वित्तमंत्री अरूण जेटली को आप चाहें तो झूठली साहब कह सकते हैं। इन्हें अक्सर ही मोदी सरकार के कुकर्मों को धोने की पीड़ा झेलनी पड़ती है। फिर चाहे वो नोटबन्दी हो या खोटी जीएसटी या राफ़ेल घोटाला। बेचारे झूठली नहीं जानते कि बिगरी बात बने नहीं लाख करो किन कोय, रहिमन बिगरै दूध को मथे ना माखन होय!’ झूठली के ताज़ा फ़ेसबुक पोस्ट ज़ाहिर है कि 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे, या तो ये महाशय सो रहे थे या फिर घनघोर नशे में थे! तब नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के तीन उद्देश्य बताये थे: कालेधन और भ्रष्टाचार पर हमला, आतंकी फ़ंडिंग और हवाला पर चोट और जाली नोटों का सफ़ाया! लेकिन झूठली आज जिस नोटबन्दी की तारीफ़ के पुल बाँध रहे उसमें इन तीनों ही उद्देश्यों को लेकर उनकी बोलती बन्द है! क्यों भला? आइए ज़रा इसका जायज़ा लें।

1. झूठली लिखते हैं कि नोटबन्दी के बाद बड़ी मात्रा में बैंकों में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट जमा करवाने वाले 17.42 लाख संदिग्ध खाताधारकों का पता चला। उन पर कार्रवाई हुई।

झूठ: क्या-क्या कार्रवाई हुई? किन-किन लोगों पर? उनके नाम क्यों कौन ज़ाहिर करेगा? अभी तक नामों का ख़ुलासा क्यों नहीं हुआ? इन संदिग्ध खातों में कितने रुपये जमा हुए? सरकार ने कितने मामलों में कितना रुपया ज़ुर्माना वसूला? कितने लोगों को जेल की हवा खिलायी?

सच: इनमें से एक भी सवाल का ऐसा जवाब झूठली के पास नहीं है, जिसे बताकर वो मोदी सरकार की पीठ ठोंक सकें। इसीलिए कोई ब्यौरा नहीं देते। अब ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

2. झूठली कहते हैं कि नोटबन्दी से बैंकों में जो रुपया पहुँचा, उससे नये क़र्ज़दारों में क़र्ज़ा बाँटा गया!

झूठ: कितना रुपया, किन लोगों को, किन योजनाओं के तहत क़र्ज़ में बाँटा गया? इसमें से कितने सरकार के चहेते और बैंकों के लुटेरे थे? देश को ये क्यों नहीं पता चल सकता कि नोटबन्दी की आड़ में किन-किन क़र्ज़दारों का भला हुआ?

सच: मुद्रा लोन के तमाम भ्रामक आँकड़े सरकार ने जारी किये थे। इसकी पोल खुल चुकी है। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि बैंकों का एनपीए अब 12 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। नीरव, मेहुल, माल्या, संदेसरा जैसे मोदी के अज़ीज़ दोस्त, सरकारी बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो चुके हैं। ताज़ा स्थिति ये है कि नगदी संकट और घपलों-घोटालों से जूझ रहे 11 बड़े बैंकों पर रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ बाँटने पर रोक लगा रखी है, क्योंकि उनकी भारी पूँजी डूब चुकी है। इनमें से 10 बैंक तो पूरी तरह से सरकारी हैं। इन्हें उबारने के लिए ही वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक से 3.6 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित निधि (यानी एक तिहाई से अधिक रिज़र्व ख़ज़ाना) जारी करने को कहा है। इसे लेकर ही तो उर्जित पटेल और अरूण झूठली में ठनी हुई है।

3. डिजिटाइजेशन को लेकर झूठली का कहना है कि आज 130 करोड़ की आबादी में 1.25 करोड़ लोग भीम एप का इस्तेमाल कर रहे हैं।

झूठ: डिजिटल लेनदेन की संख्या का कोई ख़ास मतलब नहीं है। ये अरबों-ख़बरों में पहुँच जाये तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। देखना ये चाहिए कि अर्थव्यवस्था के कुल लेनदेन में डिजिटल की हिस्सेदारी कितनी है?

सच: 100-200, 500-1000 वाले लेनदेन के डिजिटाइज़्ड होने के आधार पर नोटबन्दी को क़ामयाब नहीं बताया जा सकता। नोटबन्दी के दो साल बाद भी एक फ़ीसदी से कम आबादी का भीम एप या रुपै कार्ड जैसी जुगत का इस्तेमाल करना ये बताता है कि 99 प्रतिशत लोग आज भी इससे दूर हैं। अलबत्ता, मोदी की मेहरबानी से पेटीएम जैसी चीनी निवेश से चल रही कम्पनी ज़रूर निहाल हो गयी। भारतीयों के बीच ख़ुदरा लेनदेन का व्यापक ज़रिया आज भी कैश ही बना हुआ है।

रिज़र्व बैंक के मुताबिक, दो साल पहले नोटबन्दी की रात 17.01 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे। लेकिन अब ये संख्या 18.76 लाख करोड़ रुपये है। यानी आज भी कैश ही किंग है। 2016 में प्रचलित रुपयों की मात्रा में सालाना 17.7 फ़ीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हो रही थी, जो अब घटने के बजाय बढ़कर 22.2 फ़ीसदी हो चुकी है। लेकिन झूठली को इसकी चिन्ता नहीं सता रही। यहीं, हमें याद रखना चाहिए कि नेट बैंकिंग और प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट-डेबिट कार्ड वग़ैरह का नोटबन्दी से कोई वास्ता नहीं है। ये सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं। पहले भी लोग बड़े पैमाने पर डिजिटल पेमेंट का तरीक़ा अपनाते रहे हैं। नोटबन्दी से इसमें इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन ऐसे इज़ाफ़े के लिए नोटबन्दी कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती। लिहाज़ा, डिजिटल लेनदेन में हुई बढ़ोत्तरी के लिए नोटबन्दी का गुणगान करना जनता को मूर्ख बनाने के सिवाय और कुछ नहीं है!

