लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या की ख़बर जब से मिली, तभी से दिमाग़ में कई सवाल दिमाग़ में कौंध रहे हैं! मसलन, क्या इस हत्याकांड के लिए सिर्फ़ वो दो सिपाही ही ज़िम्मेदार हैं जिन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस बर्ख़ास्त और गिरफ़्तार कर चुकी है? क्या अख़लाक़ की हत्या के लिए भी सिर्फ़ दादरी के बिसाहड़ा गाँव की अज्ञात लेकिन उपद्रवी भीड़ ही ज़िम्मेदार थी? क्या रोहित वेमुला ही अपनी ‘हत्या’ के लिए क़सूरवार था? क्या पहलू ख़ान और रक़बर ख़ान भी अपनी मौत के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार थे? क्या नोटबन्दी के नाकाम साबित होने के लिए भी सवा सौ करोड़ भारतवासी ही ज़िम्मेदार हैं? क्या देश के बैंकों को लूटकर फ़ुर्र होने वाले नीरव-मेहुल-माल्या-ललित और नितिन संदेशरा की हरक़तों के लिए भी जनता ही ज़िम्मेदार है?

इन सवालों का जबाब यदि ‘नहीं’ है तो फिर ये भी सवाल खड़ा होता है कि आख़िर इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? किसे सज़ा मिलेगी? कौन और कब सज़ा देगा? कैसी सज़ा दी जाएगी? सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि आख़िर इन सवालों का जबाब कौन देगा! सरकार तो जबाब देने से रही। प्रधानसेवक, तो बीते साढ़े चार साल में, पिछली सरकारों से ढेरों हिसाब माँगते रहे हैं, लेकिन ख़ुद उनकी हिम्मत, कभी किसी सवाल का जबाब देने की नहीं हुई! चलिए, मान लिया कि प्रधानमंत्री के पास सवालों का जबाब नहीं है। वो सिर्फ़ अपने ‘मन ही बात’ में ही खोये रहना चाहते हैं। तो क्या देश की अन्य लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ, आम जनता के मन में उठने वाले उपरोक्त स्वभाविक सवालों का जबाब नहीं दे सकतीं!

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Utter Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath

निर्वाचित सरकार यदि बेरहम और बहरी हो जाए तो क्या देश में उसके अलावा संसद, विपक्ष, न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग, विधि आयोग वग़ैरह नहीं हैं, जो ये बता सकें कि विवेक तिवारी की हत्या सिर्फ़ ख़ाकी वर्दी के रवैये और उसकी बन्दूक ने नहीं की, बल्कि इसके लिए बाक़ायदा उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी कसूरवार हैं। आख़िर, इन सभी की बुनियादी ज़िम्मेदारी ये है कि नहीं कि हमारी पुलिस हत्यारी नहीं हो सकती? अब पुलिस तो हत्यारी साबित हो चुकी है। ख़ुद पुलिस के आला अफ़सरों ने माना है कि उनके मातहत सिपाहियों ने ही विवेक तिवारी की हत्या की है, वो भी किसी निजी रंजिश के तहत नहीं बल्कि अपने कर्त्तव्य निर्वहन यानी ड्यूटी के दौरान! तो मातहतों की ड्यूटी के दौरान की गयी हऱकतों की जबाबदेही अफ़सरों और नेताओं पर नहीं होनी चाहिए?

इन्हीं अफ़सरों ने ये भी कहा कि विवेक तिवारी एक भला आदमी था। तो क्या ये ‘भला आदमी’ भी उसी तरह मासूम नहीं था, जैसे 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ नरसंहार की भेंट चढ़ने वाले 484 लोग थे। उस दिन भी तो ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपने 90 सैनिकों के ज़रिये महज दस मिनट में 1650 गोलियाँ चलवायी थीं। वो लोग बैसाखी के मेले पर जुटे थे। जबकि विवेक तिवारी देर रात को अपनी एक सहकर्मी को उसके घर छोड़ने जा रहा था। विवेक की पत्नी कल्पना को इसके बारे में जानती थी। लेकिन जब ‘न खाऊँगा ना खाने दूँगा’ ब्रिगेड के स्वयंसेवकों ने देर रात, एक पुरुष और एक महिला को कार में बैठा देखेंगे तो क्या उन्हें उगाही के लिए अपने शिकार के सामने होने का अहसास नहीं होगा?

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Jallianwala Bagh Massacre Pic….

