क्या आप जानते हैं कि #CBI निदेशक के पास भी ये अधिकार नहीं है कि वो अपने मातहत DySP, ASP, SP, DIG, IG और Additional Director का तबादला कर सके? इन अफ़सरों के तबादलों का अधिकार सिर्फ़ कार्मिक विभाग यानी DoPT के पास है। ये विभाग प्रधानमंत्री के मातहत है। सीबीआई के मुखिया के पास सिर्फ़ इंस्पेक्टर स्तर तक के कर्मचारियों का अधिकार है। लेकिन जैसे ही मौजूदा सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को ज़बरन छुट्टी पर भेजकर देश की शीर्ष जाँच संस्था की क़मान नागेश्वर राव को सौंपी गयी, वैसे ही दर्जन भर अफ़सरों का ताबड़तोड़ तबादला भी कर दिया गया।

मज़े की बात ये रही है कि तबादला किये गये सारे अफ़सर आलोक वर्मा गुट के थे। प्रधानमंत्री और नागेश्वर की हिम्मत नहीं थी कि वो राकेश अस्थाना गुट के किसी भी अफ़सर पर हाथ भी डाल सकें। जानते हैं क्यों? क्योंकि, राकेश अस्थाना के पास नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तमाम दुखती नसों का ब्यौरा है। अस्थाना को इनकी तमाम काली करतूतों के बारे में पता है और वो कई करतूतों में इनका सहयोगी भी रह चुका है। इसीलिए वो मोदी-शाह का चहेता भी है। इसी चहेते को ख़ुश रखने के लिए सरकार ने आलोक वर्मा की उस चिट्ठी को नज़रअन्दाज़ किया, जो अस्थाना की गिरफ़्तारी की अनुमति लेने के लिए सरकार को भेजी गयी थी।

ग़ौरतलब है कि यदि अस्थाना के सिर पर मोदी का वरद-हस्त नहीं होता तो उसकी कभी हिम्मत नहीं होती कि वो अपने मुखिया से पंगा ले सके। इस आधार पर ये साफ़ समझा जा सकता है कि आलोक वर्मा को ठिकाने लगाने के लिए मोदी-शाह ने ही अस्थाना को उकसाया है। दिलचस्प बात ये है कि इन सारी बातों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद बारीकी से ग़ौर किया है। तभी तो उसने सरकार को आदेश दिया है कि वो सील-बन्द लिफ़ाफ़े में उन अफ़सरों के तबादलों का ब्यौरा दे जिन्हें नागेश्वर राव के कार्यकारी निदेशक बनने के बाद अलग-अलग मामलों के जाँच-दल से हटाया गया है। कल्पना कीजिए कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने ये पाया कि ये तबादले ग़ैरवाज़िब थे तो मोदी सरकार की कितनी किरकिरी होगी? ज़ाहिर है, सीबीआई के अच्छे दिनों के लिए तो अभी दिल्ली बहुत दूर है!

अब 12 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट में आलोक वर्मा की उस अर्ज़ी पर सुनवाई आगे बढ़ेगी, जिसमें आलोक वर्मा ने अदालत से उस आदेश को ख़ारिज़ करने की माँग की है, जिसके मुताबिक़ उन्हें ज़बरन छुट्टी पर भेजा गया है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उस दिन तक केन्द्रीय सतर्कता आयोग से उन शिकायतों की जाँच रिपोर्ट माँगी है जो आलोक वर्मा पर लगाये गये हैं। ये आरोप माँस व्यापारी मोईन कुरैशी पर लगाये गये मनी लॉउन्डरिंग यानी कालाधन का सफ़ेद बनाने और हवाला कारोबार से जुड़े हैं। इसी केस में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों ने एक-दूसरे पर दो-दो करोड़ रुपये की घूसख़ोरी का आरोप लगाया है। आलोक वर्मा के इशारे पर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ सीधे सीबीआई जाँच कर रही थी, जबकि अस्थाना ने अपने बॉस ख़िलाफ़ 31 अगस्त 2018 को कैबिनेट सचिव को शिकायत भेजी थी।

