यदि आपको ख़ुशफ़हमी है कि ‘कड़े फ़ैसले’ लेने वाली मोदी सरकार चाहे तो संसद में क़ानून बनाकर अयोध्या विवाद को ख़त्म करवा सकती है, तो आप ग़लतफ़हमी में हैं! ये भी सरासर झूठ है कि मोदी सरकार इसलिए अध्यादेश लाकर क़ानून नहीं बना पा रही क्योंकि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है! दरअसल, अयोध्या विवाद जैसे क़ानूनी दाँव-पेंच में फँसा है उसके आगे मोदी सरकार की औक़ात ही नहीं कि वो क़ानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट को बाइपास या दरकिनार कर दे! सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इन्तज़ार करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है! उसकी इतनी हिम्मत भी नहीं है कि वो मन्दबुद्धि हिन्दुओं या उम्मादी राम भक्तों को सारी बात साफ़-साफ़ समझा सके। यही राम मन्दिर की सियासत है!

कभी अध्यादेश के ख़िलाफ़ थी बीजेपी

6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाने के महीने भर के भीतर नरसिम्हा राव सरकार, अयोध्या अधिनियम के नाम से एक अध्यादेश लायी। राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे 7 जनवरी 1993 को मंज़ूरी दी। इसके ज़रिये अयोध्या की 2.77 एकड़ विवादित भूमि और उसके आसपास की 60.70 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण केन्द्र सरकार ने कर लिया। 1993 में अयोध्या अधिग्रहण एक्ट को बनाते वक़्त गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण ने लोकसभा में कहा था कि ‘देश में साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारे को बहाल करने के लिए’ अयोध्या की अधिग्रहीत ज़मीन पर एक राम मन्दिर, एक मस्जिद, एक पुस्तकालय और एक संग्रहालय का निर्माण होगा। तब बीजेपी के अलावा मुस्लिम संगठनों ने भी अध्यादेश और क़ानून का विरोध किया था।

जब सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी राय

अयोध्या अधिनियम में ज़मीन के विवाद से जुड़ी तमाम याचिकाओं को ख़त्म करने का प्रावधान था। इसीलिए इस क़ानून और अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फ़ारूकी जजमेंट के रूप में ज़मीन की दावेदारी वाले मुक़दमों को बहाल करते हुए केन्द्र सरकार को सारी ज़मीन अपने क़ब्ज़े में रखने का आदेश दिया, और कहा कि आख़िरकार, जिस पक्षकार के हक़ में अदालत का फ़ैसला आएगा, उसे ज़मीन दे दी जाएगी। इससे पहले नरसिम्हा राव सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से ये तय करने के लिए मदद माँगी कि ‘क्या बाबरी मस्जिद वाली जगह पर कभी कोई हिन्दू मन्दिर या ढाँचा था?’ इस यक्ष-प्रश्न पर जस्टिस एमएन वेंकटचलैया, जेएस वर्मा, जीएन रे, एएम अहमदी और एसपी भरूचा वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने विचार किया और फिर अपनी राय देने से मना कर दिया।

16 साल बाद, 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित ज़मीन को राम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर बाँटने का फ़ैसला सुनाया। इस फ़ैसले की सबसे बड़ी ख़ामी ये रही कि इसने विवादित ज़मीन का वारिस तो तय किया, लेकिन मालिक नहीं! लिहाज़ा, तीनों पक्षों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहाँ आठ साल से तकनीक पेंच में उलझा रहा। लेकिन इतना तय हो गया कि मुद्दा सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ का है। लिहाज़ा, सुप्रीम कोर्ट को ‘कोई जल्दी नहीं है!’

25 साल से अध्यादेश पर स्टे है

अब जनवरी में सुप्रीम कोर्ट की नयी पीठ आगे की सोचेगी। लेकिन चुनाव को सामने देख भगवा ख़ानदान चाहता है कि मोदी सरकार अध्यादेश लाकर अयोध्या की ज़मीन हिन्दुओं को सौंप दे। इसके लिए दलीलें गढ़ी गयीं कि अब देरी बर्दाश्त नहीं हो रही या अब धैर्य जवाब दे रहा है! मोदी सरकार के क़ानून मंत्री कहते हैं कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट पर पूरा भरोसा है। लेकिन विपक्षी पार्टियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इन्तज़ार ज़रूर करना चाहिए। मोदी सरकार का सबसे बड़ा धर्म संकट ये है कि इसी प्रसंग में 1993 में सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि ‘ज़मीन के झगड़ों को ख़त्म करने के लिए उसका अध्यादेश लाने या क़ानून बनाने का क़दम संवैधानिक नहीं था।’ वही दशा आज 25 साल बाद भी है।

