भारत 17वें आम चुनाव की दहलीज़ पर आ पहुँचा है। देश भर में इसकी तैयारियाँ करवट ले रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। क्योंकि 2019 में निर्णायक जनादेश इसी राज्य से उभरेगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहाँ राम मन्दिर को लेकर माहौल को गरमाने की ज़बरदस्त कोशिश चल रही है, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक उन्माद बहुत तेज़ी से अपने पंख पसार रहा है। सिर्फ़ दिसम्बर में ही अब तक कम से कम आठ ऐसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं, जिनका मक़सद धार्मिक ध्रुवीकरण और उन्मादी माहौल को हवा देना है।

1. 4 दिसम्बर 2018 को बुलन्दशहर में गोकशी की आड़ में दंगे हुए। इसमें पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह समेत दो लोग मारे गये।

2. 22 दिसम्बर 2018 को मुज़फ़्फ़रनगर के रतनपुरी थाना क्षेत्र में गाँव भनवाड़ा में पुलिस ने मुठभेड़ के बाद 3 गौ-तस्कर गिरफ़्तार किये।

3. 24 दिसम्बर 2018 को गौतमबुद्धनगर ज़िले में नोएडा पुलिस को सेक्टर 58 के उस पार्क में जुमे की नमाज़ पर आपत्ति हो गयी, जहाँ फरवरी 2013 से हर शुक्रवार को जुमे की नमाज़ अता की जाती रही है। अब प्रशासन को इसमें शान्ति भंग की आशंका नज़र आयी। इसीलिए प्रमुख न्यूज़ चैनलों पर बहस हुई कि पार्क में नमाज़ क्यों पढ़ी जानी चाहिए?

4. 24 दिसम्बर 2018 को मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले की बुढ़ाना तहसील में हिन्दू युवा वाहिनी के ब्लॉक अध्यक्ष मोनू ठाकुर ने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की जीभ काटकर लाने वाले के लिए 5 लाख रुपये के इनाम की घोषणा कर दी। इसका वीडियो वायरल हुआ और टीवी की ख़बर भी बनी।

5. 25 दिसम्बर 2018 को बागपत ज़िले के मोहल्ला केतीपुरा में लक्ष्मण चौक पर सिगरेट उधार नहीं देने को लेकर कुरैशी और प्रजापति समुदाय के बीच दंगा भड़क गया। इसमें पैदा हुई हिंसा और तोड़फोड़ में पुलिस वालों समेत अन्य लोग भी घायल हुए।

6. 26 दिसम्बर 2018 को केन्द्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने दिल्ली के जाफ़राबाद और उस्मानपुर के अलावा उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ, ग़ाज़ियाबाद, अमरोहा, हापुड़ और सिम्भावली के 17 ठिकानों पर छापा मारकर दस लोगों को गिरफ़्तार किया। आरोप है कि पकड़े गये युवा आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट से जुड़े थे। दिल्ली का संघ कार्यालय केशव कुंज, पुलिस मुख्यालय, कई नेता और प्रमुख हस्तियाँ इनके निशाने पर थीं।

7. 26 दिसम्बर 2018 को मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के निर्धना इलाके से पुलिस ने 4 गौ-तस्करों को गिरफ़्तार किया।

8. 26 दिसम्बर 2018 को गौतमबुद्धनगर ज़िले में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने सेक्टर 37 में होने वाली नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा को इसलिए रोक दिया, क्योंकि इसका आयोजन सरकारी ज़मीन पर हो रहा था। आयोजकों ने इसकी अनुमति लिये बग़ैर वहाँ अपने तम्बू, मंच और लाउडस्पीकर वग़ैरह स्थापित कर दिये थे।

इन घटनाओं का धड़ाधड़ सामने आना महज संयोग नहीं है। ये अकाट्य सत्य है कि दंगे होते नहीं, बल्कि करवाये जाते हैं। साम्प्रदायिक दंगों के लाभार्थी हमेशा सियासी लोग ही होते हैं। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि उत्तर प्रदेश में अचानक साम्प्रदायिक दंगों और उन्माद की घटनाओं में इज़ाफ़ा क्यों हो रहा है? कहीं इसका ताल्लुक, 11 दिसम्बर 2018 को आये विधानसभा चुनाव के नतीज़ों में बीजेपी को मिली चौतरफ़ा हार से तो नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी की गिरती लोकप्रियता और एनडीए के सहयोगियों में मची भगदड़ ने कट्टरवादियों को साम्प्रदायिक का सहारा लेने के लिए मज़बूर कर दिया हो!

