अयोध्या विवाद के सिलसिले में 27 सितम्बर 2018 को आये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में बस एक ही बात काम की है कि ‘हरेक मामला अपने आप में अलग होता है!’ क़ानूनी तौर पर भी पूरे फ़ैसले में बस, यही एक लाइन की बात पते की है। बाक़ी सारी बातें फ़िज़ूल हैं। इस ‘एक लाइन’ का भी बस, एक ही व्यावहारिक मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ठान लिया है कि फ़िलहाल, वो अयोध्या विवाद पर जल्द से जल्द अपना फ़ैसला सुनाना चाहता है। वो पहले ही कह चुका है कि उसकी नज़र में सारा मामला ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है। यानी, अब सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ़ इतना तय करना है कि अयोध्या की विवादित ज़मीन के बारे में 2010 में दिया गया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला सही है या नहीं और कैसे?

फ़ैसले का मतलब ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि वो अब नये सिरे से इस सवाल में नहीं उलझना चाहेगा कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं? इस सवाल के जबाब में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ इतना कहा है कि वो 1994 के इस्माइल फ़ारूक़ी वाले फ़ैसले पर पुनर्विचार करने के पक्ष में नहीं है। क्योंकि वो मुकदमा एक मस्जिद की ‘ज़मीन के अधिग्रहण’ से सम्बन्धित था, जबकि मौजूदा मामला ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है।

इसका एक मतलब ये भी हुआ कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या की विवादित ज़मीन को लेकर 2010 में अपना फ़ैसला देते वक़्त 1994 वाले सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ के जिस फ़ैसले का सहारा लिया था, उसके सभी सन्दर्भों को सुप्रीम कोर्ट ने अभी से ख़ारिज़ कर दिया है। 1994 के इसी फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। यानी, ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ पर फ़ैसला सुनाते वक़्त सुप्रीम कोर्ट 1994 वाले फ़ैसले से प्रभावित नहीं होना चाहता क्योंकि 1994 वाला फ़ैसला ‘ज़मीन के अधिग्रहण’ से सम्बन्धित था।

सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला अघोषित तौर पर ये भी कहना चाहता है कि यदि किसी की ये आस्था हो भी कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लामिक है तो भी उसकी इस आस्था से फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट कोई वास्ता नहीं रखना चाहता। इसे दूसरे शब्दों में यूँ भी कहा जा सकता है कि अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही इस आधार पर बढ़ेगी कि वो विवादित ज़मीन में किसी भी पक्ष की आस्था का कोई भी अंश नहीं देखना चाहता! यानी, सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ़ ये तय करना है कि विवादित ज़मीन किसकी है! असली मुकदमा भी यही है। इसका मतलब ये हुआ कि सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद को रामजन्मभूमि की अदृश्य आस्था से जोड़कर नहीं देखना चाहता।

इन दलीलों का निहितार्थ ये निकलता है कि कल को जब सुप्रीम कोर्ट अपना अन्तिम फ़ैसला सुनाये तो कोई भी पक्ष उसे अपनी धार्मिक आस्थाओं के साथ जोड़कर पेश नहीं कर सके, क्योंकि झगड़ा सिर्फ़ ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है! अब कल्पना कीजिए कि यदि विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अन्ततः ये फ़ैसला दिया कि ज़मीन हिन्दुओं की नहीं है तो क्या मन्दिर के नाम पर आधी सदी से उन्माद फ़ैलाने वाले लोग सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का आदर करके उसे सिर-माथे पर रखने के लिए तैयार होंगे? यदि हाँ, तो वो दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे गौरवशाली होगा। और यदि नहीं, तो उसी दिन से भारतवर्ष में उन्माद और उत्पात का नया युग शुरू होगा! इसीलिए ये वक़्त की माँग है कि हिन्दू हितों के सबसे बड़े शुभचिन्तक होने का दावा करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत अभी से ही इस बात का ऐलान कर दें कि भारत माता की इज़्ज़त की ख़ातिर, ‘युक्त भारत’ बनाने की ख़ातिर भगवा ख़ानदान का हरेक व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करेगा। हालाँकि, काश! भागवत ऐसा कर पाते!

