2013 के उत्तरार्ध से लेकर नोटबन्दी वाली महा-मनहूस रात तक किसने सोचा था कि ख़ुद को फ़क़ीर बताने वाला चौकीदार नरेन्द्र मोदी का चेहरा इस क़दर बेनक़ाब हो जाएगा कि उन्हें ‘चोर’ कहा जाएगा! ख़ुद को ग़रीब चाय वाले की औलाद बताने वाले के बारे में किसने सोचा था कि वो भारत के किसी भी प्रधानमंत्री से ज़्यादा झूठा, बेईमान, फ़रेबी, मक्कार और जुमलेबाज़ साबित होगा! किसने सोचा था कि गुजरात मॉडल वाला फ़र्ज़ी विकास दिल्ली पहुँचते खूँखार जंगली भेड़िया में तब्दील हो जाएगा! किसने सोचा था कि भारत माता की कसमें खाकर राजनीति के शिखर पर पहुँचा उसका ही एक अंश जननी-जन्मभूमि को लहू-लुहान करके छोड़ेगा! किसने सोचा था कि ग़रीबों, किसानों और महिलाओं की गरिमा के लिए आहें भरने वाला धरतीपुत्र जब सवा सौ करोड़ भारतवासियों का मुखिया बनेगा तो उसके ख़िलाफ़ नारा लगेगा कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’

किसने सोचा था कि कालेधन के ख़िलाफ़ जिहाद यानी धर्मयुद्ध का शंखनाद करने वाला युगपुरुष सत्ता पाते ही लाखों करोड़ रुपये वाले नोटबन्दी घोटाले की पटकथा लिखने लगेगा! किसने सोचा था कि भारत के ख़ज़ाने को लूटेरों के पंजे से बचाने की दुहाई देने वाला अपने चहेते दोस्तों से ही देश के सरकारी बैंकों को लुटवा देगा! किसने सोचा था कि ख़ुद को गंगा पुत्र बताने वाला फ़रेबी भारतीय सेना के लिए ख़रीदे जाने वाले राफ़ेल विमानों का इतना बड़ा दलाल निकलेगा, जिससे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ! किसने सोचा था कि बचपन में मगरमच्छ के बच्चों को पकड़कर उनसे खेलने वाला और ख़ुद को अनपढ़ बताने वाला इतना बड़ा जालसाज़ निकलेगा जिसके पास न सिर्फ़ बीए-एमए की फ़र्ज़ी डिग्रियाँ होंगी, बल्कि जिसकी जन्मतिथि में भी गड़बड़झाला होगा!

MODI  इस नारे का मतलब क्या कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’ MODI

किसने सोचा था कि पेट्रोलियम के दाम को लेकर ख़ुद को नसीबवाला बताने वाला राजनेता इतना पतित साबित होगा कि उसकी नाक के नीचे पेट्रोल-डीज़ल रोज़ाना इतिहास रचने लगेंगे! किसने सोचा था कि रुपये के गिरते दाम पर घड़ियाली आँसू बहाने वाला एक दिन इतना बेदर्द हो जाएगा कि रुपये को अपनी किस्मत पर भी शर्म आ लगे! किसने सोचा था कि रुपये के दाम को अर्थव्यवस्था की नब्ज़ बताने वाली के सोच रुपये से भी ज़्यादा गिर जाएगी! किसने सोचा था कि ख़ुद को जनता का प्रधानसेवक और लोकतंत्र का पहरेदार बताने वाले की नाक के नीचे देश की न्यायपालिका को, उसकी संवैधानिक संस्थाओं को पतन का ऐसा रूप देखना पड़ेगा जहाँ वो मुंसिफ़ इन्साफ़ माँगते नज़र आएँगे, जो ख़ुद इन्सान करने की जगह पर बैठे हों! किसने सोचा था कि दुनिया के सबसे वाचाल जननायक की मुँह पर तब भी ताला ही जड़ा रहेगा, जबकि उसे लेकर ये नारा लगेगा कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’

क्या ये सभी उदाहरण चीख़-चीख़कर नहीं बता रहे कि 2014 में सवा सौ करोड़ भारतवासियों के साथ बहुत भयंकर धोखा हुआ था? यदि आप इस धोखे की जड़ में जाना चाहते हैं तो आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और लाल कृष्ण आडवाणी को कभी माफ़ नहीं करना चाहिए! क्योंकि नरेन्द्र मोदी का जन्म किसी भी परिस्थिति में हुआ हो, लेकिन उन्हें दीक्षित और संस्कारित करने का काम संघ ने किया था। लिहाज़ा, अपने ख़राब उत्पाद के लिए संघ की जबाबदेही तो बनती ही है। देश की बीते साढ़े चार साल में जो दुर्दशा हुई है उसके लिए दूसरे कसूरवार लाल कृष्ण आडवाणी हैं। आडवाणी ने ही इस आस्तीन के साँप को पाला-पोसा और उसे गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया। आडवाणी ने ही इस आपराधिक प्रवृत्ति वाले, कट्टरपन्थी हिन्दुत्व के समर्थक को गुजरात के दंगों के वक़्त अभयदान दिया। हालाँकि, इस शख़्स ने आडवाणी को उनके कर्मों की सज़ा देने में कोई कसर नहीं रखी। उन्हें और उनके कई क़रीबी तथा अनुभवी साथियों को इसी धूर्तज्ञ ने चलता-फिरता एनपीए या खंडहर बना दिया।

तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष ने 8 जून 2013 को न जाने किस मनहूस घड़ी में ये ऐलान किया था कि 2014 के आम चुनाव के लिए नरेन्द्र मोदी उनकी पार्टी की प्रचार समिति के मुखिया होंगे। ये ऐलान मोदी को सिर्फ़ मुख्य प्रचारकर्ता के रूप में पेश करने का था, प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नहीं। वो बात अलग है कि जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते गये, वैसे-वैसे मोदी को लेकर बनाये जा रहे माहौल ने रंग लाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते संघियों ने मोदी को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर पेश किया। मोदी ने 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की सरकार तो बना दी, लेकिन इसके लिए इतना झूठ और दुष्प्रचार किया गया, जिसने भारत को भारी नुकसान पहुँचाया। नुकसान के वो बीज अब हमारे सामने किसी बड़े पेड़ की तरह खड़ा है!

Rafale Deal Facts  इस नारे का मतलब क्या कि ‘ग़ली-ग़ली में शोर है, चौकीदार चोर है!’ Rafale Deal Facts

वही पेड़ आज देश की ऐसी नाक कटवा रहा है कि फ़्राँस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रास्वां ओलांद ने सारी दुनिया को बता दिया कि भारत का चौकीदार चोर है! उसने राफ़ेल सौदे की आड़ में देश को लूटा है, जनता को ग़ुमराह किया है, अपने उद्योगपति दोस्त को नाजायज़ फ़ायदा पहुँचाने के लिए प्रतिष्ठित सरकारी कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हितों पर कुठाराघात किया है। इसीलिए आज यक्ष प्रश्न ये है कि अब ये कैसे तय होगा कि मोदी सरकार, फ़्राँस सरकार, डसॉल्ट एविएशन और रिलायन्स डिफ़ेंस, चारों मिलकर झूठ पर झूठ नहीं बोल रहे हैं? क्या विडम्बना नहीं है कि अभी सच बोलने का दावा कर रहे सारे लोग विपक्ष में हैं तो झूठ फैलाकर सच पर पर्दा डालने वाले सारे लाभार्थी सत्ता में है! दोनों का नतीज़ा या मतलब एक ही है!

सारी दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होता कि कोई अपराधी कहे कि वो निर्दोष है और उसे पाक-साफ़ मान लिया जाए। ख़ुद मोदी सरकार ने भी जिनके-जिनके ख़िलाफ़ सच्ची या झूठी कार्रवाई की, क्या उन्हें जाँच और अदालती प्रक्रिया के बग़ैर अपराधी मान लिया गया? क्या कभी किसी अपराधी ने आरोप लगाये जाते ही ख़ुद को क़सूरवार बताते हुए क़ानून के हवाले किया है? अरे, क़ानून तो ये कहता है कि यदि कोई व्यक्ति ख़ुद भी अपराधी होने का ऐलान कर दे, तो भी उसे जाँच और सबूतों के बग़ैर अपराधी नहीं माना जा सकता, सज़ा नहीं दी जा सकती! मोदी सरकार ने तमाम काँग्रेसी नेताओं पर आरोप मढ़े, लेकिन क्या किसी को जाँच के बग़ैर सज़ा दे दी?

क़ानून की परिभाषा में किसी का आरोपी होना ये नहीं साबित करता कि वो दोषी है। मोदी भी फ़िलहाल वैसे ही आरोपी हैं, जैसे कि राहुल गाँधी! राहुल के मामले में कम से कम क़ानूनी कार्रवाई तो हुई, लेकिन मोदी तो ये माने बैठे हैं कि चूँकि वो प्रधानमंत्री हैं, इसीलिए सिर्फ़ वही और उनकी पार्टी ही सच बोल सकती है। क्या 2014 में जनता ने सिर्फ़ बीजेपी और मोदी को ही सत्यवादी हरिश्चन्द्र बनने का ठेका दिया था? यदि नहीं, तो दूध का दूध और पानी का पानी कैसे होगा? कौन करेगा? कब करेगा? क्या इन सवालों का उत्तर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ तलाश कर पाएँगी या फिर सीधे जनता जर्नादन को ही आगामी चुनावों में अपने जनादेश के रूप में फ़ैसला सुनाना पड़ेगा?

अरे, वक़्त का तगाज़ा तो ये होना चाहिए कि मोदी और उनके बचाव में एक से बढ़कर एक झूठ बोलने वाले मंत्री अपने पदों से इस्तीफ़ा देकर जाँच का सामना करते। यही वक़्त है कि भगवा ख़ानदान की नैतिकता के सबसे बड़े सचेतक तथा संघ प्रमुख मोहन भागवत को ऐलान करने चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के उच्च आदर्शों की स्थापना के लिए मोदी को फ़ौरन पद त्यागकर जाँच करवानी चाहिए! सवाल है कि क्या अग्निपरीक्षा सिर्फ़ सीता की ही होगी? चोर चौकीदार, क्या रामनामी ओढ़कर, ख़ुद को रामज़ादा बताकर, नंगा नाच ही करते रहेंगे? क्या ये सभी विधि-विधान और लोकलाज़ से ऊपर हैं?