सियासत पर पैनी नज़र रखने वालों का ताज़ा ‘राग-दरबारी’ है कि ‘बिहार में 22 सीटें जीत चुकी बीजेपी अबकी बार 17 सीटों पर क्यों राज़ी हो गयी?’ तमाम सतही नज़रियों में से एक है, ‘कम लड़ेंगे तो कम हारेंगे!’ ये हँसी-मज़ाक की बात है। असलियत कुछ और है। बीजेपी समझ चुकी है कि उसके लिए अब ‘सत्ता की हवस’ के शान्त होने का दौर आ चुका है। अब उसे ‘सहयोगियों की भूख’ सता रही है! उसे अपनी पालकी ढोने वाले कहारों की लालसा है। नये कहार मिल नहीं रहे। इसीलिए संघ नहीं चाहता कि बचे-खुचे कहार भी हाथ से निकल जाएँ।

भारत के ज़्यादातर क्षेत्रीय दलों ने वक़्त-बेवक़्त बीजेपी की पालकी उठायी है। ममता, समता, जयललिता, महबूबा, नवीन, चन्द्रबाबू, चौटाला, अब्दुल्ला, मायावती, वाइको, रामादोस, शरद जैसे कितने ही छोटे-बड़े कहारों ने बीजेपी की पालकी को आज़माने की बाद उससे तौबा कर ली। सभी ने अपनी तौहीन को बहुत क़रीब से देखा और झेला। हवा के झोंके के साथ आये उपेन्द्र कुशवाहा, जीतनराम माँझी और ओम प्रकाश राजभर भी अपनी किस्मत पर आँसू बहा चुके हैं। शिवसेना और अकाली दल के सिवाय बीजेपी का कोई टिकाऊ कहार नहीं रहा। शिवसेना को मोदी राज तो फूटी आँख भी नहीं सोहा रहा। हालात तो तलाक़ वाले हैं। बस, गुज़ारा-भत्ता तय होते ही दोनों एक ही छत के नीचे रहना बन्द कर देंगे। 2019 में जनता, गुज़ारा-भत्ता तय कर देगी।

भारतीय राजनीति में अभी सिर्फ़ पासवान और नीतीश ही ऐसे हैं जिन्हें थूककर चाटने से कभी गुरेज़ नहीं रहा। दोनों जैसी ‘सत्ता की हवस’ किसी और दल में नहीं दिखती। बीजेपी और इनमें यही सबसे बड़ी समानता है। इसीलिए इन्हें बार-बार एक-दूसरे से इश्क़ हुआ। मोहब्बत परवान चढ़ी तो शादी भी हुई। तलाक़ भी हुए। हलाला भी। और, फिर से निकाह भी। लेकिन इनके बीच बिगड़ैल मियाँ-बीवी वाली तल्ख़ी भी हमेशा बनी रही। जैसे, पति को यदि नॉन-वेज (साम्प्रदायिकता) बहुत पसन्द हो, वो इसके बग़ैर एक दिन भी नहीं रहना चाहे, तब पत्नी की शर्त हो कि ‘बाहर से खाकर आओगे तो ठीक, लेकिन घर में खुलेआम नॉन-वेज खाने की ज़ुर्रत की तो तलाक़ पक्का है!’

जीवविज्ञान की भाषा में देखें तो पासवान और नीतीश की टक्कर का परजीवी यानी Parasite और कोई नहीं। मौक़ापरस्ती के लिहाज़ से नीतीश, पासवान और बीजेपी की तिकड़ी बेजोड़ है। तीनों की एक ही विचारधारा है सत्ता! हर हाल में सत्ता। किसी भी क़ीमत पर सत्ता। विचारधारा तो मुखौटा है, नौटंकी है। सत्ता की ख़ातिर तीनों ही नैतिकता की किसी भी लक्ष्मण रेखा को फाँद सकते हैं। ये ‘राम मिलाये जोड़ी’ वाले मुहावरे की सबसे शानदार मिसाल हैं। यही वजह है कि बीजेपी को नीतीश और पासवान के साथ रहने से सीट मिले या ना मिले, लेकिन कॉन्फ़िडेंस यानी आत्मविश्वास तो ज़बरदस्त मिलता है। उसे अद्भुत सुखानुभूति होती है।

ताज़ा विधानसभाओं चुनाव ने बीजेपी के मुँह का ज़ायक़ा बुरी तरह से बिगड़ दिया। संघ-बीजेपी और गोदी-मीडिया के सिवाय सभी को उसकी दुर्दशा साफ़ दिख रही थी। जब सबको लग रहा हो कि बीजेपी की सेहत अब नहीं सुधरने वाली, तब यदि कोई ये कहे कि तुम स्वस्थ हो जाओगे तो क्या इससे हौसला और आत्मविश्वास नहीं बढ़ेगा? ऐसी दुर्लभ सुखानुभूति के लिए 2014 में जीती हुई पाँच सीटों की क़ुर्बानी, बहुत मामूली बात है। क्या लोग किडनी दान करके जीवित नहीं रहते? बीजेपी के लिए पाँच सीटों का त्याग क्या किडनी जैसा बहुमूल्य है?