अगली बात ये है कि चाहे लोकतंत्र हो या राजशाही या कोई भी शासन प्रणाली, हरेक राजसत्ता के पास अपने सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार (Integral Territory) में किसी भी ज़मीन का अधिग्रहण करने का सर्वोपरि अधिकार होता है। भारत में भी ऐसा ही है। हमारी सरकार पर ऐसा कोई अंकुश नहीं है कि वो किसी ज़मीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती। देशहित में, देश की एकता और अखंडता की ख़ातिर संविधान ने सरकार को सारे अधिकार दिये हैं। वो भी पूरी निरंकुशता के साथ! इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा हर्ग़िज़ नहीं कहा कि ‘मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं?’ बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ इतना कहा है कि वो 1994 के उस फ़ैसले की समीक्षा नहीं करना चाहता, जो कह चुका है कि ‘मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है’, क्योंकि पुरानी बात ‘ज़मीन के अधिग्रहण’ के मामले में कही थी, न कि ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ के सिलसिले में!

अब ये आप पर है कि आप सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग फ़ैसलों को विरोधाभासी मानें या नहीं? यदि आप इसे विरोधाभासी मानेंगे तो आपको लगेगा कि सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला सरासर मज़ाक़ है, अदूरदर्शी और अपरिपक्व है! और, यदि आपको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताज़ा फ़ैसले में एक बेहद बुनियादी सवाल का जबाब देने के बदले पलायन का रास्ता थामा है तो इसकी वजह भी सिर्फ़ इतनी सी है कि किसे नहीं मालूम कि इस्लाम का नमाज़ और मस्जिद से वैसा ही नाता है जैसा मूर्तिपूजकों के लिए मन्दिर, आरती और प्रसाद का, जैसा गुरुद्वारा, ग्रन्थ साहब और कड़ा-परसाद का, जैसा ईसाई, चर्च और उसमें होने वाली प्रार्थना का! यही तर्क सभी धर्मों या उपासना पद्धतियों पर लागू होता है। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट को भले ही ये लगे कि उसने 2-1 के बहुमत से एक कठिन प्रश्न को हल कर लिया है, लेकिन हक़ीक़त ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक सवाल का उत्तर देने के चक्कर में कई सवालों को बेहद उलझा दिया है।

देर-सवेर आने वाली पीढ़ियाँ हमारी न्यायपालिका या शासन व्यवस्था या धार्मिक मठाधीशों से कई अहम सवालों का उत्तर ज़रूर माँगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ पुराने ज़ख़्मों को भी कुरेद दिया है! मसलन, यदि ‘मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है’ तो क्या ये तय नहीं होना चाहिए कि किस-किस धर्म की कौन-कौन सी चीज़ें उसका अभिन्न हिस्सा हैं? किन-किन बातों को उसका अभिन्न हिस्सा नहीं माना जाएगा? लगे हाथ ये भी तय होना चाहिए कि आस्था क्या है? आख़िर, इसे कैसे परिभाषित किया जाएगा? कौन सी संस्था आस्था को परिभाषित करेगी? और, कौन उसकी परिभाषा की वैधानिकता की पुष्टि करेगा?

बहरहाल, यदि अभी हम ये मान भी लें कि सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा नज़रिया के पीछे मंशा ये है कि ‘अयोध्या विवाद’ का फ़ैसला जल्द से जल्द हो सके तो भी इंसाफ़ के इस सवाल का जबाब तलाशने के लिए आँखों पर पट्टी बाँधे, एक हाथ में न्याय-तुला और दूसरे हाथ में तलवार पकड़े दिखने वाली क़ानून की देवी ने फ़िलहाल, अपनी तलवार को फेंककर ऐसी टॉर्च को थाम लिया है, जिसका करेंट लीक़ होता है! इस करेंट का दूरगामी और बेहद गहरा असर भारत की न्यायपालिका और इसकी सामाजिक संरचना पर ज़रूर पड़ेगा।