क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पेशेवर वक़ील हैं। वो ख़ुद को अयोध्या विवाद का बहुत बड़ा विशेषज्ञ मानते हैं। क्योंकि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दू पक्ष की पैरवी की थी। इसीलिए जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो ‘विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़’ को तय करने वाले मुक़दमे की सुनवाई को आगे बढ़ाने के बारे में जनवरी में विचार करेगा, वैसे ही रवि बाबू राजनीति बतियाने लगे। बोले कि “हम राम मन्दिर के मुद्दे को चुनाव से नहीं जोड़ते। हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है। हम कोर्ट का सम्मान करते हैं।” लेकिन मोदी सरकार के ही एक ‘विचित्र’ मंत्री गिरिराज किशोर को लगा कि ‘हिन्दुओं के धैर्य को अब जवाब दे देना चाहिए!’

संघ-बीजेपी समेत पूरा देश गिरिराज किशोर को एक विक्षिप्त नेता मानता है। वर्ना, उन्हें कैसे पता कि भारत के सौ करोड़ से ज़्यादा हिन्दुओं के धैर्य का पैमाना क्या है और उनका धैर्य कब जवाब देगा? सारे हिन्दुओं की बातें करने वाले ये हैं कौन? इन्हें हिन्दुओं ने कब अपना ठेकेदार बनाया? लेकिन रवि शंकर प्रसाद के पास तो करीब चार दशकों से झूठ फैलाने का अनुभव है। वो कभी मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में सरकार की उपलब्धियों, उसके वादों-इरादों और जुमलों-नारों को लेकर फैलाये जा रहे झूठ का, झूठ बोलकर ही बचाव करते हैं, तो कभी यही काम बीजेपी के प्रधान प्रवक्ता के रूप में करते नज़र आते हैं। फ़िलहाल, रविशंकर प्रसाद ने केन्द्रीय क़ानून और सूचना-तकनीक मंत्री के संवैधानिक पद पर रहते हुए राम मन्दिर को लेकर सरासर ग़लत और भ्रामक बयान दिया है। क्योंकि…

• ये विशुद्ध झूठ है कि राम मन्दिर के मुद्दे को बीजेपी चुनाव से नहीं जोड़ती। सच ये है कि हमेशा जोड़ती रही है। डंके की चोट पर जोड़ती रही है। अब भी जोड़ रही है। और, आगे भी जोड़ती रहेगी। जोड़े बग़ैर बीजेपी का गुज़ारा ही नहीं है। अरे, चुनाव से नहीं जोड़ते तो चुनाव दर चुनाव बीजेपी के घोषणापत्र में हमेशा राम मन्दिर की बात क्यों की जाती! ज़ाहिर है, बीजेपी के लिए मन्दिर, चुनावी मुद्दा ही है!

• बीजेपी का ही नहीं, बल्कि पूरे के पूरे भगवा ख़ानदान का, कभी कोर्ट पर कोई भरोसा नहीं रहा। कोर्ट की लड़ाई तो इन फॉसिस्टों को मज़बूरन झेलनी पड़ रही है। वर्ना, उनके ख़ानदान से दिन-रात लोग चिल्ला-चिल्लाकर अध्यादेश लाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता बनाने की बातें क्यों करते रहते? जिन्हें क़ानून और कोर्ट पर भरोसा होता वो मोदी सरकार की चला-चली की बेला में अध्यादेश लाने का बातें क्यों करते? क्या इन्हें नहीं पता कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे यानी यथास्थिति का आदेश लागू है। इस स्टे को ख़ारिज़ किये बग़ैर अध्यादेश के आ जाने से भी कुछ नहीं होगा। उल्टा इसी आधार पर अध्यादेश को यदि सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी तो?

• अध्यादेश की मियाद छह महीने से अधिक नहीं हो सकती। उसे क़ानून बनाना पड़ेगा, लेकिन क़ानून बनाने लायक वक़्त ही अब सरकार के पास नहीं बचा। लिहाज़ा, रविशंकर प्रसाद जब मोदी सरकार की ओर से ये बयान देते हैं कि ‘हमें कोर्ट पर पूरा भरोसा है’, तो इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि सरकार कोई अध्यादेश लाने नहीं जा रही। फिर अध्यादेश की बातें क्यों? हिन्दुओं के धैर्य की धमकी क्यों? ज़ाहिर है, रविशंकर का बयान पूरी तरह से ‘मुँह में राम बग़ल में छुरी’ वाली बात है!