किसी भी मौकापरस्त गठबन्धन में चीनी का गुण होता है। मिठास के प्रति चीटियाँ तभी तक आकर्षित होती हैं, जब तक वो होती है। 2015 के बाद राजू शेट्टी, चन्द्रबाबू नायडू, महबूबा मुफ़्ती, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतनराम माँझी जैसे छोटे-बड़े नेताओं ने एनडीए से किनारा कर लिया। उद्धव ठाकरे, ओमप्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल जैसे लोग एनडीए में कितने नाख़ुश हैं, ये किससे छिपा है! अगर बीजेपी की हालत पतली नहीं हो रही होती तो इनमें से किसकी हिम्मत थी कि वो उस पर गुर्रा सके! हालात को बीजेपी अच्छी तरह से समझ चुकी है। तभी तो संघ के रणनीतिकारों ने अपने जाने-पहचाने साम्प्रदायिक हठकंडे को हवा देना शुरू कर दिया है। दरअसल, कट्टरवादियों को साफ़ दिख रहा है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सिवाय, मोदी सरकार के पतन की रोकथाम नामुमकिन है।

ध्रुवीकरण ही भगवा ख़ानदान का आज़माया हुआ ब्रह्मास्त्र है। इसके लिए हिन्दू-मुसलमान के बीच नफ़रत की आग का धधकना ज़रूरी है। अफ़वाहें फ़ैलाकर उन्माद भड़काना ज़रूरी है। मुसलमानों को गायों का हत्यारा, गौ तस्कर, बीफ़ खाने वाला, आतंकवादी, भारत विरोधी और पाकिस्तान परस्त बताना ज़रूरी है। हिन्दुओं में ये धारणा फ़ैलाना आवश्यक है कि भारत सिर्फ़ हिन्दुओं का देश है, इसलिए हिन्दू राष्ट्र है। भारत की परवाह सिर्फ़ हिन्दुओं को है। भारत में मुसलमान सिर्फ़ इसलिए हैं किक्योंकि काँग्रेस उनका तुष्टिकरण करके उन्हें अपना वोट-बैंक बनाये रखना चाहती है।

मज़े की बात ये भी है कि देश में तुष्टिकरण, सिर्फ़ मुसलमानों का होता है, हिन्दुओं का नहीं, सिखों का भी नहीं। वोट-बैंक भी सिर्फ़ मुसलमान ही हैं, न हिन्दू, ना सिख और न ही ईसाई। यही नहीं, सिर्फ़ वोट-बैंक ही भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन है। जबकि साम्प्रदायिक उन्माद तो भारत-भूमि के लिए खाद और पानी है। तरक्की और खुशहाली का ज़रिया है। आम चुनाव में

बीजेपी इन्हीं बातों को जनता के दिल-ओ-दिमाग़ में बैठकर अपना सियासी उल्लू सीधा करना चाहती है।
हिन्दू-मुसलमान और गाय के अलावा फ़िलहाल, भारत की अन्य चुनावी महामारियाँ हैं – जातिवाद, तीन तलाक़, राम मन्दिर, आस्था और हिन्दू-विरोधी! भगवा चिकित्सालय का मानना है कि जातिवाद का इलाज़ आरक्षण को ख़त्म करने से होगा। तीन तलाक़ को आपराधिक बनाने से मुसलमानों के होश ठिकाने आ जाएँगे। सिर्फ़ हिन्दू विरोधी ही आस्था और गाय के महत्व को नकार सकता है। और, राम मन्दिर का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए, क्योंकि करोड़ों हिन्दुओं की ये आस्था बनायी जा चुकी है कि राम का जन्म वहीं हुआ था, जहाँ बाबरी मस्जिद का बीच वाला गुम्बद था। संघ-बीजेपी को पता है कि यदि लोकसभा चुनाव इन्हीं महामारियों के ईर्द-गिर्द घूमता रहा, तभी उसका बेड़ा पार होगा। वर्ना, बाक़ी मोर्चों पर व्यापक असन्तोष किससे छिपा है!