संघियों की ताज़ा धमकी है कि यदि मोदी सरकार ने फ़ौरन अध्यादेश लाकर राम मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं किया तो वो आन्दोलन करेगी! हालाँकि, संघ ने ये नहीं कहा कि आन्दोलन, हिंसक भी होगा! लेकिन संघ के इतिहास को देखते हुए अहिंसक आन्दोलन की कल्पना बेमानी होगी! मन्दिर के नाम पर संघ फिर से हिंसा की तैयारी करेगा और उन्माद फैलाएगा कि राम भक्त इसलिए बेक़ाबू भीड़ बन गये क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जानबूझकर अयोध्या विवाद को अनिश्चितकाल के लिए टाल रहा है, फ़ैसला सुनाने से कन्नी काट रहा है और मन्दिर निर्माण में अड़ंगा लगा रहा है।

दरअसल संघियों की बौखलाहट राम मन्दिर के लिए नहीं बल्कि हिन्दू वोट के लिए है। चुनाव सामने हैं। संघ को उस निक्कमी मोदी सरकार के लिए वोट जुटाना है, जो बीते साढ़े चार सालों में तक़रीबन हरेक मोर्चे पर विफल रही है, जिसके कामकाज़ और तौर-तरीक़ों को लेकर आम जनमानस में भारी नाराज़गी है। आलम इतना बिगड़ चुका है कि मोदी सरकार की हरेक तारीफ़ में छिपे झूठ से जनता का गुस्सा और भड़क रहा है। संघ-बीजेपी को सत्ता हाथ से जाती दिख रही है। ऐसे में राम मन्दिर की आड़ में होने वाले धार्मिक ध्रुवीकरण को उम्मीद की आख़िरी किरण माना गया है।

संघ को पता है कि विकास लापता है। अर्थव्यवस्था बेहद ख़राब दौर में है। बैंक तबाह हैं। उद्योग-कारोबार बदहाल हैं। रोज़गार के अवसर नदारद हैं। किसान बेहाल हैं। बचायी गयी बेटियाँ अपने नसीब को कोस रही हैं। सीबीआई अपने पतन से शर्मिन्दा है। राफ़ेल घोटाले की वजह से मोदी सरकार के लिए दलदल बनकर तैयार हो चुका है। अब सम्भलने का वक़्त भी नहीं बचा। लिहाज़, राम मन्दिर को आख़िरी हथियार के रूप में आज़माने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए आन्दोलन की बात छेड़ी गयी है। संघ के सहकार्यवाह भैय्याजी जोशी के शब्द हैं, लेकिन इसे हरेक संघी का समर्थन हासिल है। अब तो अब कार्यक्रम का ऐलान होना है।

दिक्कत सिर्फ़ इतनी है कि राम भक्तों के आन्दोलन से न तो मोदी सरकार पर कोई असर पड़ेगा और ना ही मन्दिर निर्माण का रास्ता खुलेगा! तो फिर होगा क्या? होगा ये कि भक्तों को उल्लू बनाया जाएगा कि तुम सरकार की चौतरफ़ा नामाकियों को नज़रअन्दाज़ करो और बीजेपी को ही जिताओ क्योंकि मन्दिर बनने के लिए बीजेपी का सत्ता में होना ज़रूरी है। उधर, सरकार और बीजेपी की ओर से औपचारिक तौर पर दोहराया जाएगा कि ‘बीजेपी, मन्दिर निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है और आज भी 1989 में हुए पार्टी के पालनपुर अधिवेशन के मुताबिक़ संवैधानिक तरीक़े से राम मन्दिर बनाने की पक्षधर है।’

साफ़ है कि मसला ‘संवैधानिक तरीक़े’ का है। लेकिन संघ-बीजेपी का कोई भी छोटा-बड़ा नेता देश को संवैधानिक तरीक़े की हक़ीक़त के बारे में कभी कुछ नहीं बताता! ऐसा क्यों है? संविधान के मुताबिक़, यदि कोई मामला अदालत के विचाराधीन है तो सरकार या संसद उसे क़ानून बनाकर ख़त्म नहीं कर सकती। अयोध्या विवाद में 1994 से सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दे रखा है। सरकार यदि ज़बरन क़ानून बनाकर यथास्थिति को बदलती है, तो ये अदालत के काम में दख़ल माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत क़ानून को ख़ारिज़ कर देगी क्योंकि उसे भी अपने ‘यथास्थिति’ वाले आदेश की रक्षा करनी होगी। अदालत भी उन सवालों का समाधान किये बग़ैर ‘यथास्थिति’ ख़त्म नहीं कर सकती, जिनकी वजह से ‘यथास्थिति’ का रास्ता थामा गया था!

