वायु सेना प्रमुख एयर चीफ़ मार्शल बीएस धनोया ने राफ़ेल सौदे को लेकर ख़ुद अपने पद की गरिमा का मज़ाक उड़ाया है! मोदी सरकार और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने धनोया से पहले यही काम वायुसेना के उपप्रमुख एयर मार्शल रघुनाथ नाम्बियार से करवाया था! सवाल उठता है कि इन नौकरशाहों से राफ़ेल सौदे को लेकर सर्टिफ़िकेट किसने माँगा है? किसने कहा है कि राफ़ेल अच्छा विमान नहीं है? किसे ये सर्टिफ़िकेट चाहिए कि राफ़ेल सौदा एक ‘बोल्ड डील’ था या नहीं? कौन कहता है कि सौदा सस्ता है और कौन इसे सबसे बड़ा घोटाला बता रहा है? कौन कहता है कि राफ़ेल सौदे में अनिल अम्बानी को निहाल किया गया? कौन कहता है कि अनिल की कम्पनी रिलायंस डिफ़ेंस को फ़ायदा पहुँचाने के लिए नवरत्न कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के हितों की बलि चढ़ायी गयी?

नौकरशाहों का काम सरकार का बचाव करना भले ही हो, लेकिन उनसे हमेशा ये अपेक्षित होता है कि वो ख़ुद को राजनीतिक जोड़-तोड़ से अलग रखेंगे। सेना के अधिकारी भी नौकरशाह ही होते हैं। उनका राजनीति से दूर रहना बेहद ज़रूरी है। वर्ना, देश की धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में होगी। लेकिन मोदी राज में भारतवर्ष की बदकिस्मती देखिए कि हमारी सेनाओं के प्रमुख सियासी नेताओं की तरह बयानबाज़ी करके अपनी स्वामिभक्ति दिखाते हैं। थल सेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत को भी आये दिन सियासी बयान लेने की लत लगी हुई है। उन्हें भी सेना की गौरवशाली परम्परा का कोई लिहाज़ नहीं है। रावत के कुनबे में ही अब धनोया भी शामिल हो गये हैं! मुमकिन है कि दोनों की योजना फौज़ से विदाई के बाद राजनीति में अगली पारी खेलने की हो। वर्ना, सेना के अनुभवी अफ़सरों में ऐसी बीमारियाँ पहले नहीं दिखायी देती थीं!

राफ़ेल को लेकर धनोया बताते हैं कि मोदी की डील सस्ती है! लेकिन ये नहीं बताते कि कैसे सस्ती है? पहले कितने रुपये का सौदा होना था और मोदी ने कितने रुपये में सौदा पटाया! धनोया ने ये क्यों नहीं बताया कि सौदे के मसौदे पर दस्तख़त करने के बाद भारत और फ़्राँस की ओर से जारी हुए संयुक्त बयान में क्या ये नहीं लिखा है कि नयी डील भी उन्हीं विशेषताओं वाली होगी, जैसी पुरानी डील थी? क्या ये सच नहीं है कि पुरानी डील 126 विमानों के लिए तकनीकी हस्तांतरण की शर्त के साथ होनी थी, जबकि नयी डील में विमान घटकर 36 हो गये और ‘टेक्नोलॉज़ी ट्रांसफर’ का प्रावधान उड़न छू हो गया? पुरानी डील में रिलायंस का खेल नहीं था, जबकि नयी डील में खेल ही रिलायंस का है!

धनोया से पहले निर्मला सीतारमन भी एचएएल को राफ़ेल के लिए नाक़ाबिल बता चुकी हैं। अब उनकी बात में धनोया सुर से सुर मिला रहे हैं। लेकिन ऐसे, जिससे उनकी धूर्तता बेनक़ाब हो जाए। ये सही है कि एचएएल ने अपनी कई योजनाओं को निर्धारित वक़्त में पूरा नहीं किया। लेकिन कोई बताएगा कि भारतवर्ष में बीजेपी के सात-सितारा मुख्यालय को छोड़कर कब-कब और कौन-कौन सी परियोजना अपने निर्धारित वक़्त में पूरी हुई है! इसीलिए सुखोई, मिराज़, जगुआर, तेजस जैसी तमाम प्रोजेक्ट भले ही देरी से चल रहे हों, लेकिन देरी से भारत में क्या नहीं चल रहा है? क्या हथियारों की ख़रीदारी को छोड़कर सेना के किसी भी अंग से जुड़ी योजनाएँ या नीतियाँ सही वक़्त पर बनकर लागू हो रही हैं? अरे, ये किसी को बताने की ज़रूरत है क्या कि ‘हम लेट-लतीफ़ हैं!’

