इस सदी का सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न है कि महावीर हनुमान, आख़िर क्या थे…? दलित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, जाट, मुसलमान, जैन, आदिवासी, महादलित, आर्य, खिलाड़ी या चीनी? वो बाल ब्रह्मचारी हैं या मोदी की तरह पत्नी को छोड़ देने वाले शादी-शुदा या सर्वत्र तथा सभी के?

मुहावरा है, ‘ग़रीब की लुगाई, सारे गाँव की भौजाई’। इसका मतलब है कि ग़रीब आदमी की बीवी से कोई नहीं हड़कता। उससे तो सारा गाँव ही ये समझकर हँसी-मज़ाक और चुहल-ठिठोली करता है, मानो वो सबकी भाभी लगती हो। सभी का उससे देवर-भाभी की नोंक-झोंक वाला ही रिश्ता हो! भाभी, बेशक़, इसे नापसन्द करती है। लेकिन अपनी कमज़ोर हैसियत को देख ख़ामोशी से सब झेलती रहती है। भगवा ख़ानदान के विद्वानों ने उसी ग़रीब की लुगाई जैसा हाल बेचारे हनुमान जी का बना दिया है।

वो 27 नवम्बर 2018 का मनहूस दिन था, जब हिन्दू वोटरों को साम्प्रदायिक आधार पर लामबन्द करने के लिए अलवर पधारे अजय सिंह बिष्ट ने हनुमान जी की विशेषता से सबको अवगत करवाया। इसके बाद तो भगवा ख़ानदान में निठल्लों के बीच हनुमान पर शोध करने की होड़ मच गयी। हर कोई बजरंगबली को बलहीन बनाने पर पिल पड़ा। ढोंगियों का ज्ञान बलबलाने लगा। उनके दिमाग़ की नसें फटने लगीं। बस, फिर क्या था! हनुमान जी की जाति, धर्म, पेशा, नस्लीय पहचान (Ethnic Identity) जैसे तमाम रहस्यों को लेकर एक से एक ख़ुलासे होने लगे।

इसी दौरान पता चला कि हनुमान जी कोई ब्रह्मचारी वग़ैरह नहीं थे। उन्होंने भी श्रीमान नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी की तरह सम्पूर्ण वैदिक रीति से सुवर्चना नामक नारी से विवाह रचाया था। लेकिन हनुमान जी की पत्नी का ब्यौरा भी हिन्दू समाज से कमोबेश वैसे ही छिपाकर रखा गया जैसे जशोदा बेन की पहचान और परिचय दशकों तक गोपनीय बनी रही।

बीजेपी में समय-समय पर तमाम गेरूआ वेषधारी ढोंगियों का जमावड़ा रहा है। इसकी कहानी उस करपात्री महाराज तक जाती है, जिन्होंने हिन्दू महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा दिये जाने का विरोध करते हुए संघ का आशीर्वाद से अपने लेकर अपने चेले प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को 1951 में फूलपुर में जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ चुनाव लड़वाया था। करपात्री को ग़लतफ़हमी थी कि वो दुर्वासा या परशुराम के वंशज हैं। लेकिन फूलपुर की जनता ने नेहरू के लिए वही काम किया जो जनकपुर में धनुष-यज्ञ के वक़्त लक्ष्मण ने राम के लिए किया था। बक़ौल तुलसीदास, तब लक्ष्मण ने परशुराम से कहा था, ‘पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू, चहत उड़ावन फूँकि पहारू। इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं।’

गोरखपुर से कई गेरूआधारी संसद पहुँचे। आदित्यनाथ के गुरु महन्त अवैद्यनाथऔर उनके भी गुरु महन्त दिग्विजयनाथ, इसमें शामिल हैं। कालान्तर में उन्हीं के नक़्शे-क़दम पर चलते हुए कई अपराधी भी गेरूआ धारण करके संसद में घुसपैठ करने में सफल हुए। इसमें नर-नारी दोनों हैं! जैसे स्वामी चिन्मयानन्द, साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी सावित्री बाई फुले, साध्वी उमा भारती वग़ैरह। मन्दबुद्धि हिन्दू इन्हें भ्रमवश धर्म गुरु वग़ैरह भी समझते हैं। ऐसे ही एक गेरूआधारी अजय सिंह बिष्ट ने आव देखा ना ताव और अंजनि कुमार, पवन पुत्र, हनुमान जी के लिए जाति प्रमाणपत्र जारी कर दिया। उसने एक झटके में हनुमान जी को दलित, शोषित, उत्पीड़ित और वनवासी भी बता दिया।