4. वित्तमंत्री बता रहे हैं कि नोटबन्दी के बाद प्रत्यक्ष कर यानी डायरेक्ट टैक्स के संग्रह में इज़ाफ़ा हुआ है। ये 6.6 और 9% से बढ़कर 14 और 16% दर्ज़ हुआ है। इसी तरह टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 25 से 55% फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। इस साल 86.35 लाख लोगों ने पहली बार रिटर्न भरा।

झूठ: टैक्स संग्रह में इज़ाफ़ा, नोटबन्दी से पहले भी हरेक साल होता रहा है। सरकार ये क्यों नहीं बता रही कि कुल डायरेक्ट टैक्स में आयकर का हिस्सा कितना है? आयकर के मद में कितने फ़ीसदी तेज़ी नोटबन्दी की वजह से आयी है? क्या ऐसा इज़ाफ़ा टैक्स की दर यानी रेट ऑफ़ टैक्स में बदलाव लाकर नहीं हासिल किया जा सकता था, तो फिर नोटबन्दी की ज़रूरत क्यों पड़ी? झूठलीजी, जनता को ये क्यों नहीं बताते कि मोदी राज में आयकर की दर में कितना इज़ाफ़ा किया गया? महँगाई से स्टैंडर्ड डिडक्शन को क्यों अछूता रखा गया? इससे आयकर के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या क्या अपने आप नहीं बढ़ती चली जाएगी?

सच: आयकर और डायरेक्ट टैक्स का संग्रह बढ़ाने के लिए नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं होती। लोग यदि टैक्स की चोरी कर रहे हैं तो उन्हें पकड़ना इनकम टैक्स विभाग का काम है। सेल कम्पनियों की गड़बड़ी को पकड़ना, कम्पनी कार्य मंत्रालय का काम है। सभी संस्थाओं के पास अपने दायित्व निभाने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। इन्हें नोटबन्दी नामक हथियार की कोई ज़रूरत नहीं थी। जहाँ तक ज़्यादा रिटर्न दाख़िल करने का सवाल है तो वित्तमंत्री ने क्या देश को ये भी बताया है कि रिटर्न भरने वाले नये लोगों से कितना अतिरिक्त आयकर प्राप्त हुआ है? नहीं बताया! क्योंकि रिटर्न भरने वाले ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जितनी आमदनी नोटबन्दी के बाद कम हुई है और इनसे मिलने वाले कुल टैक्स की रक़म घटी है।

5. झूठली बाबा ने नोटबन्दी के दो साल बाद भी देश को ये नहीं बताया कि क्या अब तक बैंकों में जमा हुए नोटों की गिनती हो गयी?

झूठ: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर उम्मीद जतायी थी कि नोटबन्दी से क़रीब तीन से चार लाख करोड़ रुपये बैंकों में नहीं लौटेंगे, क्योंकि ये रक़म या तो काला धन है या आतंकियों और नक्सलियों के पास है या फिर इसमें जाली नोट शामिल हैं। उधर, देश भर में बन्द हुए नोटों का 99.3% बैंकों में आ गया। बाक़ी का ब्यौरा कहाँ है? अभी तक गिनती पूरी क्यों नहीं हुई? कब पूरे आँकड़े देश के सामने होंगे?

सच: काला धन का वारा-न्यारा करने वालों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बहुत ऊपर है। उनके सहकारी बैंक ने एक झटके में 750 करोड़ रुपये से ऊपर की रक़म को काले से गोरा बना दिया। लेकिन दो साल बाद भी किसी का बाल तक बाँका नहीं हुआ! अरे झूठलीजी, आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबन्दी ही विश्व का सबसे बड़ा घोटाला है! वर्ना, यदि मक़सद पुराने नोटों को बैंकों में लाने का ही होता तो फिर इसके लिए भी नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं थी। पुराने नोटों को अमान्य किये बग़ैर, नये नोट का अकाल पैदा किये बग़ैर, एटीएम को फ़िट बनाये बग़ैर, बैंकों में पर्याप्त नये नोटों का इन्तज़ाम किये बग़ैर भी इस उद्देश्य को हासिल किया जा सकता था। घर में पड़े नोटों को बैंकों में खींचकर लाने के लिए नोटबन्दी से बड़ा मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता!

कुलमिलाकर, नोटबन्दी को आँकड़ों के मकड़जाल में उलझाकर इसे लाभदायक और क्रान्तिकारी बताने वाले झूठली का मक़सद एक बार फिर से लोगों की आँखों में धूल झोंककर उन्हें उल्लू बनाने का ही है। वर्ना, सच्चाई तो ये है कि रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे हरेक मोर्चे पर नोटबन्दी पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था, रोज़गार और काम-धन्धों को ऐसा झटका लगा कि वो दो साल बाद भी उबर नहीं पाये हैं। नोटबन्दी ने ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों को इतना ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचाया है, जैसा उन्हें, शायद बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी नहीं पहुँचता है! नोटबन्दी हर लिहाज़ से मूर्ख शासकों की मानव-निर्मित आपदा साबित हुई!