जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा! Selection 11 05 2018 001

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसा किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! वीडियो कर्नाटक का है। मौका काँग्रेस के रोड-शो का था, और जिसे पाकिस्तान का झंडा बताया जा रहा है, वो दरअसल इस्लामिक झंडा है। ये झंडा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग़ के झंडे से मिलता जुलता भले ही लगे लेकिन है उससे अलग। आईयूएमएल के झंडा में चाँद-तारा बीच में नहीं बल्कि बायीं तरफ ऊपर की ओर है।

दिक्कत ये है कि यदि आपको गुमराह नहीं किया जाएगा कि तो टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबदेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा! Selection 11 05 2018 002

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!