• रविशंकर का अगला झूठ है कि ‘हम कोर्ट का सम्मान करते हैं!’ बीजेपी और भगवा ख़ानदान ने कभी कोर्ट का सम्मान नहीं किया। यदि सम्मान किया होता तो 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाया ही क्यों जाता? क्या तब मामला अदालत के विचाराधीन नहीं था? क्या तब अदालत के फ़ैसले का इन्तज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी? क्या तब सुप्रीम कोर्ट से वादा नहीं किया गया था कि कार सेवा की आड़ में बाबरी मस्जिद और विवादित क्षेत्र को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाया जाएगा तथा वहाँ यथास्थिति को क़ायम रखा जाएगा? क्या तब ‘संविधान की गरिमा को सर्वोपरि’ रखने का वादा नहीं किया गया था?

• कोर्ट का सम्मान करने की दुहाई देने वाले ‘तथाकथित हिन्दू पक्ष’ यानी भगवा ख़ानदान के किसी भी सियासी या धार्मिक नेता ने, क्या कभी ये कहा कि अदालत का जो भी फ़ैसला होगा वो उन्हें मंज़ूर होगा और उसे वो सिर-माथे पर रखेंगे? उल्टा, अदालत का सम्मान करने का ढोंग रचने वाले दर्जनों भगवा नेता सैकड़ों बार ये कह चुके हैं कि कोर्ट का फ़ैसला यदि उनके हक़ में नहीं आया तो वो उसे हर्ग़िज़ नहीं मानेंगे!

• लिहाज़ा, यदि सुप्रीम कोर्ट को ये अन्देशा हो कि उसका फ़ैसला लागू होने की कोई गारंटी नहीं है तो फिर वो फ़ैसला करे ही क्यों? क्यों हड़बड़ी दिखाये? क्यों अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाये? क्या सुप्रीम कोर्ट को अपनी लाज बचाने का हक़ नहीं हो सकता! इसीलिए यदि आफ़त को सामने खड़ा देख, सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी तारीख़ दे दी तो ग़लत क्या किया! यदि अदालत आगे भी लम्बी-लम्बी तारीख़ें देकर मामले को लम्बा ही खींचती रहे तो भी उसे क्या सिर्फ़ इसी आधार पर ग़लत ठहराया जाना चाहिए कि ‘सुप्रीम कोर्ट का काम है फ़ैसला सुनाना!’ तो क्या पक्षकारों का काम ये नहीं है कि वो फ़ैसले को मानें!

ज़रा सोचिए कि यदि किसी झगड़े के दौरान कोई आपसे कहे कि “मेरे मोहल्ले में आओ, तो तुम्हारी बोटी-बोटी कर दूँगा।” और आप अगले दिन बग़ैर मुनासिब तैयारियों के उसके मोहल्ले में जा पहुँचे और उससे अपने टुकड़े-टुकड़े करवा लिये तो क्या कोई आपको समझदार, होशियार, होनहार, पराक्रमी, वीर, बहादुर वग़ैरह कहेगा! यदि नहीं तो क्या यही दुविधा सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं होगी! अलबत्ता, सुप्रीम कोर्ट की ये लाचारी ज़रूर है कि वो अयोध्या विवाद के पक्षकारों से ऐसे आश्वासन की शर्त नहीं रख सकता कि वो हर हाल में उसके फ़ैसले का सम्मान करेंगे और उसे लागू करवाएँगे! सुप्रीम कोर्ट, अपने फ़ैसले का अनादर करने वालों को दंडित तो कर सकता है, लेकिन उनसे इस तरह का कोई हलफ़नामा नहीं ले सकता।

• जो लोग सुप्रीम कोर्ट को बेहद शक्तिशाली मानना चाहते हैं, उन्हें भी कान खोलकर सुन लेना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की लाज ख़तरे में है। उसकी इज़्ज़त लूटने के लिए दुष्कर्मियों का एक जत्था घात लगाये बैठा है। तभी तो चुनावों से ऐन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत जहाँ मोदी सरकार से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की माँग करते हैं, वहीं ‘सबरीमाला महिला प्रवेश’ की आड़ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, सुप्रीम कोर्ट का नाम लिये बग़ैर उसे ललकारते हैं कि ‘कोर्ट को ऐसा फ़ैसला नहीं देना चाहिए, जिसे लागू नहीं कर जा सके!’ इसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट ये हर्ग़िज़ नहीं देखे कि इंसाफ़ क्या है? बल्कि ये देखे कि क्या वो इंसाफ़ को लागू करवा पाएगा!