अजय सिंह बिष्ट की इस हरक़त को देख बीजेपी में बैठे मनचलों ने हनुमान को लेकर वैसा ही छिछोरापन दिखाना शुरू कर दिया जैसे वो ग़रीब की लुगाई हों! अब तक हनुमान जी की पहचान को लेकर एक से एक दावे हो चुके हैं, लेकिन किसी हिन्दू की धार्मिक आस्था को ठेस नहीं पहुँची। जिन हिन्दुओं का ख़ून पद्मावती और बाजीराव मस्तानी के साथ हुई ‘छेड़खानी’ से खौल जाया करता था, जिसे मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिग्स उद्वेलित कर दिया करती थीं, जिसे थियेटरों में चल रहे नाटक या ख़ास तरह की पुस्तकें इतना आहत कर दिया करती थीं, वो इसे लेकर मरने-मारने पर आमादा हो जाया करते थे। वही हिन्दू जमात, हनुमान जी को लेकर विराट हृदय और उदार मन का प्रदर्शन कर रहे हैं। ये अद्भुत है! हालाँकि, हनुमान जी की ऐसी बेइज़्ज़ती तो लंका में रावण भी नहीं कर पाया था! ख़ैर, अजय सिंह बिष्ट के ‘दलित सिद्धान्त’ के बाद अब…

• उत्तर प्रदेश के खेल और युवा कल्याण मंत्री तथा पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान ने हनुमान जी में पेशेवर खिलाड़ी और वो भी पहलवान की छवि

• उत्तर प्रदेश के ही धार्मिक कार्य मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी को हनुमान जी में जाटों की विशेषताएँ नज़र आयी।

• बीजेपी सांसद उदित राज के मुताबिक़ हनुमान जी, आदिवासी हुआ करते थे।

• राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष नन्द कुमार साय ने भी हनुमान जी के आदिवासी होने का दावा किया।

• सांसद गोपाल नारायण सिंह ने बताया कि हनुमान जी तो बन्दर थे। बन्दर पशु है। इसका दर्ज़ा तो दलित से भी नीचे होता है। इसका मतलब ये हुआ कि हनुमान जी महादलित रहे होंगे!

• सांसद हरिओम पांडे ने हनुमान जी को ब्राह्मण बताया।

• शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने भी हनुमान जी को ब्राह्मण बताया।

• सांसद कीर्ति झा आज़ाद ने हनुमान जी को चीनी मूल वाला बताया।

• बीजेपी विधायक बुक्कल नवाब ने हनुमान जी को मुसलमान करार दिया।

• जैन धर्म गुरु आचार्य निर्भय सागर महाराज ने हनुमान जी को जैन बताया है।

• केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्य पाल सिंह ने हनुमान को आर्य बताया।

बाबा रामदेव ने हनुमान को क्षत्रिय बताया।

इन बयानों से साफ़ है कि भगवा ख़ानदान ने हनुमान जी का हाल ‘ग़रीब की लुगाई’ जैसा कर दिया है। जो जिसके जी में आया, वो वैसे बोल दे रहा है। क्या तुलसीदास ने यही सोचकर लिखा था कि ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’! यदि आप हनुमान जी की ऐसी छीछालेदर से आहत हैं तो आपसे जो करते बने वो 2019 में करके दिखा दीजिएगा। फ़िलहाल, आप चाहें तो हनुमान जी की जाति, धर्म, पेशा वग़ैरह तय करने के लिए मोदी सरकार से एक संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC गठित करने की माँग कर सकते हैं। यदि राफ़ेल सौदे की जाँच JPC के हवाले हो गयी तो आपकी भी मुराद पूरी हो सकती है।

