मैं तीन दशक से पेशेवर पत्रकार हूँ। कई बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग की। सैन्य अभियानों और संसद तथा अक्षरधाम आतंकी हमलों जैसी बड़ी घटनाओं का भी टीवी के लिए रिपोर्टिंग करने का भी अवसर मिला। सियाचिन, लेह, गुरेज़, उरी जैसे इलाक़ों की सीमान्त चौकियों पर भी जाने का मौक़ा मिला। रक्षा मंत्रालय से मान्यता प्राप्त ‘डिफ़ेंस कोरेसपोंडेंट’ भी रहा। संसद, पीएमओ, कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, राष्ट्रपति भवन, विदेश-गृह और वित्त मंत्रालय तथा बीजेपी-काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों का भी दशकों तक बीट रिपोर्टर रहा। असंख्य ख़बरें ‘सूत्रों’ से बटोरीं और ज़िम्मेदारी के साथ प्रसारित कीं। कभी कोई ‘ख़बर’ कभी झूठी या ग़लत नहीं निकली। कभी मेरे मीडिया संस्थान को या पत्रकारिता को मेरी वजह से शर्मसार नहीं होना पड़ा।

अब वो सारी बातें इतिहास हो चुकी हैं। अब ‘सूत्र’ का मतलब ‘सरकारी प्लांट’ या ‘भक्तों की गोदी पत्रकारिता’ बन चुका है। वायुसेना के मिशन बालाकोट के बाद तो पत्रकारिता ने अपने पतन का नया ऑर्बिट (orbit) ख़ुद ही बना लिया है। इसके लिए भले ही मोदी सरकार की नौकरशाही ज़िम्मेदार हो, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या अफ़सरों की ख़ामियों की वजह से मीडिया अपने बुनियादी उसूलों को भी नज़रअन्दाज़ करके युद्धोन्माद फ़ैलाने में जुट जाएगा? वैसे तो नासमझ पत्रकारों और सम्पादकों की वजह से पत्रकारिता की जो छीछालेदर होनी थी, वो तो वो चुकी। लेकिन बेहतर होगा कि इससे सबक लिया जाए।

बालाकोट के आतंकी ठिकानों पर आधी रात को हमला करने के बाद भारत सरकार को इसका ब्यौरा देने में असामान्य वक़्त क्यों लगा? ख़ासकर, तब जब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने तड़के पाँच बजे ही ट्वीट कर दिया हो। हमारे विदेश सचिव विजय केशव गोखले को प्रेस कॉन्फ़्रेस की तैयारी करते-करते सवा ग्यारह तक इन्तज़ार क्यों करना पड़ा? विदेश और रक्षा मंत्रालय तथा ख़ुद प्रधानमंत्री भी तो ट्वीट कर सकते थे। वैसे भी प्रेस कॉन्फ़्रेस का मतलब ही होता है – सवाल-जवाब

जब अफ़सरों को पत्रकारों के सवाल ही नहीं सुनने थे तो फिर उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेस बुलायी ही क्यों? प्रेस रिलीज़ और साउंड बाइट को बग़ैर पत्रकारों को बुलाये भी जारी किया जा सकता था। पत्रकारों को सरकार की ओर से ऑन-रिकॉर्ड तो छोड़िए, ऑफ़ रिकॉर्ड भी ब्रीफ़्रिंग क्यों नहीं की गयी? यदि दोनों में से कोई विकल्प नहीं था, तो पत्रकारों ने इसका तीख़ा विरोध क्यों नहीं किया? यदि पहले दिन ही मीडिया ने कड़ी नाराज़गी दिखायी होती तो दूसरे दिन भी यही दोहराने की अफ़सरों की हिम्मत नहीं होती।

सरकार ने ये साफ़ क्यों नहीं किया कि भारतीय वायुसेना ने जिस बालाकोट को निशाना बनाया वो है कहाँ? पाक अधिकृत कश्मीर में या पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी सूबे ख़ैबर-पख़्तूनवा में। सरकार ने ये भी साफ़ नहीं किया कि मुहिम में कितने विमानों ने हिस्सा लिया? कितनों ने नियंत्रण रेखा पार की? कितने ‘स्टैंड बाई’ पर रहे? ये बहुत छोटे-छोटे, लेकिन अहम सवाल हैं। इन्हें लेकर ही सूत्रों ने अलग-अलग लोगों को इतनी अलग-अलग बातें बतायीं कि हमारी मीडिया कवरेज़ ही हास्यास्पद हो गया।

इसी तरह, यदि सरकार ने हमले से हुए नुकसान का ब्यौरा देने से परहेज़ किया तो रिपोर्टरों ने किस आधार पर ये तय कर लिया कि तीन सौ आतंकवादी, उनके 25 प्रशिक्षक और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर के दो भाई और एक साला मारे गये? हो सकता है कि ऐसा हुआ ही हो, लेकिन ये भी तो हो सकता है कि ऐसा नहीं हुआ हो? इसीलिए, सबूत की बड़ी अहमियत है। बेशक़, भारत सरकार के पास सबूत होंगे, लेकिन उन्हें दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए था। ख़ासकर तब, तब पाकिस्तान का ये दावा हो कि हमलों से कोई ख़ास नुकसान नहीं हुआ।