अब भी भगवा ख़ानदान यही तो चाहता है कि ‘मोदी सरकार ज़मीन के मालिकाना हक़ के तय होने का इन्तज़ार नहीं करे, बल्कि चटपट क़ानून बनाकर विवादित और अधिग्रहीत ज़मीन हिन्दू पक्ष के हवाले कर दे!’ लेकिन कल्पना कीजिए कि जैसे ही ऐसा हुआ, वैसे ही यदि सुप्रीम कोर्ट फिर से क़ानून को असंवैधानिक ठहरा दिया तो बात बहुत बिगड़ जाएगी। क्योंकि बाबरी मस्जिद को उन्मादी राम भक्त भले ही कुछेक घंटों में नेस्तनाबूत कर दें, लेकिन भव्य राम मन्दिर का निर्माण तब तक नहीं हो सकता, जब तक अदालत का फ़ैसला न आ जाए और अमन-चैन का माहौल न हो।

सरकार ‘सुपर कोर्ट’ नहीं हो सकती

सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न ये है कि क्या सुप्रीम कोर्ट में लम्बित मामले को सरकार क़ानून बनाकर निपटा सकती है? क्या ये न्यायिक प्रक्रिया में दखलंदाज़ी नहीं होगी? बिल्कुल होगी! क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कई बार ये कह चुका है कि सरकारें, क़ानून भले ही बना और बदल सकती हैं, लेकिन वो ‘अन्तिम अदालत’ या ‘सुपर कोर्ट’ की तरह पेश नहीं आ सकतीं! अयोध्या में यथास्थिति का आदेश सुप्रीम कोर्ट का है। नये क़ानून से यथास्थिति नहीं रहेगी। इसीलिए ये अदालती प्रक्रिया में दखल कहलाएगा! लिहाज़ा, अध्यादेश लाकर राम मन्दिर का रास्ता खोलने के लिए चाहे जितना दबाब बनाया जाए, लेकिन मोदी सरकार की औक़ात नहीं है कि वो सुप्रीम कोर्ट से पंगा ले!

चुनौती बहुमत की नहीं है

किसी भी सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट से पंगा लेना समझदारी नहीं हो सकती। मोदी सरकार भी इसे समझती है। वर्ना, वो क़ानून बनाकर अयोध्या विवाद को 2014 में ही क्यों नहीं ख़त्म कर देती? उसके पास भले ही राज्यसभा में बहुमत नहीं रहा, लेकिन दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के ज़रिये राज्यसभा की चुनौती से उबरने का रास्ता उसके पास हमेशा मौजूद रहा। वैसे भी अयोध्या से सम्बन्धित क़ानून कोई संविधान संशोधन तो होता नहीं। इसे तो बस सामान्य बहुमत की ज़रूरत होती।

सुप्रीम कोर्ट का रास्ता चाहे जितना लम्बा हो, लेकिन बीजेपी और भगवा ख़ानदान के पास इन्तज़ार के अलावा विकल्प नहीं है। छोटा रास्ता सिर्फ़ यही हो सकता है कि पक्षकारों में समझौता हो जाए और वो मुकदमा वापस ले लें। लेकिन इसके आसार बहुत कम हैं। क्योंकि मुस्लिम पक्ष की हमेशा ये दलील रही है कि उनकी मस्जिद नाजायज़ नहीं थी। फिर भी वो अदालत के फ़ैसले को मानेंगे। दूसरी तरफ, हिन्दू पक्ष का कहना है कि विवादित ज़मीन ही रामजन्म भूमि है, क्योंकि उसकी आस्था है कि राम का जन्म वहीं हुआ था!

‘कड़े फ़ैसले’ वालों का धर्मसंकट

आस्था का सवाल अदालतें नहीं तय कर सकतीं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में अपनी राय नहीं दी। 2010 में आये इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले में भी, कहीं ये बात नहीं लिखी है कि विवादित ज़मीन ही राम का जन्मस्थान है। हाईकोर्ट ने भी सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ पर अपना फ़ैसला सुनाया। आस्था के सवाल पर वो भी ख़ामोश ही रहा। अब बीजेपी और भगवा ख़ानदान इसलिए बेचैन है कि चुनाव सिर पर हैं। मन्दिर समर्थकों को लगता है कि जब सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के ही हाथ में है तो फिर उन्हें ‘कड़े फ़ैसले लेने वाली सरकार’ को वोट देने के लिए 2014 में क्यों ठगा गया?