इस बीच, हनुमान जी की मदद के लिए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ‘कड़ा’ बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ‘हनुमान जी सबके हैं। उन्हें धर्म और जाति में बाँटना ठीक नहीं। वो तो सर्वत्र हैं और सभी के हैं।’ लेकिन राजनाथ को ये भी तो बताना चाहिए कि हनुमान जी को जाति-धर्म में बाँटने वाले लोग यदि ठीक काम नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने इसकी ‘कड़ी निन्दा और भर्त्सना’ क्यों नहीं की? ग़लत काम करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई का ऐलान क्यों नहीं किया? अरे, इतना ही कह देते कि हनुमान जी की छीछालेदर करने वालों से सरकार कड़ाई से निपटेगी। वैसे ताज़्ज़ुब की बात ये भी है कि अब तक हनुमान जी को लेकर काँग्रेस या राहुल गाँधी के प्रति अपने अपार स्नेह का इज़हार नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सम्बित पात्रा, रवि शंकर प्रसाद, निर्मला सीतारमण, प्रकाश जावड़ेकर या वेंकैया नायडू जैसे महानुभावों ने नहीं किया है। शायद, इन्हें हड़बड़ी नहीं है क्योंकि चुनाव अभी महीनों दूर हैं।

वैसे, लगे हाथ आपको बता दूँ कि हनुमान जी से जुड़े विवाद को लेकर यदि आप आहत हैं तो कृपया न्यायपालिका का दरवाज़ा हर्ग़िज़ नहीं खटखटाइएगा। क्योंकि 1993 में नरसिम्हा राव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को चिट्ठी लिखी थी कि क्या कोर्ट ये तय करना चाहेगी कि अयोध्या का विवादित स्थल ही राम जन्मभूमि है या नहीं? इस सवाल के जबाब में सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की संविधान पीठ ने आपसी चर्चा के बाद सरकार को ये लिख भेजा कि ‘राम के जन्म-स्थल के सवाल को न्यायिक सबूतों के आधार पर नहीं सुलझाया जा सकता। लिहाज़ा सुप्रीम कोर्ट इस सवाल का उत्तर नहीं देना चाहेगा।’

अयोध्या विवाद के सन्दर्भ में आज भी सुप्रीम कोर्ट, 1993 के उसी फ़ैसले पर क़ायम है। इसीलिए उसने तय किया है कि उसे सिर्फ़ विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला करना है और वो भी किसी दीवानी मुक़दमे की तरह। बाक़ी उसे इस सवाल से कोई मतलब नहीं कि राम उसी विवादित ज़मीन पर पैदा हुए थे या नहीं? 25 साल पुराने तज़ुर्बे को देखते हुए, न्यायपालिका हनुमान जी की पहचान सुनिश्चित करने से कन्नी काट सकती है।

दूसरी ओर, आप चाहें तो इस बात को लेकर भी अपना सिर धुन सकते हैं कि हनुमान से जुड़ा सारा प्रसंग, राहुल गाँधी के कुल-गोत्र से जुड़ी सारी लफ़्फ़ाज़ी फ़िज़ूल है, बेमतलब की बात है। ये सब राजनीति के असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश है। लेकिन ज़रा ये भी तो सोचिए कि ऐसी सिरफ़िरी बातों से गोदी-मीडिया को कितनी ख़ुराक़ मिलती है? यदि ऐसे बेतुके मुद्दे नहीं होते तो मीडिया को मोदी सरकार का हिसाब करना पड़ता। इसीलिए ख़ुद मोदी जी भी रोज़ाना नये-नये शिगूफ़े छोड़ते रहते है कि क्या नेहरू, भगत सिंह से मिलने जेल गये थे? और फिर बताते हैं कि गोरखनाथ, कबीर और नानक कभी एक साथ बैठकर मानव-कल्याण के मंत्र विकसित किया करते थे!