ऐसे वक़्त में जब हर कोई मोदी राज के अन्तिम दिन गिन रहा हो, तब कोई तो हो जो कहे कि यदि तुम्हें हमें मुँह माँगी फ़िरौती यानी सीटें देना क़बूल हो तभी हम कहेंगे कि 2019 में मोदी ही जीतेंगे। तभी हम ये पूछना बन्द करेंगे कि नोटबन्दी से आख़िर क्या फ़ायदा हुआ? अब देखिएगा कि कैसे छोटके भैया पासवान, नोटबन्दी की शान में क़सीदे गढ़ेंगे! उधर, मझले भैया नीतीश भी 17 सीट पाकर गदगद हैं। 2014 में बेचारे 2 सीट पर ही सिमट गये थे। अब मई तक तो कॉन्फ़िडेंस के नशे में झूमते रहेंगे कि वो बड़के भैया बीजेपी से बिल्कुल कम नहीं हैं! बाक़ी, चुनाव के बाद जब फ़सल कटकर आएगी तब कर लेंगे कि किसकी उपज बेहतर रही!

1998 के बाद से भारत में ‘गठबन्धन काल’ क़ायम है। दमदार पार्टी और नेता के ख़िलाफ़ छोटे दलों के एकजुट होने का सिलसिला जनता पार्टी के ज़माने से हमारे सामने है। ये महज इत्तेफ़ाक नहीं है कि 1977 से लेकर 1998 तक जितने भी गठबन्धन बने वो सभी विफल हुए। जबकि वाजपेयी के वक़्त बने एनडीए और फिर उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए बने यूपीए तक के सभी प्रयोग सफल हुए। इन्होंने टिकाऊ सरकारें दीं। राजनीतिक स्थिरता पर कभी आँच नहीं आयी। 2008 में जिस परमाणु समझौते की वजह से लेफ़्ट ने मनमोहन सिंह सरकार ने नाता तोड़ा, उसी मुद्दे पर समाजवादी सरकार के साथ आ गये। वो भी बग़ैर गठबन्धन के। लेकिन अब एनडीए के दिन बिगड़े हुए हैं। छोटे दल उससे कन्नी काटते जा रहे हैं। मित्र-दल जहर उगल रहे हैं। इससे जनता में ग़लत सन्देश जा रहा है। इसलिए भी बीजेपी का आत्मविश्वास बुरी तरह से डगमगाया हुआ है।

बीजेपी बुरी तरह से डरी हुई है। उसकी हवा ख़राब है। शिवसेना निकल भागी तो हालात ‘ऐन वक़्त पर दूध के फट जाने’ वाला हो जाएगा। विधानसभा चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे को ‘चौकीदार ही चोर क्यों नहीं लगा?’ इसीलिए 2019 तक बीजेपी, किसी सहयोगी को निकल भागने का मौका नहीं दे सकती। यही वजह है कि अब ‘अपना दल’ की ओर से बीजेपी और मोदी सरकार को आँखें दिखायी जा रही हैं। इसकी भी सारी शर्तें मंज़ूर हो जाएँगी। बीजेपी को मालूम है कि लोकसभा की दो-चार सीटों के इधर-उधर होने से ऐसा कुछ नहीं बनने-बिगड़ने वाला, जैसा सहयोगियों के खिसक लेने का असर पड़ेगा।

सहयोगियों के चले जाने से जनता में सन्देश जाएगा कि जिसके कहार ही छोड़कर चले जा रहे हों, उसकी पालकी क्या उठेगी! जिसके दोस्त ही मैदान-ए-जंग में साथ नहीं रहें, उसके साथ हम क्यों खड़े हों! बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि अभी यदि ऐसी फ़िज़ा बन गयी तो उसका काम-तमाम है! संघ के फ़ीडबैक चैनल भी बता रहे हैं कि जनता की नज़र में ‘मार्केटिंग ऑफ़ परसेप्शन’ के सिवाय मोदी सरकार की उपलब्धियाँ नगण्य हैं। इसीलिए, सारा फ़ोकस डैमेज़ कंट्रोल पर है। लेकिन राजनीति में डैमेज़ ही तो कंट्रोल नहीं होता।