क्या आप जानते हैं कि दुनिया के हर देश में तलाक़ का विधान है, लेकिन तलाक़ को लेकर सज़ा का क़ानून कहीं नहीं है! यही वो सबसे बड़ी वजह है जो जिसकी बेड़ियाँ मोदी सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल में नहीं खोल पाएगी। तीन तलाक़ अब भी ग़ैर-क़ानूनी है। इरादा इसे आपराधिक हरक़त बनाने का है। इसके विधेयक ने तमाम विरोध के बावजूद लोकसभा की बाधा भले ही पार कर ली, लेकिन राज्यसभा अब भी टेढ़ी खीर ही है। ये बाधा इसीलिए भी और कठिन हो जाती है कि राज्यसभा में तो मोदी सरकार के पास कभी बहुमत रहा नहीं, अब तो उसके पास वक़्त भी नहीं बचा।

तीन तलाक़ क़ानून को लेकर संसदीय समिति को ठेंगे पर रखने और विपक्ष की अनदेखी करने की नीति, मोदी सरकार को बहुत भारी पड़ेगी। क्योंकि सरकार के पास पिछले साल की तरह अब भी राज्यसभा में बहुमत नहीं है। पिछली बार एनडीए को अन्नाद्रमुक का साथ मिल गया था, लेकिन इस बार वो भी मुश्किल लगता है। क्योंकि लोकसभा में इसने विपक्ष के साथ रहकर मतदान का बॉयकॉट किया है। राज्यसभा में इसके 13 सदस्य हैं। वहाँ कुल 244 सदस्य हैं। एक जगह खाली है। एनडीए की सदस्य संख्या 89 है। ये बहुमत (123) से 34 कम है। फ़ासला बहुत लम्बा है। लगता नहीं कि इसे तय करने में अन्नाद्रमुक की मदद मिल पाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2017 में तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक ठहराया था। इसके बाद मोदी सरकार ने तीन तलाक़ को ‘आपराधिक हरक़त’ बनाने के लिए क़ानून बनाने की क़वायद शुरू की। फिर मोदी कैबिनेट के विधेयक को लोकसभा 27 दिसम्बर 2017 को पारित करवाया गया। लेकिन प्रस्तावित क़ानून को सरकार राज्यसभा में पारित नहीं करवा सकी। वहाँ के विरोध को देखते हुए विधेयक को सुधारा गया और 19 सितम्बर 2018 को इसे नये अध्यादेश के रूप में लागू कर दिया गया।

2017 वाले पुराने विधेयक की तुलना में 2018 के नये विधेयक में तीन सुधार किये गये। पहला सुधार: पहले कोई भी या पुलिस सीधे मुक़दमा दर्ज़ कर सकती थी। अब पीड़ित महिला या उसका सगा सम्बन्धी ही केस कर सकेगा। दूसरा सुधार: पहले तीन तलाक़ को संज्ञेय और ग़ैर-ज़मानती अपराध माना गया था। इसमें पुलिस को वारंट के बग़ैर गिरफ़्तारी का हक़ था। लेकिन अब मजिस्ट्रेट को ज़मानत देने का हक़ दिया गया है। तीसरा सुधार: पहले मियाँ-बीवी के बीच सुलह-समझौते का प्रावधान नहीं था। लेकिन अब मजिस्ट्रेट के सामने सुलह का विकल्प दिया गया है।

अब लोकसभा से पारित नये विधेयक को 22 जनवरी 2019 तक राज्यसभा से भी पारित होना ज़रूरी है। क्योंकि संविधान जहाँ सरकार को किसी भी अध्यादेश को जारी करने हक़ देता है, वहीं इसकी तीन शर्तें भी हैं।

1. अध्यादेश की वैधता छह महीने से अधिक नहीं होगी।

2. अध्यादेश का संसद के अगले सत्र में पारित होना ज़रूरी है।

3. संसद सत्र के चालू होने के 6 हफ़्ते यानी 42 दिनों के भीतर विधेयक पारित होना चाहिए। अन्यथा, अध्यादेश अमान्य हो जाएगा।

संसद के मौजूदा सत्र की मियाद 11 दिसम्बर 2018 से लेकर 8 जनवरी 2019 तक है। इस तरह, 42 दिन की समय सीमा 21 जनवरी 2019 को ख़त्म हो जाएगी। इसका मतलब ये हुआ कि यदि लोकसभा से पारित विधेयक 8 जनवरी 2019 तक पारित नहीं हो पाया तो ये क़ानून में तब्दील नहीं हो पाएगा। इसके बाद भी यदि मोदी सरकार तीन तलाक़ को ‘आपराधिक करतूत’ बनाने पर आमादा रही तो उसे 8 जनवरी 2019 के बाद फिर से अध्यादेश लाना होगा और उसे अपने आख़िरी संसद सत्र यानी बजट सत्र 2019 में संसद के दोनों सदनों से पारित करवाना होगा।

