#MeToo यानी दुनिया भर की उन महिलाओं की आवाज़ जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी ना कभी यौन-उत्पीड़न का दंश झेला हो और वो भी किसी नामी-गिरामी या जानी-पहचानी हस्ती की हवाले से! जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो #MeToo से अछूता हो! भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लिए यही हक़ीक़त है। वो बात अलग है, तमाम पतित करतूतों की तरह, #MeToo के तहत बेनक़ाब होने वाले लोग, भी ख़ुद को पाक-साफ़ बताने में लगे हैं! ये स्वाभाविक भी है, क्योंकि क्या कभी किसी ‘शरीफ़’ आदमी ने ये क़बूल किया है कि उसके चोले में कैसी हवस भरी हुई है!

#MeToo मुद्दे ने अभी तक देश में जैसे-जैसे रूप दिखाये हैं, उससे किसी ग़ुनहगार को फ़ौज़दारी क़ानूनों के तहत, सलाखों के पीछे पहुँचा पाना तक़रीबन नामुमकिन है। क्योंकि क़ानून को सबूत चाहिए, जो ऐसे मामलों में अक्सर होते नहीं या जो कुछ सबूत होते भी हैं वो भी किसी आरोपी को अदालत में अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाते। लेकिन इस #MeToo से हवसी मर्दों की छवि को तकड़ी चोट ज़रूर पहुँचायी जा सकती है। वो बात अलग है कि ऐसे मर्द ख़ुद को धर्मात्मा साबित करने के लिए पीड़ितों को अदालतों में घसीटेंगे और मुक़दमों का अम्बार झेल हमारी न्यायपालिका पर कुछ बोझ और बढ़ जाएगा। अब यदि हम ये मान लें कि सामाजिक व्यवस्थाएँ, क़ानूनों से कम और लोकलाज़ की धारणाओं से ज़्यादा प्रभावित होती हैं। तो #MeToo का तीर एक बार क़मान से निकलने के बाद, न तो बेकार साबित होने वाला है और ही खाली हाथ रहने वाला है! ये अपने सामान्य लक्ष्य को ज़रूर हासिल करेगा!

ये लोकलाज़ ही है जिसके आधार पर केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की ज़िन्दगी के ‘अच्छे दिन’ अब ख़त्म हो लिये। उनके ख़राब दिनों वाली घड़ी बहुत तेज़ी से भाग रही है। दस महिला पत्रकारों ने उनके हवसी स्वभाव की परतें उधेड़ दी हैं। मुमकिन है कि फ़ेहरिस्त और लम्बी होती चली जाए। इसीलिए चाल-चरित्र-चेहरा तथा भारतीय संस्कारों के सबसे प्रखर संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सियासी धड़े बीजेपी ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़े से साफ़ कर दिया है कि एमजे अकबर का बाल बाँका तक नहीं होने वाला। उन पर आलाक़मान का आशीर्वाद पहले की तरह ही बरसता रहेगा!

बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं और केन्द्रीय मंत्रियों ने तय कर लिया है कि अकबर का इस्तीफ़ा माँगने वालों के आगे ‘56 इंची गंगा पुत्र’ झुकने वाले नहीं हैं! क्योंकि पार्टी को अच्छी तरह पता है कि यदि एक बार झुके तो गये काम से! ‘इस्तीफ़ों के सर्ज़िकल हमले’ वाली नौबत आ जाएगी! कितने नेताओं के इस्तीफ़े होंगे? मुमकिन है कि इस चुनावी मौसम में बहुत सारी नारियाँ उन नेताओं को ब्लैकमेल भी करें कि ‘टिकट नहीं दिया तो #MeToo कर दूँगी!’

राजनीतिक दलों में #MeToo पीड़िताओं की भरमार है। लेकिन संघर्ष को मुकाम पर पहुँचाना बहुत मुश्किल होता है। याद है ना कि नारायण दत्त तिवारी का बेटा और बीवी बनने के लिए रोहित और उज्ज्वला शर्मा को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। वो तो ग़नीमत थी कि वैज्ञानिकों ने डीएनए तकनीक विकसित कर दी, वर्ना ईश्वर भी न्याय नहीं दिला पाते! जब डीएनए नहीं था, तब क्या किसी को कभी न्याय मिला? बेचारी कुन्ती को भी कर्ण को त्यागना पड़ा था!

मानव इतिहास का विशाल अलिखित हिस्सा #MeToo से सराबोर है! असंख्य कहानियाँ हैं! हर युग में नारियाँ शोषित होती रही हैं! नारी-देह है ही ऐसी कि पुरुषों को विचलित कर दे। बेचारी स्त्रियाँ, न तो अपने अबोध बचपन में सुरक्षित हैं और ना ही नक़ाब, हिजाब, बुर्का, घूँघट और पर्दे में! आप कहाँ से शुरू करेंगे! कहाँ पहुँचेंगे! ये तो अथाह आकाशगंगा है! सदियों से प्रवाहमान है!

यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने साफ़ कर दिया कि “देखना पड़ेगा कि यह [एमजे अकबर के ख़िलाफ़ लगे आरोप] सच हैं या ग़लत! हमें उस शख्स के पोस्ट की सत्यता जाँचनी होगी, जिसने आरोप लगाये हैं। मेरा नाम इस्तेमाल करते हुए भी, आप कुछ भी लिख सकते हैं!” अमित शाह का ये बयान जुमला नहीं है। वोट बटोरने या जनता को ग़ुमराह करने के लिए दिये जाने भाषणों की तरह सच्चाई से कोसों दूर भी नहीं है। आख़िर, बीजेपी का मुखिया ये कैसे मान लेगा कि उसके ख़ानदान में कोई ‘गन्दा व्यक्ति’ हो भी सकता है!