यही दुर्दशा अगली दिन की प्रेस कॉन्फ़्रेस में भी रही। पाकिस्तानी विमानों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की। भारतीय वायुसेना ने हमले का जवाब दिया। दोनों देशों के विमान मार गिराये गये। भारत का पायलट दुश्मन की सीमा में पकड़ा गया। संचार क्रान्ति के मौजूदा दौर में सारी दुनिया को बहुत कुछ पता चलता रहा। ट्वीटर और वीडियो, अपने काम की धूम मचाते रहे लेकिन भारत सरकार का ढर्रा वही बाबा आदम के ज़माने वाला रहा। इसीलिए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ब्यौरा देने से पहले ही कोई सवाल नहीं पूछने की शर्त का ऐलान कर दिया। जब यही करना था तो प्रवक्ता अपने साथ वायुसेना के अफ़सर को लेकर क्यों पहुँचे? इतनी सी बात के लिए तो प्रेस कॉन्फ़्रेस होनी ही नहीं चाहिए थी।

यदि मीडिया को कम जानकारी देना किसी रणनीति का हिस्सा है तो फिर सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए था कि सूत्रों की आड़ में ग़लत जानकारियाँ नहीं फैले। इससे देश, सेना और अन्य संस्थाएँ और कमज़ोर होती हैं। सूचना तंत्र, ग़लत हाथों में खेलने लगता है। कल्पना कीजिए कि यदि अमेरिका ने लादेन को मार गिराने का सबूत सारी दुनिया के सामने नहीं रखा होता तो क्या उसकी वैसी धाक बन पाती, जैसी है। दूसरी ओर, यदि भारत सरकार किसी भी वजह से सबूत को सामने नहीं रख सकती थी, तो उसे हमले का पूरा ब्यौरा मीडिया के ज़रिये सबके सामने रखना चाहिए था। इसी ब्यौरे को रिपोर्टरों को जब आधिकारिक रूप से नहीं दिया जाता है तो उस जानकारी को ‘सूत्रों’ के हवाले से प्राप्त जानकारी कहते हैं। ये ‘सूत्र’ सरकार में बैठे लोग ही होते हैं। वो जब अपनी पहचान को ज़ाहिर नहीं करना चाहते, तब ‘सूत्र’ बन जाते हैं।

पत्रकारिता में ‘सूत्रों’ के माध्यम से जानकारी देने का तरीक़ा विश्व-व्यापी और हमेशा से है। ‘सूत्रों’ के माध्यम से मीडिया ग़लत या अधूरी जानकारी देता है। क़ानूनन ऐसा नहीं किया जा सकता, लेकिन व्यवहार में ख़ूब होता है। वो इसलिए, क्योंकि झूठ को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए जिन्हें क़ानूनी कार्रवाई करनी होती है, वही तो पत्रकारों को झूठी जानकारी देते हैं। यही है, ‘सैंया भये कोतवाल तब डर काहे का’। होशियार रिपोर्टर और सम्पादक जब ऐसी जानकारियों को प्रकाशित या प्रसारित करते हैं तो क़ानून की नज़र में अपनी ख़ाल बचाने के लिए ‘दावा है कि’, ‘अपुष्ट जानकारी है कि’ और ‘कहा जा रहा है कि’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, जब किसी के ख़िलाफ़ किसी आरोप की बात की जाती है तब ये अपेक्षित है कि सम्बन्धित व्यक्ति से उसका पक्ष ज़रूर जाना जाए। इसीलिए जब इस ‘पक्ष की सफ़ाई या ब्यौरा’ सामने नहीं होता तो लिखा जाता है कि ‘उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिली’ या उन्होंने ‘बात करने से इनकार कर दिया’।

पत्रकारिता के इन्हीं बुनियादी उसूलों का यदि बालाकोट हमले की रिपोर्टिंग में ख़्याल रखा गया तो अलग-अलग मीडिया में अलग-अलग बातें नहीं दिखायी देतीं। ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ वाला रवैया पत्रकारिता के अलावा भारत की गरिमा को भी धूमिल करता है। दुश्मन को इससे बहुत फ़ायदा पहुँचता है। इसी जोख़िम को देखते हुए 2008 के मुम्बई के आतंकी हमलों के दौरान सरकार ने मीडिया के लिए जो दिशा-निर्देश तैयार किये थे, उसमें ये भी कि पत्रकार अपुष्ट जानकारी नहीं प्रसारित करेंगे और सरकार की ओर से उन्हें मुनासिब जानकारियाँ मुहैया करवायी जाएँगी। तब सम्पादकों की दलील थी कि यदि सरकार हमें सही ब्यौरा नहीं देगी तो हमारे लिए ग़लत जानकारियों के प्रसारण को रोकना बहुत मुश्किल होगा।

बदकिस्मती से इस बार सारी पुरानी बातों को भुला दिया गया। ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, मौजूदा दौर में मीडिया का भी राजनीतिकरण हो चुका है। कई चैनल और अख़बार सारी पत्रकारीय मर्यादाओं को ताक़ पर रखकर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता की तरह काम करने लगे हैं। इसीलिए, इन्हें भक्त पत्रकार भी कहा जाने लगा है। एक ज़माना था जब ख़बरों की प्रमाणिकता यानी क्रेडिबिलिटी को मीडिया का आभूषण माना जाता है। लेकिन अभी तो दौर भेड़-चाल का है।