27 फरवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के नौशेरा और राजौरी सेक्टर में भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनन्दन वर्तमान की ओर से दिखाये अदम्य साहस और वीरता ने पाकिस्तान को दो ऐसे गुनाहों को करने के लिए मज़बूर कर दिया, जिन पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। पहला क़सूर है – 17 नवम्बर 2006 को अमेरिका से हुए क़रार को तोड़कर भारत के ख़िलाफ़ F-16 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल और दूसरा गुनाह है – युद्ध बन्दियों के प्रति व्यवहार से जुड़ी जेनेवा संघि, 1949 का उल्लंघन।

दोनों अपराधों के सबूत सारी दुनिया के सामने हैं। चाहे सच्चा हो या झूठा और दुर्भावनापूर्ण, लेकिन अभिनन्दन का हरेक वीडियो वायरल हो चुका है। उसे भारत के सुपुर्द करने की प्रक्रिया का भी पाकिस्तानी मीडिया ने सीधा प्रसारण किया। ज़बरन पाकिस्तानी सेना की तारीफ़ करवाने और भारतीय मीडिया की आलोचना करवाने वाले वीडियो भी पाकिस्तान के गुनाह के जीते-जागते सबूत हैं। इसीलिए अभिनन्दन की रिहाई के बाद भारत सरकार और हमारे राजनयिकों को ये तय करना होगा कि वो संयुक्त राष्ट्र से इस अपराध के ख़िलाफ़ कैसी कार्रवाई की माँग करना चाहेंगे?

वैसे जेनेवा संघि का उल्लंघन करने के लिए पाकिस्तान के ख़िलाफ़ निन्दा प्रस्ताव पारित करने के अलावा कड़े आर्थिक प्रतिबन्धों की भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसी कार्रवाई की ज़ोरदार माँग करके भारत चाहे तो पाकिस्तान और उसके दोस्तों को और शर्मसार कर सकता है। इस लिहाज़ से भारत सरकार ने अभी तक अपने अगले रुख़ का इज़हार नहीं किया है। अलबत्ता, ऐसे संकेत ज़रूर मिले हैं कि भारत ने पाकिस्तान की ओर से अपने ख़िलाफ़ F-16 फ़ाइटर्स और हवा से हवा में मार करने वाली एमराम (AMRAAM) मिसाइल के बेज़ा इस्तेमाल के लिए अमेरिका से कार्रवाई की अपेक्षा की है। इसीलिए 28 फरवरी को तीनों सेनाओं की ओर से हुई साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के दौर पर एमराम के मलवे को सारी दुनिया के सामने पेश किया गया था।

कभी पाकिस्तान के सबसे ख़ास दोस्त रहे अमेरिका के सामने अब धर्मसंकट है। अमेरिका को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ये स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान को लेकर उसकी पुरानी नीति ग़लत थी। भारत ने पाकिस्तान को लेकर अमेरिका को ख़ूब आगाह किया। लेकिन अमेरिका की आँख तो 9/11 (11 सितम्बर 2001) के आतंकी हमले से ही खुली। तब धीरे-धीरे अमेरिका ने पाकिस्तान की पीठ पर से हाथ खींचना शुरू किया। पाकिस्तान ने फिर भी कोई सबक नहीं लिया। आख़िरकार, 2 मई 2011 को ओसामा बिन लादेन के सफ़ाये से पाकिस्तान की रही-सही इज़्ज़त भी जाती रही।

झूठ और दग़ा, पाकिस्तान की जन्मजात पहचान रही है। भारत ने तो इसे हमेशा झेला है। इस्लामिक देशों के संगठन (आईओसी) की ओर से भारत और पाकिस्तान के प्रति दिखाये गये रवैये से लगता है कि अब इस्लामिक देशों की आँखों पर पड़ा पर्दा भी झीना पड़ चुका है। तभी तो बालाकोट ऑपरेशन के बाद चीन, सउदी अरब, यूएई, मिस्र और तुर्की जैसे पुराने दोस्तों ने भी पाकिस्तान से कन्नी काट ली। किसी भी देश ने पाकिस्तान को पीड़ित नहीं माना। किसी भी देश ने भारतीय कार्रवाई की आलोचना नहीं की। किसी भी देश ने पाकिस्तान के जवाबी हमले को सही नहीं ठहराया।

भारत और पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाईयों को ठंडा करवाने में अमेरिका ने भी अहम भूमिका रही। इसीलिए अब राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प को ये अग्निपरीक्षा देनी है कि वो उस पाकिस्तान पर कार्रवाई करें, जिसने अमेरिका से वादा ख़िलाफ़ी करके उसके F-16 फ़ाइटर्स का भारत के विरूद्ध इस्तेमाल किया। पाकिस्तान ने अपनी आदत के मुताबिक़ झूठ बोला कि उसने भारत के ख़िलाफ़ F-16 विमानों का इस्तेमाल नहीं किया। जबकि भारत ने पुख़्ता सबूत हैं कि F-16 विमानों और सिर्फ़ उसी से लॉन्च हो सकने वाले एमराम (AMRAAM) मिसाइल का इस्तेमाल हिन्दुस्तान के ख़िलाफ़ किया गया है।

फ़िलहाल, ये साफ़ नहीं है कि F-16 विमानों और एमराम मिसाइलों को लेकर पाकिस्तान ने 2006 वाले जिस अमेरिकी क़रार तो तोड़ा है, इसके बदले में अमेरिका क्या क़दम उठाएगा? वो कैसे पाकिस्तान को दंडित करेगा? क्या अमेरिका अपने क़रार की अनदेखी करना चाहेगा? अनदेखी की नीति पर चलने से महाशक्ति अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिष्ठा पर आँच आएगी। वैश्विक स्तर पर यदि क़रारों और संधियों की प्रतिष्ठा नहीं रहेगी तो दुनिया की व्यवस्थाएँ कैसे चलेंगी?