आम चुनाव का साल होने की वजह से 2019 का बजट सत्र पर सीमित कामकाज का भारी दबाव होगा। अनुमान है कि बजट सत्र 18 से 25 फरवरी 2019 के बीच शुरू होगा और 8 मार्च 2019 से पहले ख़त्म हो जाएगा। बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण, बजट भाषण, धन्यवाद प्रस्ताव को पारित करने और अनुदान माँगों (आंशिक बजट) को पारित करने जैसे संवैधानिक अनिवार्यताओं को पूरा करने के बाद सरकार के पास मौक़ा ही नहीं होगा कि तीन तलाक़ के नये विधेयक को दोनों सदनों से पारित करवा सके। अब यदि इस बार भी राज्यसभा अपने पुराने रुख़ यानी विधेयक को प्रवर समिति या सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की माँग पर अड़ी रही तो मोदी सरकार के लिए 8 जनवरी 2019 की समय-सीमा पर ख़रा उतरना बेहद मुश्किल होगा।

मोदी सरकार को विपक्ष की कुछ दमदार दलीलों का समाधान निकालना होगा। जैसे…

1. चूँकि मुस्लिम विवाह एक क़रार है, इसलिए किसी भी क़रार की तरह ये दीवानी मामला है। इसे फ़ौजदारी कैसे बनाया जा सकता है?

2. सुप्रीम कोर्ट ने कभी ये नहीं कहा कि तीन तलाक़ एक ‘आपराधिक करतूत’ है। लिहाज़ा, इसके लिए क़ानून बनाकर सज़ा तय होनी चाहिए। इसीलिए तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी ठहराया जाना ही पर्याप्त है।

3. प्रस्तावित तीन तलाक़ विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ नहीं मिलेगा। इससे पीड़ित की तकलीफ़ औऱ बढ़ेगी। क्योंकि तीन तलाक़ अवैध होने की वजह से पत्नी ख़ुद अपने पति को सज़ा दिलवा रही होगी और बदले में शादी-शुदा रहते हुए पति की भरण-पोषण की ज़िम्मेदारियों से वंचित रहेगी।

उपरोक्त दलीलों को समाधान करने के लिए विधेयक में संशोधन करना होगा। विपक्ष इन्हीं संशोधनों को अमली जामा पहनाने के लिए विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने पर अड़ा है। अब यदि सरकार ने मौजूदा विधेयक को ही पारित करवाने पर अड़ी रही तो उसे राज्यसभा में मुँह की खानी पड़ेगी। और यदि सदन ने विधेयक को संशोधनों के साथ पारित किया तो लोकसभा को नये सिरे से संशोधित विधेयक को पारित करना पड़ेगा। इतनी क़वायद के लिए अब सरकार के पास मुनासिब वक़्त नहीं बचा।

2014 में चुनाव आयोग ने 5 मार्च को चुनाव कार्यक्रम का ऐलान किया था। उसी दिन से आदर्श चुनाव संहिता प्रभावी हो गयी थी। लिहाज़ा, ये माना जा सकता है कि 2019 का बजट सत्र का पहला हिस्सा 5 मार्च के आसपास ही समाप्त हो जाएगा। इसका दूसरा हिस्सा नयी सरकार के हवाले होगा। 2014 में 7 अप्रैल से लेकर 12 मई तक मतदान हुआ था। नरेन्द्र मोदी, 26 मई को प्रधानमंत्री बने थे। हालाँकि, 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून को हुआ था। इस तरह से चुनाव आयोग के पास सारी चुनाव प्रक्रिया को पूरा करने और राष्ट्रपति के पास नयी लोकसभा के गठन की अधिसूचना जारी करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा 3 जून तक का वक़्त होगा।

वैसे तो एनडीए में 44 पार्टियाँ हैं। लेकिन सिर्फ़ 13 घटक दलों के पास सांसद हैं। अभी लोकसभा में इसके 307 और राज्यसभा में 89 सदस्य हैं। लोकसभा में अभी बीजेपी के 271 सदस्य हैं। तीन तलाक़ विधेयक को लेकर बीजेपी ने अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने और विधेयक के पक्ष में वोट देने के लिए व्हिप जारी किया था। ऐसे में ये कौतूहत स्वाभाविक है कि तीन तलाक़ विधेयक के पक्ष में 245 वोट ही क्यों पड़े? ये तो बीजेपी के सांसदों की संख्या से भी 26 कम है। इससे यदि स्पीकर सुमित्रा महाजन का नाम हटा दें तो बाक़ी 25 विधायक कौन हैं, जो व्हिप के बावजूद ग़ैर-हाज़िर रहे? इसी तरह, बात तो होगी ही कि विधेयक को एनडीए के 61 सांसदों यानी 20 फ़ीसदी सदस्यों का समर्थन क्यों नहीं मिला!

एक बात और बहुत महत्वपूर्ण है कि आम जनता इन 61 सांसदों के नाम के बारे में आसानी से जान नहीं सकती। क्योंकि इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाता। सिर्फ़ मतदान का नतीज़ा जनता के सामने आता है। वैसे, लोकसभा सचिवालय को सदस्यों के ‘डिवीजन नम्बर’ यानी सदस्य संख्या के ज़रिये उनके वोट का पता रहता है। इस जानकारी को वो पार्टी के व्हिप को सुलभ करवा सकती हैं क्योंकि इसी आधार पर पार्टी यदि चाहे तो अपने सदस्यों के ख़िलाफ़ व्हिप के उल्लंघन की कार्रवाई कर सकती है। इसमें सांसद अपनी सदस्यता तक गवाँ सकता है।