• यदि कोर्ट को ज़रा भी सन्देह हो कि उसका फ़ैसला लागू नहीं हो पाएगा तो क्या उसे जानबूझकर इंसाफ़ की ख़ातिर अग्नि-कुंड में कूद जाना चाहिए? अयोध्या विवाद से जुड़ा मुस्लिम पक्ष हमेशा से कहता रहा है कि उसे कोर्ट का आदेश मंज़ूर होगा। लेकिन यही हिम्मत हिन्दू पक्ष ने कभी नहीं दिखायी। ऐसा क्यों है? हिन्दू पक्ष की दलीलें क्या हैं? पहला, फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा तभी मानेंगे! दूसरा, राम का जन्म वहीं हुआ था जहाँ वो कह रहे हैं, क्योंकि ये उनकी आस्था है! तीसरा, अदालतें आस्था के सवाल को कैसे हल कर सकती हैं?

• हिन्दू पक्ष की ‘आस्था’ से सुप्रीम कोर्ट कन्नी काट चुका है। वो कह चुका है कि उसका आस्था से कोई वास्ता नहीं है। उसे तो सिर्फ़ विवादित ज़मीन का मालिकाना हक़ तय करना है? ज़मीन का मालिक तो कोई एक ही होगा। तीनों पक्षकार बराबर के मालिक नहीं हो सकते। यही सहज तर्क, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले की सबसे कमज़ोर कड़ी बना। हाईकोर्ट ने जिस ढंग से विवादित ज़मीन के तीन बराबर हिस्से करने का फ़ैसला सुनाया था वो कमोबेश ऐसा था जैसे एक पिता की ज़मीन का बँटवारा उसके तीन बेटों के बीच बराबर-बराबर कर दिया जाए। जबकि सारे झगड़े का असली सवाल तो ये है कि ज़मीन का मालिक कौन है?

• ये समझना बेहद दिलचस्प है कि अयोध्या का झगड़ा ज़मीन के वारिस का नहीं, बल्कि उसके मालिक का है! तीन पक्षकार हैं। एक मुस्लिम और दो हिन्दू। मुस्लिम पक्ष कहता है कि कोर्ट तय कर दे कि मालिक कौन है? हिन्दू पक्षों का कहना है कि कोर्ट ने यदि हमें मालिक बताया तब तो हम उसका फ़ैसला मानेंगे! वर्ना, यदि कोर्ट में हिम्मत है तो अपना फ़ैसला लागू करवाकर दिखा दे! ऐसे में बेचारा कोर्ट करे भी तो करे क्या!

• संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी हिन्दुओं को उल्लू ही बनाना है। वर्ना, उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि यदि मोदी सरकार को राम मन्दिर के लिए अध्यादेश लाना होता तो ये काम जून 2014 में ही क्यों नहीं हो जाता? संसद के संयुक्त सत्र में बहुमत की ताक़त तो मोदी सरकार के पास चार साल से है। वक़्त रहते क़ानून बनाया होता तो क्या अब तक भव्य मन्दिर बनकर तैयार नहीं हो गया होता? लेकिन सबको पता है कि संघ-बीजेपी की निष्ठा राम मन्दिर को बनवाने में नहीं बल्कि इसे सियासी तौर पर भुनाने में है, इसे लेकर धार्मिक उन्माद फ़ैलाने में है, हिन्दुओं के धैर्य को भड़काने में है!

• दरअसल, संघ-बीजेपी की ये दृढ़ धारणा है कि हिन्दू मूर्ख हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मूर्ख बनाकर वोट बटोरो और मौज़ करो! तीन तलाक़ की ड्रामेबाज़ी भी इसीलिए है, लव-जिहाद, गाय-गोबर-बीफ़ भी इसीलिए! देश में 80 फ़ीसदी हिन्दू हैं लेकिन उनके लिए 20 फ़ीसदी मुसलमान ख़तरा हैं, क्योंकि संघियों की ओर से हिन्दुओं को यही घुट्टी पिलायी जाएगी, तभी तो हिन्दू डरेगी और संघ-बीजेपी उनकी रक्षा करेगा!

• सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं से ‘धर्म के लिए बलिदान देने को तैयार रहने’ का आह्वान किया है!’ मतलब साफ़ है, जैसे किसान आर्थिक दुर्दशा से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, वैसे ही राम मन्दिर को ‘वहीं’ बनाने के लिए अबकी बार कारसेवा नहीं होगी, बल्कि राम भक्तों को आत्म-बलिदान देते हुए ख़ुदकुशी का सिलसिला चालू करना होगा! वर्ना, बलिदान का क्या कोई और तरीक़ा भी हो सकता है?