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हमारी संसद क्या अपनी काम सही वक़्त पर कर लेती है? न्यायपालिका क्या सही वक़्त पर इंसाफ़ कर देता है? संघ लोक सेवा आयोग क्या सही वक़्त पर ख़ाली पदों को भर देता है? क्या सीएजी का ऑडिट अपने नियत वक़्त पर हो जाता है? ये आलम तो हमारे संवैधानिक संस्थाओं का है। आगे बढ़कर देखिए कि हमारे स्कूल, अस्पताल, बिजलीघर, बाँध, नहर, सड़क, पुल, ट्रेन, बस, बिजली, पानी, क़ानून-व्यवस्था जैसी कोई भी चीज़ क्या निर्धारित वक़्त से सालों-साल की देरी से नहीं होते हैं? क्या मोदी राज के लुभावने वादे सही वक़्त पर निभाये जा रहे हैं? अरे, देश में कुछ भी निर्धारित सही वक़्त पर नहीं हो रहा तो क्या हरेक बात का ठीकरा बेचारे हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड पर ही फोड़ा जाएगा!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अच्छी तरह से पता है कि उन्होंने राफ़ेल सौदे की आड़ में भयंकर घोटाले को अंज़ाम दिया है। उनके कुकर्मों की पोल खुली चुकी है। इसीलिए वो ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करने के लिए निष्पक्ष जाँच करवाने के लिए तैयार नहीं हैं। संसदीय समिति से राफ़ेल सौदे की जाँच होगी तभी हरेक सवाल का जबाब मिल पाएगा। लेकिन मोदी सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। वजह साफ़ है, ‘चोर की दाढ़ी में तिनका!’ इसीलिए, विश्व का सबसे वाचाल नेता होने के बावजूद राफ़ेल सौदे पर मोदी के बोल नहीं फूटते जबकि उनके बचाव में बयान देने की होड़ सरकार और बीजेपी के तमाम नेताओं के बीच देखी जा चुकी है।

कौन नहीं जानता कि राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के बीच चोली-दामन का नाता है! सार्वजनिक जीवन में आरोपों के ज़रिये ही नेताओं की छवि बनती-बिगड़ती है। जनता ये तय करती है कि किसके आरोपों में कितनी जान है! संघ परिवार ने दशकों तक काँग्रेस पर भ्रष्टचार और वंशवादी होने के आरोप मढ़े, लेकिन जनता इन्हें नकारती रही और काँग्रेस को सत्ता सौंपती रही, क्योंकि उसे तरह-तरह के आरोपों पर काँग्रेस का पक्ष विश्वसनीय लगा। हालाँकि, यही आलम 2014 के चुनाव के पहले नहीं रहा, क्योंकि सीएजी ने ऐसी रिपोर्टे तैयार कर दीं, जिसे जनता ने घोटाला माना। वो बात अलग है कि बीते साढ़े चार साल में मोदी सरकार एक भी घोटाले को साबित नहीं कर सकी। उल्टा, 2जी वाले मामले में तो सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सीएजी की ऐसी किरकिरी हुई, जैसी इतिहास में पहले कभी नहीं हुई थी।

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यही वजह है कि राफ़ेल सौदे को लेकर लगे आरोपों ने मोदी सरकार को बेचैन कर रखा है। प्रधानमंत्री को साफ़ दिख रहा है कि वो ख़ुद दलदल में धँसे हुए हैं। उनका हरेक सहयोगी उन्हें दलदल से निकालने की हरेक जायज़-नाजायज़ कोशिश कर रहा है। लेकिन दलदल चीज़ ही ऐसी है कि उससे निकलने की हरेक कोशिश आपको और धँसा देगी। यही मोदी के साथ हो रहा है। जुमलेबाज़ी की बदौलत सत्ता हथियाने के लिए मोदी ने जैसे दलदल का निर्माण ख़ुद किया था, उसी दलदल को राफ़ेल सौदे से पहले नोटबन्दी, जीएसटी, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम, बेरोज़गारी, वग़ैरह ने बेतहाशा बढ़ा दिया है।

मोदी का हरेक सियासी सहयोगी जनता का नज़र में अविश्वसनीय साबित हो चुका है। अब सेना के आला अफ़सरों की भी कलई खुलती जा रही है। इसीलिए निर्मला हों या जेटली या रविशंकर या नाम्बियार या धनोया, मोदी को दलदल से कोई नहीं निकाल सकता। तभी तो उनसे पूछा जा रहा यक्ष प्रश्न अब भी यूँ का यूँ ही बरक़रार है कि ‘तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यों लूटा?’