दरअसल, राम मन्दिर के नाम पर हिन्दुओं को ठगने वाली संघ-बीजेपी चाहती है कि जनता में ये भ्रम फिर से फैलाया जाए कि मोदी सरकार ने तो क़ानून बना दिया, लेकिन मन्दिर विरोधियों ने अड़ंगा लगा दिया। ताकि, मोदी को ‘वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद होने वाले सेनानी’ का दर्जा मिल जाए। इसे ‘नाख़ून कटाकर शहीद होने का तमग़ा हासिल करना’ भी कहते हैं! मन्दिरवादियों को लगता है कि यदि अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज़ कर दिया तो भी बीजेपी को बताएगी कि मन्दिर के लिए उसने कोई क़सर बाक़ी नहीं छोड़ी। लेकिन अदालत के आगे वो लाचार है! यानी, ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी!’ यही सियासत है।

सुप्रीम कोर्ट का पशोपेश

पूरे प्रसंग के एक पहलू की बात कोई नहीं कर रहा। कोई नहीं बता रहा कि सुप्रीम कोर्ट किस पशोपेश में है! अयोध्या विवाद के दो पक्ष हैं – मुस्लिम और हिन्दू। मुस्लिम पक्ष ने हमेशा अदालत के फ़ैसले को मानने की बात की। जबकि हिन्दू पक्ष के किसी भी नेता ने कभी ये नहीं कहा कि उन्हें अदालत का फ़ैसला मंज़ूर होगा। भगवा ख़ानदान के सियासी नेताओं ने ज़्यादा से ज़्यादा सिर्फ़ इतना कहा कि वो अदालत का सम्मान करते हैं। जबकि इसी ख़ेमे के ग़ैरसियासी और धार्मिक नेताओं ने हमेशा ये ढपली बजायी कि यदि कोर्ट का फ़ैसला यदि उनके हक़ में नहीं आया तो वो फ़ैसले को हर्ग़िज़ नहीं मानेंगे! यानी, कोर्ट को यदि अपना फ़ैसला मनवाना है तो फ़ैसला उनके ही हक़ में होना चाहिए!

अब ज़रा ये सोचिए कि यदि सुप्रीम कोर्ट को ये अन्देशा हो कि उसका फ़ैसला लागू होने की कोई गारंटी नहीं तो फिर वो फ़ैसला करे ही क्यों? जल्दी फ़ैसला सुनाकर क्यों अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाये? क्या सुप्रीम कोर्ट को अपनी लाज बचाने का हक़ नहीं हो सकता! आफ़त को सामने देख क्या वो लम्बी तारीख़ भी नहीं दे सकता! यदि सुप्रीम कोर्ट लम्बी तारीख़ें देकर मामले को लम्बा ही खींचता रहे तो भी क्या उसे सिर्फ़ इसी आधार पर ग़लत ठहराया जाना चाहिए कि ‘उसका काम है फ़ैसला सुनाना!’ तो क्या पक्षकारों का ये काम नहीं कि वो फ़ैसले को मानें! सुप्रीम कोर्ट की लाचारी ये भी है कि वो अपने फ़ैसले का अनादर करने वालों को दंडित तो कर सकता है, लेकिन उनसे से वादा नहीं ले सकता कि वो हर हाल में फ़ैसला मानेंगे!

अब 1994 का नया झूठ

अब संघ परिवार ने ये पासा भी फेंका है कि मोदी सरकार 1994 के उस वादे को लागू करे जिसके तहत केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दिया था कि ‘यदि ये साबित हो जाता है कि जहाँ बाबरी मस्जिद थी, वहाँ कभी मन्दिर था, तो वो ज़मीन हिन्दुओं को दे दी जाएगी।’ इस सिलसिले में ये जानना बेहद दिलचस्प है कि 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल का जवाब देने से मना किया था। तब से अब तक किसी अदालत ने कभी ये नहीं कहा कि ‘वहाँ कभी मन्दिर था’ या वही ‘राम जन्मभूमि’ है! अब भी झगड़ा इन बातों का तो है ही नहीं। झगड़ा तो सिर्फ़ ‘विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है! झगड़ा, ज़मीन के वारिस का नहीं, बल्कि उसके मालिक का है!