अकबर पर तो हवसी होने का इल्ज़ाम है, वो भी अभी पुलिस-थाने तक नहीं पहुँचा है। सिर्फ़ हवा में ही तैर रहा है। हवा में तैरती बातों को लेकर भी कहीं इस्तीफ़े होते हैं! ग़नीमत है कि अमित शाह ने अभी ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया कि ‘#MeToo के तहत हो रहे ख़ुलासे भी वैसे ही झूठे हैं, जैसे कि राफ़ेल घोटाला!’ क्योंकि वो कह रहे हैं, बीजेपी कह रही है, निर्मला कह रही हैं, जेटली कह रहे हैं, पीयूष कह रहे हैं, पात्रा तो भौंकता ही है और रविशंकर तो चीख़ते ही हैं।

एमजे अकबर का परोक्ष बचाव करने के लिए बीजेपी की तमाम महिलाएँ आगे आयीं। हालाँकि, अकबर की बॉस और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पहले दिन से ही ख़ामोशी ओढ़ रखी है। लेकिन फ़ायर ब्रॉन्ड साध्वी रहीं, केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री उमा भारती की दलील है कि “अकबर से जुड़ा मामला तब का है जब वो केन्द्र सरकार में मंत्री नहीं थे। यह मामला पूरी तरह महिला और अकबर के बीच है।” अनुभवी उमा के ऐसे बयान के सामने कौन हथियार नहीं डाल देगा! अलबत्ता, बीजेपी में ऐसे लोगों की भरमार है, जो राहुल गाँधी से चार पीढ़ियों का हिसाब माँगते हैं! मानों राहुल गाँधी ने ही नेहरू, इन्दिरा और राजीव को प्रधानमंत्री तथा सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाया हो!

दरअसल, संघ और बीजेपी ऐसे संगठन हैं जिन पर तथ्यों और तर्कों की कभी कोई बन्दिश नहीं रहती! तभी तो परम विदुषी और केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने अकबर प्रसंग को लेकर रहस्योद्घाटन किया कि “मेरा मानना है कि इस मामले में सम्बन्धित व्यक्ति [एमजे अकबर] को ही बयान जारी करना चाहिए। क्योंकि मैं व्यक्तिगत तौर पर वहाँ [जहाँ-जहाँ अकबर पुराण की लीलाएँ हुई] मौजूद नहीं थी।” अब ज़रा सोचिए कि इससे समझदारी भरा बयान क्या कुछ और हो सकता है! हर्ग़िज़ नहीं। लेकिन यही समझदारी स्मृति के उन बयानों में कभी नहीं दिखायी देती जब वो राहुल गाँधी या नेहरू-गाँधी परिवार पर हमले करती हैं। वो जिन-जिन प्रसंगों का ब्यौरा देती हैं, क्या वहाँ कभी मौजूद थीं?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री के आसन पर सुशोभित, रीता बहुगुणा जोशी भी #MeToo विषयक विद्वान बनकर उभरी हैं। बेचारी बहुत पढ़ी-लिखी हैं। कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती भी थीं। रीता के समझ में ही नहीं आ रहा कि इस्तीफ़ा किस बात पर! तभी तो कहती हैं, “सवाल इस्तीफ़े का नहीं है। सवाल ये है कि अगर मैं किसी पर आरोप लगाऊँ तो वो सिद्ध हो।” अब इनसे कौन पूछे कि क्या आरोप लगाते ही सिद्ध हो जाते हैं? या फिर आरोपों की तह तक पहुँचने और उसकी सच्चाई जानने की भी तय प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। क्या जाँच की इस प्रक्रिया के पूरा हुए बग़ैर कभी आरोप सही या ग़लत साबित होता है!

रीता बहुगुणा की ही तरह, मध्य प्रदेश बीजेपी महिला मोर्चा अध्यक्ष लता एलकर भी, ग़ज़ब का नमूना निकलीं। सार्वजनिक जीवन के लम्बे अनुभवों का वास्ता देते हुए उन्होंने ख़ुलासा किया कि “पत्रकार बहनों को मैं कोई ऐसी innocent (मासूम, भोली-भाली) महिला नहीं कहती कि जिसका कोई भी misuse (बेज़ा इस्तेमाल) कर ले।”

इसका मतलब ये हुआ कि #MeToo के तहत ख़ुलासे करने वाली सभी महिला पत्रकार बहुत सयानी या शातिर हैं और अभी पूर्वजन्म के किसी बैर का बदला लेने के लिए एमजे अकबर जैसे धर्मात्मा व्यक्ति पर लाँछन लगा रही हैं! ग़नीमत हैं कि उन्होंने इसके पीछे काँग्रेस की साज़िश होने का ख़ुलासा नहीं किया और ना ही महिला पत्रकारों को बिका हुआ बताया। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि आने वाले दिनों में आपको ऐसे बयान सुनाई नहीं देंगे।

बीजेपी में अभी सैकड़ों प्रतिष्ठित महिलाएँ और हैं जिनकी बयान आना बाक़ी है। ये बयान जब आएँगे, तब आएँगे। लेकिन जैसे अन्धों के गाँव में भी एक काना ज़रूर होता है, वैसे ही बीजेपी में भी कभी-कभार समझदारी भरी बातें भी सुनायी देती हैं! तभी तो #MeToo को लेकर केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने कहा, “मैं उन सब [उत्पीड़ित महिलाओं] पर विश्वास करती हूँ! मैं प्रत्येक शिकायतकर्ता के दर्द और सदमे को समझती हूँ!” पूरे प्रसंग में भगवा ख़ेमे से निकला, यही इकलौता समझदारी भरा बयान है। ये उस महिला के मुँह से निकला है, जो इत्तेफ़ाकन, नेहरू-गाँधी ख़ानदान की ही एक वारिस है!