बताया कि “पेट्रोल की क़ीमत पर काबू पाना सरकार का काम नहीं है।”

इतनी बड़ी सच्चाई को देश से छिपाकर क़ानून मंत्री ने सारी नैतिकता और नियम-विधान की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी हैं। उन्होंने उस दिन क्यों नहीं बोला था, जब मोदी देश में झूठ फैला रहे थे कि वो नसीबवाले हैं। 2014 में पेट्रोलियम की क़ीमतें उस करमजले की क़िस्मत की वजह से नहीं बल्कि दैवीय कृपा की वजह से हो रही थी। तब हिन्दुओं के करोड़ों देवी-देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की तो दाम कम हो गये थे, जबकि अभी वही देवतागण मोदी राज की अराजकता और अत्याचारों से इतने आहत हैं कि वो श्राप दे रहे हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों के नाम ऊपर से ऊपर ही चढ़ते जाएँगे।

मुमकिन है कि कुछ तर्कशील, अनीश्वरवादी या वामियों को लगे कि संवैधानिक पद के गौरवशाली प्रतीक, श्रीमान रविशंकर प्रसाद जी ग़लतबयानी नहीं कर सकते। उनका स्वभाव ही नहीं है कि वो सियासी रोटियाँ सेंकने की चेष्टा भी करें। इसीलिए ये बिल्कुल सही है कि “पेट्रोल की क़ीमत पर काबू पाना सरकार का काम नहीं है।” दिलचस्प बात ये है कि विपक्ष में रहकर इसी रविशंकर प्रसाद ने 2013 में देश को ग़ुमराह किया था कि पेट्रोल की क़ीमतें मनमोहन सिंह बढ़ाते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि मनमोहन सिंह के पास कोई ऐसी जादुई चाभी है, जिससे वो चुपके-चुपके पेट्रोल-डीज़ल, रसोई गैस को लगातार महँगा किये जा रहे हैं। अगर उस ज़माने में सरकार के पास कोई चाभी थी तो अभी क्यों नहीं है?

मनमोहन सिंह जैसे सज्जन व्यक्ति ने नरेन्द्र मोदी की पीठ में छुरा घोंपने की रणनीति क्या तभी बना ली थी, जब नरेन्द्र मोदी, अपने चहेते दोस्त नवाज़ शरीफ़ की मौजूदगी में राष्ट्रपति भवन परिसर में आयोजित पहले सरकारी ब्रॉन्डिंग शो में पद और गोपनीयता की शपथ लेने वाले थे? क्या काँग्रेस, सोनिया, राहुल और विपक्ष के तमाम अवांछनीय नेताओं को मालूम है कि मनमोहन सिंह के पास कोई जादुई चाभी है? क्या अन्य काँग्रेसी सरकारों के पास भी ऐसी ही जादुई चाभी हुआ करती थी? न जाने कैसे विपक्षी दलों के ‘फ्लॉप भारत बन्द’ ने रविशंकर प्रसाद जैसे त्रिकालदर्शी राजनेता को इतने बड़े राज़ को बेनक़ाब करने के लिए मज़बूर कर दिया कि “पेट्रोल की क़ीमत पर काबू पाना सरकार का काम नहीं है।” इस बात की तो संयुक्त संसदीय समिति से जाँच भी नहीं करवायी जा सकती, क्योंकि मोदी सरकार के इससे वैसी ही नफ़रत है, जैसे संघ को मुसलमानों से है!