तब कैबिनेट सचिव ने अस्थाना की शिकायत को केन्द्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी के पास जाँच के लिए भेजा था। क्योंकि नौकरशाहों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की शिकायतों के जाँच का क्षेत्राधिकार सिर्फ़ उसी के पास है। वैसे तो तब से अब तक जो 55 दिनों में मियाद सीवीसी ने गँवायी है, इस दौरान ही उसे जाँच पूरी कर लेना चाहिए था। लेकिन ऐसी तभी मुमकिन होता जबकि सीवीसी को ‘ऊपर’ से इशारा होता। ये इशारा नहीं था, इसीलिए सीवीसी मामले को ठंडे बस्ते में डालकर सो रहा था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीवीसी को अपनी कुम्भकर्ण की नींद से बाहर आना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी को आदेश दिया है कि वो न सिर्फ़ दो हफ़्ते में अपनी जाँच पूरी करे, बल्कि इस जाँच को भी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, जस्टिस एके पटनायक की देख-रेख में पूरा करे।

अब केन्द्रीय सतर्कता आयुक्तों केवी चौधरी, शरद कुमार और टीएस भसीन के लिए मोदी सरकार के इशारे पर नाचना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि इन तीनों की जाँच की निगरानी परोक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट ही करेगा। सीवीसी अब अपनी जाँच को अनिश्चितकाल तक तक खींच पाएगा। घूसख़ोरों और हरामख़ोरों की पहचान उसे करनी ही होगी। हालाँकि, सीबीआई की प्रतिष्ठा का मोदी सरकार के तौर-तरीक़ों से जितना नुकसान हुआ है, उसकी भरपायी तो शायद ही कभी हो पाए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए भ्रष्टाचार और घूसख़ोरी की जाँच के 1941 में बनाये गये ‘स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिसमेंट’ का अब इतना पतन हो चुका है कि इसके आला अफ़सर ख़ुद ही एक-दूसरे को ‘महाभ्रष्ट’ बताने लगे हैं!

‘विकास’ का इतना शानदार सोपान भी उस मोदी राज में लिखा जा सकता है, जो ‘न खाऊँगा, ना खाने दूँगा’ का नारा बुलन्द करते हुए सत्ता में आया था। लेकिन जिन्होंने राफ़ेल घोटाले के रूप में खाने-खिलाने की ऐसी मिसाल क़ायम कर दी, जैसा 70 सालों में पहले कभी नहीं हुआ! याद रहे कि आज़ादी के बाद 1963 में नेहरू सरकार ने ‘स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिसमेंट’ को ही केन्द्रीय जाँच ब्यूरो का नाम दिया था, जो आज भी दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिसमेंट एक्ट, 1946 के मुताबिक़ काम करता है। फ़िलहाल, मोदी सरकार ने नेहरू काल की इस विरासत को नेस्तनाबूत करने का बीड़ा अपने हाथ में ले रखा है!

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इसीलिए, आज यक्ष-प्रश्न है कि ये सरकार है या तमाशा! क्योंकि सीबीआई से कहवाया जाता है कि आलोक वर्मा आज भी उसके मुखिया हैं, लेकिन वो अपना काम नहीं कर सकते! उधर, जिस नागेश्वर राव को ज़बरन मुखिया बनाया गया है, वो मुखिया का काम नहीं कर सकता! बड़े नीतिगत फ़ैसले लेने से इन्हें सुप्रीम कोर्ट मना कर चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल एक नौकरशाह हैं, प्रधानमंत्री नहीं। लेकिन डोभाल को मुग़ालता है कि वो प्रधानमंत्री वाले ‘कड़े फ़ैसले’ लेते रहेंगे! नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री तो हैं, लेकिन वो नहीं जानते कि उन्हें मनमानी करके सीबीआई प्रमुख को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकने का कोई अधिकार नहीं है! सीबीआई प्रमुख को बनाने या हटाने का मौजूदा नियम 1997 से ही मौजूद है, लेकिन मोदी है कि हरेक नियम से ऊपर ख़ुद को समझते हैं! इसीलिए, जिस सुप्रीम कोर्ट का काम है इंसाफ़ करना, वो मोदी राज पर में जनता से इंसाफ़ करने की गुहार लगाता है! जिस चुनाव आयोग का काम है चुनाव करवाना, उसके लिए चुनाव की तारीख़ों का ऐलान बीजेपी के सोशल मीडिया सेल का प्रभारी करता है!