इसका मतलब ये हुआ कि आन्दोलनकारी चाहे जितने उग्र तेवर दिखा लें, चाहे जितनी हिंसा कर लें, लेकिन सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट की ‘यथास्थिति’ को बदलने का कोई रास्ता नहीं है। यही वजह है कि जिस पूर्व चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के बारे में संघियों ने ख़ूब प्रचार किया कि वो रिटायरमेंट से पहले अयोध्या विवाद पर फ़ैसला सुनाना चाहते हैं। मुमकिन है कि ये सच भी हो, लेकिन ‘यथास्थिति’ की ताक़त के आगे जस्टिस दीपक मिश्रा के हाथ भी बँधे ही रहे। वो भी सिर्फ़ इतना ही तय कर सके कि अयोध्या विवाद को सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ ज़मीन के मालिकाना हक़ यानी ‘टाइटल सूट’ की तरह ही देखेगा।

‘टाइटल सूट’ एक साधारण मुक़दमा होता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ‘टाइटल सूट’ को त्वरित सुनवाई के लायक नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा, इसकी प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट में लम्बित अन्य मुक़दमों के हिसाब से ही तय होगी। संघ-बीजेपी और मन्दिरवादियों ने सुप्रीम कोर्ट के इस सहज रवैये को राजनीति से जोड़ दिया। क्योंकि ये उनकी आस्था है कि राम का जन्म अयोध्या में उसी स्थान पर हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद थी। वो चाहते हैं कि अदालत भी इसी आस्था को स्वीकार करे। जबकि सुप्रीम कोर्ट 1994 से अभी तक हमेशा दोहराती है कि वो आस्था के सवाल को तय नहीं कर सकती। उसे तो सिर्फ़ इतना तय करना है कि विवादित ज़मीन का मालिक कौन है?

लगे हाथ संघियों के कुछ और स्वाँग को भी समझते चलें। जैसे, अभी ये बात उछाली गयी है कि यदि बीजेपी, एक निजी विधेयक के रूप में क़ानून को संसद में पेश करे तो क्या काँग्रेस, वामपन्थी तथा अन्य सेक्यूलर पार्टियाँ इसका समर्थन करेंगी? यहाँ दो बाते हैं। पहली, कोई भी राजनीतिक दल अयोध्या में राम मन्दिर बनाने का विरोधी नहीं है। विरोध तो सिर्फ़ इतना है कि विवादित ज़मीन पर ज़बरन मन्दिर नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात ये है कि विधेयक, निजी हो या सरकारी, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। क्योंकि दोनों को ही ‘यथास्थिति’ को भंग करना पड़ेगा और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। तकनीकी तौर पर असंवैधानिकता के आधार पर ही सदन के पीठासीन अधिकारी को प्रस्तावित विधेयक को पेश करने की अनुमति तक नहीं दे सकते, उसका पारित होना तो बाद की बात है।

अब सवाल ये है कि सरकार की ओर से जनता या राम भक्तों को इन पेंचीदा बातों को लेकर जागरूक क्यों नहीं किया जाता? क्योंकि फिर जनता ये समझ जाएगी कि आस्था के नाम पर विवादित ज़मीन पर मन्दिर बनवाना मुमकिन नहीं है। अब यदि ये मुमकिन ही नहीं है तो संघ-बीजेपी को राम मन्दिर के नाम पर वोट माँगने का क्या हक़ हो सकता है? क्या शिवसेना-बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों में हिन्दू नहीं हैं? क्या इन हिन्दुओं को राम मन्दिर बनाने से ऐतराज़ है? जी नहीं! राम मन्दिर बनाने से किसी भी ऐतराज नहीं है। आपत्ति है तो सिर्फ़ इतनी कि ज़बरन किसी ज़मीन को जन्मभूमि बता देना ग़लत है। ज़बरन मस्जिद को ढहा देना ग़लत है, असंवैधानिक है, अपराध है।

यदि सुप्रीम कोर्ट ये कह दे कि विवादित ज़मीन पर मुसलमानों का मालिकाना हक़ नहीं है तो बनाइए भव्य राम मन्दिर, कौन रोकता है! लेकिन यदि ज़मीन मुसलिम पक्ष की पायी गयी तो फिर ज़बरन वहीं मन्दिर बनाने की बात करने वालों ने सुप्रीम कोर्ट को पसोपेश में डाल रखा है। क्योंकि हिन्दू पक्ष ने कभी ये नहीं कहा कि यदि फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ रहा तो भी वो उसे मानेंगे। जब तक मन्दिरवादियों की ओर से ऐसे बयान नहीं आएँगे, तब तक सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले को ज़्यादा से ज़्यादा टालना चाहेगा, क्योंकि उसे भी अपने लाज बचानी है। यदि उसका आदेश भी नहीं माना गया तो संविधान और लोकतंत्र कैसे बचेगा!