कौन नहीं जानता कि पुलिस रूपी जिस शिकारी के मुँह में उगाही का ख़ून लगा हो, क्या शिकार को सामने पाकर उसके मुँह में पानी नहीं आएगा? अरे वो सिपाही ही क्या, जो वर्दी में हो, ड्यूटी पर हो, हाथ में बन्दूक और लाठी लिये हो, साथ में पुलिसिया वायरलेस से लैस पेट्रोलिंग वाली बाइक हो, क्या वो इतना निखट्टू हो सकता है कि वो सामने आये शिकार को हाथ से निकल जाने दे? जी नहीं। हर्ग़िज़ नहीं! बड़े से बड़ा बैंक लुटेरा भले ही देशभक्त आला अफ़सरों के हाथों से निकल जाएँ, आतंकियों को मंत्रीजी भले ही कन्धार तक छोड़ने जाएँ, पठानकोट हवाई अड्डे पर भले ही आतंकियों के सबसे बड़े सरगना आईएसआई की ख़ातिरदारी की जाए, यूपी में वर्दी में घूमते पुलिस के शिकारियों को कोई चकमा नहीं दे सकता!

हिन्दूराष्ट्र में जो भी योगी के इन वर्दीधारी राष्ट्रभक्त सेनानियों को गच्चा देने की ज़ुर्रत करेगा, उसे विवेक तिवारी की तरह ही मार गिराया जाएगा! भले ही विवेक के पूरे परिवार और बन्धु-बान्धवों ने योगी को ताजपोशी में अपना पूरा योगदान दिया हो! विवेक की विधवा कल्पना अब चाहे जो दुहाई दे, लेकिन उसका संसार तो उजड़ ही गया! अख़लाक़, पहलू और रक़बर ने भी गौभक्तों को झाँसा देने की कोशिश की तो उन्हें क़ब्र तक पहुँचाने में कितनी देर लगी! ऐसा नहीं है कि योगी-मोदी युग से पहले उत्तर प्रदेश पुलिस के सिपाही किसी भी लिहाज़ से ‘भले आदमी’ हुआ करते थे! पिछली सरकारों में भी उन्होंने एक से बढ़कर एक कारनामे किये हैं।

अभी तो यूपी पुलिस, बस, और बिन्दास बन गयी है। आख़िर, कोई रातों-रात यूँ ही ‘एनकाउन्टर एक्सपर्ट’ नहीं बन जाता! चाणक्य ने विष-कन्या के निर्माण के लिए जितनी जुगत बतायी थी, उससे कहीं ज़्यादा कौशल दिखाकर और परिश्रम करके योगी आदित्यनाथ ने अपनी पुलिस को सरकार का सबसे बड़ा गुंडा बनाया है। यही वजह है कि जैसे ही लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी को अपने हत्यारे सिपाहियों के पराक्रम के बारे में पता चला वैसे ही उन्होंने विवेक की हत्या पर लीपापोती करवाने के लिए वैसी ही मनगढ़न्त कहानियों को रचना शुरू कर दिया, जिससे सारा मामला आतंकवादी, लव-जिहाद, अवैध सम्बन्ध, पुलिस पर हमला, भागने की कोशिश जैसी तमाम बातों में उलझ जाए।

पुलिस के लिए लीपापोती वाली अदा कभी अनोखी नहीं रही! अँग्रेज़ ही उसे सारा हुनर सिखा गये थे। आज़ादी के बाद तो पुलिस ने अपने हुनर को जमकर निख़ारा। अब वो किसी ओलम्पियन की तरह निपुण और सर्वश्रेष्ठ है। इसीलिए, ये तय करना ज़रूरी है कि आख़िर राजनीतिक नेतृत्व, होता किस लिए है? हम इन्हें क्यों चुनते हैं? राजतंत्र के ख़र्चों और नेताओं-अफ़सरों की सारी अय्याशियों का बोझ बेचारी जनता क्यों उठाती है? अफ़सर और नेता, किस लिए होते हैं? क्या इनका काम भी ‘नीचे वालों’ की लीपापोती की ही लीपापोती करना है? यदि नहीं, तो विवेक तिवारी की हत्या के लिए ये भी बराबर के गुनाहगार हैं, इनकी भी पूरी जबाबदेही बनती है, यदि हत्यारे फ़ाँसी की सज़ा के हक़दार हैं, जो उम्र-क़ैद का दंड इन्हें क्यों नहीं मिलना चाहिए?

सहज तर्क के मुताबिक, नेताओं और अफ़सरों के ख़िलाफ़ भी मुक़दमा चलना चाहिए! आख़िर, पुलिस के रवैये के पीछे जो आपराधिक साज़िश मौजूद होती है, उसका दारोमदार तमाम अफ़सरों और नेताओं पर नहीं, तो फिर किस पर है? सबको पता है कि छोटे गुनाहगारों को तो शायद देर-सबेर सज़ा मिल भी जाए, लेकिन बड़े गुनाहगारों को सज़ा देने का सारा दारोमदार चुनाव और जनादेश पर ही आकर रुकता है। ऐसे में इस्तीफ़ा माँगना भी फ़िज़ूल है! तो चलिए, 2019 की तैयारी करें। ‘अच्छे दिनों’ को विदा करें। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को बहाल करने का बीड़ा उठाएँ!